--- title: "Complete Book 0" book: "SUPW & CS_9 (1-76) H Inner (F)" category: "General" publisher: "Ratan Prakashan Mandir Pvt. Ltd." type: "Educational Material" --- SUPW & CS_9 (1-76) H Inner (F) A"SUCCESS KEY" FOR ALL UNIVERSITY IN INDIA रतन PASS BOOK कक्षा 9 SUPW अनुज सिंघल प्रकाशक रतन प्रकाशन मन्दिर प्रा. लि. द्वितीय तल, सेण्टर प्लाजा, प्रणय कुंज मार्ग, आगरा-2 नवीनतम संस्करण कॉपीराइट लेखक एवं प्रकाशक मूल्य ₹ 156.00 प्रकाशक रतन प्रकाशन मन्दिर प्रा. लि. द्वितीय तल, सेण्टर प्लाजा, प्रणय कुंज, लाजपत कुंज मार्ग, आगरा-2 ISBN : 978-93-0970-275-4 मुद्रक : किड्स इन्टरनेशनल प्रा. लि.सी-60-63 ई.पी.आई.पी., शास्त्रीपुरम, आगरा-7 S.U.P.W. & C.S. I अनिवार्य प्रवृत्ति समूह 1. ईंधन : उपयोग एवं रखरखाव पाठ-सार ● पृथ्वी के समस्त जीवधारियों को जीवित रहने के लिए जल, वायु एवं भोजन की आवश्यकता होती है। ● प्राचीन समय में मनुष्य को अग्नि का ज्ञान न होने के कारण वह कच्चा भोजन ही खाता था किन्तु आजकल भोजन को भली-भाँति पकाकर खाया जाता है ● भोजन को पकाने के लिए ईंधन की आवश्यकता होती है। ● ग्रामीण क्षेत्रों में भोजन को पकाने के लिए प्रायः लकड़ी या गोबर के उपलब्ध उपयोग किए जाते हैं। इस प्रकार का ईंधन जुटाना एवं इससे भोजन पकाना कठिन कार्य होता है। यह ईंधन प्रदूषण भी उत्पन्न करता है। ● आजकल केरोसिन एवं गैस से चलने वाले स्टोव्स का प्रचलन बढ़ा है। ● केरोसिन स्टोव में केरोसिन तेल का उपयोग किया जाता है। यह भोजन पकाने का बहुत साधारण, सस्ता और सुविधाजनक साधन है। इसका उपयोग शहरों एवं गाँवों दोनों जगहों पर किया जाता है। ● केरोसिन स्टोव में केरोसिन को हवा के दबाव से फब्बारे के रूप में बर्नर पर पहुँचाया जाता है जिससे यह ज्वलनशील गैस में परिवर्तित होकर उच्च ऊष्मीय मान वाली लौ उत्पन्न करता है। ● स्टोव के प्रयोग के समय कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए; जैसे—स्टोव की टंकी में निर्धारित क्षमता से अधिक तेल नहीं भरना चाहिए, स्टोव से कपड़े, मुँह, बालों आदि को दूर रखना चाहिए आदि। ● केरोसिन स्टोव से भी अधिक प्रचलित एक अन्य साधन गैस चूल्हा है। इसमें एल.पी.जी. का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसका प्रचलन शहरों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी बढ़ता जा रहा है। ● गैस चूल्हे के उपयोग के अनेक लाभ हैं, जैसे—यह धुआँ नहीं छोड़ता, इसे तुरंत उपयोग में लाया जा सकता है, इससे बर्तन काले नहीं होते हैं, चूल्हे की आग को कम या तेज किया जा सकता है। ● गैस चूल्हे में गैस को सिलिण्डर से पाइप द्वारा बर्नर तक अधिक दबाव के साथ लाया जाता है। बर्नर में बने सूक्ष्म छिद्रों से गैस बाहर निकलकर एक सघन लौ उत्पन्न करती है। ● गैस चूल्हे का उपयोग करते समय कुछ सावधानियाँ रखने की आवश्यकता होती है; जैसे—चूल्हे की साफ-सफाई, चूल्हे को सिलेण्डर से दूर रखना, अच्छे पाइप एवं बर्नर का उपयोग, सूती कपड़े पहनना, चूल्हे का बटन उपयोग के बाद ठीक से बन्द करना, बालों को बाँध कर भोजन पकाना आदि। ● कुछ साधारण उपाय अपनाकर ईंधन बचाया जा सकता है; जैसे—खाना पकाने से पहले ही आवश्यक सामग्री एकत्र कर लेना, उपयुक्त आकार के बर्तन प्रयोग करना, प्रेशर कुकर का उपयोग करना, खाना ढककर पकाना, आवश्यकतानुसार विभिन्न आकार के बर्नर उपयोग करना आदि। ● हम एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए तरह-तरह के वाहनों का उपयोग करते हैं। साइकिल व मोटर साइकिल प्रायः प्रत्येक घर में उपलब्ध रहती हैं। कुछ घरों में कार एवं जीप भी होती हैं। ● हमें अपने वाहन की ठीक से देखभाल करनी चाहिए; जैसे—साफ-सफाई, कलपुर्जों में तेल डालना, यदि वाहन स्वचालित है तो उसके इंजन की नियमित जाँच, ट्यूब में उचित हवा, इंजन ऑयल डलवाना, अच्छे ईंधन का उपयोग आदि। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. भोजन पकाने में ईंधन के रूप में कौन सी गैस प्रयोग में लायी जाती है? (अ) L. P. G. (ब) ऑक्सी एसीटीलिन गैस(स) C. N. G. (द) कोई नहीं। 2. वाहन के इंजन में प्रयुक्त होता है— (अ) केरोसिन (ब) मोबिल ऑयल(स) पाम ऑयल (द) कोई नहीं। उत्तर—1. (अ) 2. (ब)। लघूत्तरात्मक प्रश्न प्रश्न 1. गैस चूल्हे को काम में लेते समय कौन-कौन सी सावधानियाँ रखनी चाहिए? उत्तर—गैस चूल्हे को काम में लेते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रखनी चाहिए— 1. गैस चूल्हे में काम आने वाली गैस अत्यंत ज्वलनशील होती है। अतः खाना पकाते समय यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि गैस चूल्हे का स्वच्छ तथा गैस सिलेण्डर पर लगा नियंत्रक दोनों बंद स्थिति में हों। 2 | रतन पास बुक, कक्षा—9 2. रसोईघर में गैस की गंध आ रही हो तो रबर की नली की जाँच की जानी चाहिए तथा नियंत्रक की नोब को बंद की स्थिति में रखते हुए सिलेण्डर से अलग कर लेना चाहिए। सिलेण्डर को रसोई से बाहर रख देना चाहिए। 3. ध्यान रखें कि इस स्थिति में भूल कर भी न तो बिजली का स्विच चालू करें, न बंद करें और न ही माचिस व लाइटर जलाएँ। 4. रसोईघर की खिड़कियों व दरवाजों को खुली स्थिति में रखना चाहिए। 5. खाना बनाते समय सूती कपड़े पहनने चाहिए। प्रश्न 2. खाना पकाते समय ईंधन की बचत करने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए? उत्तर—खाना पकाते समय ईंधन की बचत के उपाय— 1. खाना बनाने से पहले जो तैयारी संभव हो उसे गैस चालू करने से पहले कर लेनी चाहिए जैसे—सब्जी काटना, आटा गूँथना आदि। 2. सब्जियों को हमेशा प्रेशर कुकर में ही पकाना चाहिए। 3. खाना बनाने के लिए चौड़े पेंदे वाले बर्तनों का उपयोग करना चाहिए। 4. दाल, चावल आदि को पकाने से एक घंटे पहले से ही पानी में भिगो देना चाहिए ताकि ये जल्दी पक जाएँ। 5. यदि कम ईंधन की आवश्यकता हो तो छोटे बर्नर को काम में लेना चाहिए। 6. बर्तन को गैस चूल्हे से उतारने से पहले चूल्हे के स्विच को बन्द कर देना चाहिए। 7. गैस को अनावश्यक खर्च नहीं करना चाहिए। निबन्धात्मक प्रश्न प्रश्न 1. साधारण स्टोव की कार्य प्रणाली समझाइए। उत्तर—साधारण स्टोव की कार्य प्रणाली एवं सिद्धान्त—स्टोव में केरोसिन को हवा के दबाव से फब्बारे के रूप में करके जलाने से यह ज्वलनशील गैस में परिवर्तित हो जाता है। इसमें नीचे के भाग में पीतल या लोहे के चद्दर की टंकी होती है। इस टंकी में हवा भरने के लिए एक वायु पम्प होता है। टंकी पर चूड़ीदार ढक्कन भी होता है, जिसमें रबर का वाल्व लगा होता है। स्टोव की टंकी के ऊपरी भाग में एक कटोरी होती है जिसमें तेल या मिथिलेटेड स्प्रिंट डालकर जलाया जाता है। बर्नर को गर्म करने के लिए कभी-कभी इस पर जाली लगा कपड़ा भी लगा दिया जाता है। गर्म बर्नर पर जब केरोसिन की बारीक फुआर दबाव के साथ पड़ती है तो बर्नर की गर्मी से केरोसिन गैस में बदलकर लौ का रूप ले लेता है। बर्नर के ऊपर खाना पकाने के बर्तन के पेंदे पर ज्वाला चारों ओर फैल जाती है, जिससे खाना पकता है। स्टोव की ज्वाला को कम या बंद एक वाल्व से किया जा सकता है। स्टोव में तीन टाँगे होती हैं जिन पर रखी जाली पर बर्तन रखकर भोजन पकाते हैं। प्रश्न 2. यदि रसोई में से गैस की गंध आ रही हो तो आप क्या करेंगे? उत्तर—रसोई गैस अर्थात एल. पी. जी. अत्यधिक ज्वलनशील गैस है और शीघ्रता से आग पकड़ लेती है। यदि रसोईघर में गैस लीकेज को अनदेखा किया जाता है तो इससे भयानक दुर्घटना हो सकती है। रसोई गैस की गंध को हम आसानी से पहचान सकते हैं। यदि रसोईघर से गैस की गंध आ रही हो तो हमें निम्नलिखित उपाय करने चाहिए— 1. सबसे पहले गैस सिलेण्डर के नियंत्रक को बन्द कर देना चाहिए। 2. तुरंत रसोई घर की सभी खिड़कियाँ खोल देनी चाहिए। 3. रसोई घर में बिजली के स्विचों को हाथ न लगाएँ यदि स्विच ऑन हों तो ऑन ही रहने दें और यदि ऑफ हैं तो ऑफ ही रहने दें। 4. अब ध्यानपूर्वक गैस सिलेण्डर के रेगुलेटर, पाइप, चूल्हे के स्विच आदि की जाँच कर लेनी चाहिए कि लीकेज कहाँ से हो रही है। 5. आवश्यकतानुसार रेगुलेटर पाइप या स्विच बदल देने चाहिए। 6. यदि लीकेज सिलेण्डर के वाल्व से हो तो सिलेण्डर को सावधानी पूर्वक खुले में रख देना चाहिए। अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. ईंधन का स्रोत है— (अ) लकड़ी (ब) केरोसिन तेल (स) एल. पी. जी. गैस (द) ये सभी। 2. सबसे कम प्रदूषण उत्पन्न करता है— (अ) लकड़ी-चूल्हा (ब) केरोसिन चूल्हा (स) एल.पी.जी. चूल्हा (द) उपलब्ध वाला चूल्हा। 3. केरोसिन स्टोव की टंकी को नहीं भरना चाहिए— (अ) 1/2 भाग से अधिक (ब) 1/4 भाग से अधिक (स) 2/3 भाग से अधिक (द) कोई नहीं। 4. सिलेण्डर में एल.पी.जी. होती है— (अ) गैस रूप में (ब) द्रव रूप में (स) कोलाईड रूप में (द) ठोस रूप में। 5. किसी वाहन का परफॉर्मेंस निर्भर करता है— (अ) इंजन पर (ब) मिस्त्री पर (स) ऑयल पर (द) सड़क पर। उत्तर—1. (द) 2. (स) 3. (स) 4. (ब) 5. (अ)। SUPW | 3 अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. दो प्रकार के चूल्हों के नाम लिखिए। उत्तर—(i) केरोसिन स्टोव, (ii) गैस चूल्हा। प्रश्न 2. प्राचीन समय में लोग कैसा भोजन खाया करते थे? उत्तर—अग्नि का ज्ञान न होने के कारण लोग कच्चा भोजन खाया करते थे। प्रश्न 3. दो पुराने प्रकार के ईंधनों के नाम लिखिए। उत्तर—(i) लकड़ी (ii) गोबर के उपलब्धि प्रश्न 4. आजकल शहरों में सर्वाधिक उपयोग किया जाने वाला रसोई ईंधन कौन-सा है? उत्तर—एल. पी. जी.। प्रश्न 5. इंजन को ठीक से चलने में क्या सहायता करता है? उत्तर—मोबिल ऑयल। प्रश्न 6. इंजनों में रेडिएटर कूलेन्ट का क्या कार्य है? उत्तर—रेडिएटर कूलेन्ट इंजन को गर्म होने से बचाता है। लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. लकड़ी एवं गोबर के उपलब्धि को ईंधन के रूप में प्रयोग करने से क्या हानियाँ हैं? उत्तर—लकड़ी एवं गोबर के उपलब्धि को ईंधन के रूप में प्रयोग करने से निम्नलिखित हानियाँ हैं— 1. इन्हें एकत्रित करने में अधिक समय व श्रम खर्च होता है। 2. यह अपेक्षाकृत महँगा पड़ता है। 3. भोजन बनाने वाले व्यक्ति को अत्यधिक कठिनाई होती है। 4. भोजन बनाते समय धुआँ व गर्मी होने के कारण भोजन बनाने वाले व्यक्ति के स्वास्थ्य पर इनका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रश्न 2. 'आजकल स्टोव अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है।' समझाइए। उत्तर—स्टोव भोजन पकाने का एक बहुत ही साधारण, सस्ता व सुविधाजनक साधन है। इसमें केरोसिन तेल का उपयोग किया जाता है। हल्का व छोटा होने के कारण इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से ले जा सकते हैं। इसलिए यह गाँवों और शहरों दोनों जगहों पर उपयोग किया जाता है। विद्यार्थियों के लिए तो यह बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुआ है। प्रश्न 3. बत्ती वाला स्टोव क्या है? उत्तर—बत्ती वाला स्टोव भी खाना पकाने के लिए प्रयोग किया जाने वाला एक स्टोव है। इसमें एक टंकी होती है जिसमें केरोसिन तेल भरा जाता है। स्टोव की टंकी में सूत की बत्तियाँ केरोसिन तेल में डूबी रहती है। बत्तियाँ द्वारा केरोसिन तेल स्टोव के ऊपरी भाग में चढ़ जाता है। बत्तियों के ऊपरी हिस्से के जलने ने उत्पन्न ज्वाला से खाना पकाया जाता है। प्रश्न 4. स्टोव का उपयोग करते समय कौन-कौन सी सावधानियाँ रखनी चाहिए? उत्तर—स्टोव का उपयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रखनी चाहिए— 1. स्टोव को केरोसिन से पूरा नहीं भरना चाहिए बल्कि टंकी का 2/3 भाग ही भरना चाहिए। 2. स्टोव में निर्धारित क्षमता से अधिक हवा नहीं भरनी चाहिए। 3. स्टोव को जलाते समय हाथ व सिर दूर रखना चाहिए, क्योंकि शुरू में अधिक केरोसिन निकलने के कारण लौ अधिक मात्रा में बनती है। 4. यदि बर्नर से लौ निकलना धीरे या बन्द हो जाए तो बर्नर के मुँह पर बने छेद में स्टोवपिन डालकर उसे साफ कर देना चाहिए। यदि फिर भी लौ नहीं जलती तो प्लास या पाने की सहायता से बर्नर को खोलकर साफ करना चाहिए। 5. भोजन बनाने के बाद स्टोव को सोड़ा या साबुन अथवा नींबू के छिलके से रगड़कर साफ करके निर्धारित स्थान पर रखना चाहिए। प्रश्न 5. गैस चूल्हे के उपयोग के लाभ लिखिए। उत्तर—गैस चूल्हे के उपयोग के निम्न लाभ हैं— 1. यह चूल्हा बिल्कुल भी धुआँ उत्पन्न नहीं करता है। 2. इस गैस चूल्हे को इच्छानुसार तुरंत चालू किया जा सकता है। 3. गैस चूल्हे पर उपयोग किए जाने वाले बर्तन काले नहीं होते हैं। 4. गैस चूल्हे की आँच को आसानी से आवश्यकतानुसार कम व अधिक अत्यन्त अल्प समय में कर सकते हैं। निबन्धात्मक प्रश्न प्रश्न 1. गैस चूल्हे के सिद्धान्त एवं कार्यविधि का विवरण दीजिए। उत्तर—गैस चूल्हे का सिद्धान्त एवं कार्यविधि— गैस चूल्हा स्टेनलेस स्टील का घनाभ की आकृति का उपकरण होता है। इसके पैदे में स्टील की एक नली होती है जिसका सम्बन्ध बर्नर से होता है। सामान्यतया गैस चूल्हे पर दो या तीन बर्नर होते हैं जिनमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। प्रत्येक बर्नर का नियंत्रण अलग-अलग स्विच से होता है, जिसको घुमाकर बर्नर में जाने वाली गैस को कम-अधिक कर सकते हैं। चूल्हे के नीचे लगी स्टील की नली चूल्हे के एक कोने से बाहर निकली होती है जिसका कनेक्शन रबर की पतली नली के द्वारा गैस सिलेण्डर पर लगे नियंत्रक 4 | रतन पास बुक, कक्षा—9 (रेग्यूलेटर) से होता है। नियंत्रक की नोब को घुमाकर गैस प्रवाह को बंद या चालू किया जाता है। गैस सिलेण्डर में पेट्रोलियम गैस द्रव अवस्था में भरी होती है। गैस चूल्हे को जलाने में पहले रेग्यूलेटर की नोब को घुमाकर ऑन कर देते हैं। अब बाएँ हाथ से चूल्हे की नोब को घुमाते हैं और दूसरे हाथ से लाइटर को एक ही समय पर दबाते हैं जिससे चूल्हे में गैस प्रवाहित होकर बर्नर पर जलने लगती है। प्रश्न 2. गैस चूल्हे का रख-रखाव कैसे किया जाता है? समझाइए। उत्तर—गैस चूल्हे का रख-रखाव बहुत आसान है। इसके रख-रखाव हेतु निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए— 1. खाना पकाने के बाद रोजाना गैस चूल्हे को मुलायम कपड़े से साफ करना चाहिए। 2. गैस सिलेण्डर पर लगे नियंत्रक की नियमित रूप से जाँच करते रहना चाहिए कि कहीं गैस तो नहीं रिस रही है। 3. बर्नरों को नियमित रूप से साफ करते रहना चाहिए। बर्नर के अच्छी तरह से न जलने पर तार के बुश से साफ करना चाहिए। 4. समय बीतने के साथ-साथ सिलेण्डर से गैस चूल्हे को जोड़ने वाली रबर की नली खराब हो जाती है। परिणाम स्वरूप गैस रिसने की संभावना होती है। अतः इसे प्रत्येक वर्ष बदल देना चाहिए। 5. गर्म बर्तन रखते समय ध्यान रखना चाहिए कि गर्म बर्तन रबर की नली से न छुए अन्यथा नली जलकर गैस रिस सकती है। इससे बचने के लिए नली पर तारों का खोल चढ़ा दिया जाए तो अच्छा रहेगा। प्रश्न 3. वाहनों का रखरखाव किस प्रकार किया जाना चाहिए? उत्तर—वाहन सुचारू रूप से लंबी अवधि तक चलता रहे इसके लिए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए— 1. इंजन—वाहन की पूरी परफॉर्मेन्स इंजन पर ही निर्भर करती है। निश्चित समयान्तराल पर इंजन का मोबिल ऑयल बदलना चाहिए। ऑयल रिसने पर मिस्त्री से ठीक करवाना चाहिए। 2. ब्रेक—वाहन के ब्रेक समय-समय पर चेक करें और ब्रेकों की सेटिंग करें। यदि ब्रेक घिस गए हों तो उन्हें ठीक कराना चाहिए। 3. कूलिंग सिस्टम—इंजन को अधिक गर्म होने से बचाने के लिए कार/जीप के रेडिएटर कूलेंट की मात्रा जाँचते रहना चाहिए। 4. क्लच—क्लच लीवर केवल गियर बदलते समय ही दबाना चाहिए। 5. शुद्ध पेट्रोल—वाहन में सदैव शुद्ध पेट्रोल ही भरवाना चाहिए। 6. अतिरिक्त फ्यूज—कई बार फ्यूज जैसी छोटी-सी खराबी के कारण कार बंद हो जाती है। इसके लिए कार में एक अतिरिक्त फ्यूज रखना चाहिए। 7. स्पार्क प्लग—मोटर साइकिल में स्पार्क प्लग के प्वाइंट पर कार्बन जमा होने या प्वाइंट का गैप पर्याप्त न होने पर मोटर साइकिल चालू नहीं होती। अतः नियमित रूप से स्पार्क प्लग की सफाई करवानी चाहिए। 8. टायर प्रेशर—वाहन के ट्यूबों में हवा का प्रेशर उचित रहना चाहिए। कम हवा की स्थिति में इंजन पर लोड अधिक पड़ता है। इससे टायर भी जल्दी घिसते हैं। ●● 2. घरेलू उपकरणों का उपयोगएवं स्वरखाव पाठ-सार ● हमें अपने दैनिक जीवन में अनेक प्राकृतिक तथा कृत्रिम वस्तुओं की आवश्यकता होती है। हम बहुत से सरल उपकरणों का दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं; जैसे—टार्च, इमर्सन रॉड, स्तरी वाशिंग मशीन, पानी का नल आदि। ● हमें कुछ साधारण घरेलू उपकरणों की छोटी-मोटी मरम्मत करनी आनी चाहिए ताकि छोटी-मोटी खराबी होने पर मैकेनिक को न बुलाना पड़े। ● घरेलू पेयजल व्यवस्था में पानी पाइपलाइनों द्वारा स्रोत से मुहल्लों में भेजा जाता है। मुहल्लों की पाइपलाइनों से घरों में पानी के कनेक्शन देकर जल आपूर्ति की जाती है। इस व्यवस्था के लिए अनेक साधन जैसे—छोटे-बड़े पाइप, रिड्यूसर, यूनियन, गेट वाल्व, वाटर मीटर, टोंटी आदि की आवश्यकता होती है। ● टोंटी जल व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। इसके वाल्व और स्पिंडल अक्सर खराब हो जाते हैं। कुछ साधारण औजारों की सहायता से टोंटी के वाल्व एवं स्पिंडल आसानी से बदले जा सकते हैं। ● टार्च का प्रयोग हम अक्सर करते हैं। यह एक हल्का व पोर्टेबल यंत्र है जिसे व्यक्ति आसानी से अपने साथ रख सकते हैं। ये छोटे-बड़े कई आकारों वाली होती हैं। इसकी मरम्मत एवं रख-रखाव अत्यंत आसान है। इसमें प्रायः शुष्क सेलों का प्रयोग किया जाता है। ● इमर्सन रॉड या इमर्सन हीटर एक ऐसा सरल विद्युत उपकरण है जो पानी गर्म करने के लिए काम में लिया जाता है। इसमें नाइक्रोम धातु का बना हुआ कुंडलित हीटिंग एलीमेंट होता है जो विद्युत प्रवाहित करने पर ऊष्मा उत्पन्न करता है। SUPW | 5 ● विद्युत फ्यूज एक ऐसी युक्ति है जिसे विद्युत सर्किट में लगाया जाता है। यह अतिभारण की अवस्था में फ्यूज होकर विद्युत परिपथ में विद्युत प्रवाह को बंद कर देता है। यह एक सुरक्षा उपकरण की तरह कार्य करता है। विद्युत फ्यूज में लगे तार को सीसा व जस्ता धातुओं के मिश्रण से बनाया जाता है। इसका गलनांक कम होता है। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. किसी भी प्राणी के जीवन के लिए किसकी आवश्यकता होती है? (अ) जल (ब) वायु (स) भोजन (द) उपरोक्त सभी। 2. लम्बी दूरी तक रोशनी प्राप्त करने के लिए टॉर्च में किस प्रकार के सेल काम में लिए जाते हैं— (अ) शुष्क सेल (ब) लेड एसिड सेल (स) लेक्लांशी सेल (द) कोई नहीं। उत्तर—1. (द) 2. (ब)। लघूत्तरात्मक प्रश्न प्रश्न 1. दैनिक जीवन में सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए हम किन-किन कृत्रिम साधनों का उपयोग करते हैं? उत्तर—दैनिक जीवन में सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए हम विभिन्न कृत्रिम साधनों का उपयोग करते हैं; जैसे—पानी की पेयजल व्यवस्था हेतु विभिन्न उपकरण (टोंटी, वाल्व, मीटर आदि।) टार्च, इमर्सन राड, इस्तरी, वॉशिंग मशीन, आदि। प्रश्न 2. सरकार द्वारा जो विभाग जल की व्यवस्था करता है, उसे क्या कहते हैं? उत्तर—सरकार द्वारा जो विभाग जल की व्यवस्था करता है, उसे जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग कहते हैं। प्रश्न 3. फ्यूज बेस किसे कहते हैं? उत्तर—फ्यूज बेस विद्युत फ्यूज एसेम्बली का आधारीय बड़ा भाग होता है जो चीनी मिट्टी का बना होता है। फ्यूज बेस में धातु की पत्तियों के बीच फ्यूज तार कसा जाता है। फ्यूज बेस को पेंच की सहायता से बॉक्स में कसा जाता है। प्रश्न 4. फ्यूज तार क्या है? संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। उत्तर—फ्यूज तार—यह एक पतले तार का टुकड़ा होता है जो ऐसी मिश्र धातु का बना होता है जिनका गलनांक परिपथ में काम आने वाले तारों की धातु से कम होता है ताकि शॉर्ट सर्किट या ओवरलोड के समय परिपथ के तार पिघलने से पहले ही फ्यूज तार पिघल जाए। यह तार सीसा (लेड) व जस्ता (टिन) धातु के मिश्रण से बनाया जाता है। निबंधात्मक प्रश्न प्रश्न 1. एक टोंटी को लम्बे समय तक प्रयोग में नहीं लाने के कारण खराब हो गई है। इसकी मरम्मत करने की विधि लिखिए। उत्तर—जब किसी टोंटी को लम्बे समय तक प्रयोग नहीं किया जाता है तो ऐसी स्थिति में टोंटी की डिस्क जाम हो जाती है। इसके लिए वाल्व के फेस को खोलकर उसकी डिस्क को बाहर निकालकर उसकी सफाई या घिसाई की जाती है। इसके बाद इसे वापस फिट कर दिया जाता है। टोंटी को खोलना एवं बंद करना निम्नांकित चित्र में प्रदर्शित किया गया है— 6 | रतन पास बुक, कक्षा—9 Refitting of Valve parts After Repair चित्र—टोटी की मरम्मत प्रश्न 2. विद्युत फ्यूज एसेम्बली का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। उत्तर—विद्युत फ्यूज एसेम्बली—फ्यूज वायर एसेम्बलियाँ कई तरह की होती हैं परन्तु किट-कैट फ्यूज एसेम्बली अधिकतर काम में लायी जाती है। यह चीनी मिट्टी की बनायी जाती है। इसके दो भाग होते हैं। एक फ्यूज कैरियर और दूसरा फ्यूज बेस कहलाता है। फ्यूज बेस को एक पेंच द्वारा लकड़ी के बोर्ड पर कस दिया जाता है, इसके दोनों सिरों पर ताँबे की कनेक्टर पिनें लगी होती हैं। फ्यूज कैरियर के दोनों सिरों पर की ताँबें भी कनेक्टर पिनें लगी होती हैं, जिसमें छोटे-छोटे पेंच लगे होते हैं। फ्यूज तार को इन्ही कनेक्टर पिनों के मध्य इस प्रकार बाँधते हैं कि तार का एक सिरा कनेक्टर पिन से तथा दूसरा सिरा दूसरी कनेक्टर पिन से स्क्रू द्वारा कसा जा सके। किट-कैट फ्यूज की क्षमता 6 एम्पीयर से 100 एम्पीयर तक होती है। प्रश्न 3. इमर्सन रॉड की बनावट विस्तार से समझाइए। उत्तर—इमर्सन रॉड—इमर्सन रॉड या इमर्सन हीटर एक ऐसा सरल विद्युत उपकरण है जो पानी गर्म करने के लिए काम में लाया जाता है। इसमें नाइक्रोम धातु का बना हुआ एक कुण्डलीदार हीटिंग ऐलीमेंट (तार) होता है। इसे पीतल की नली में डालकर इस तार के चारों ओर मैग्नीशियम ऑक्साइड चूर्ण भर दिया जाता है। यह अचालक चूर्ण, एलीमेंट को नली से पृथक रखता है। एलीमेण्ट के दोनों सिरों से एक-एक ताँबे का संयोजक तार जोड़कर नली के सिरों को किसी उपयुक्त ऊष्मारोधी पदार्थ से बंद कर दिया जाता है। इन संयोजक तारों को चीनी मिट्टी तथा बैकेलाइट से बने संयोजक में जोड़कर इससे मुख्य लीड तथा 3 पिन प्लग टॉप लगा दिया जाता है। इमर्सन रॉड की क्षमता प्रायः 1000 वाट, 1500 वाट या 2500 वाट की होती है जिन्हें आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सकता है। चित्र—इमर्सन रॉड प्रश्न 4. इमर्सन रॉड की कार्य प्रणाली बताइए। उत्तर—इमर्सन रॉड की कार्य प्रणाली—पानी को गर्म करने के लिए इमर्सन रॉड को पानी से भरी हुई बाल्टी में इस प्रकार लटकाया जाता है कि उसका 'कनेक्टर' जल से बाहर रहे। इसके लिए कनेक्टर के साथ लगी पत्ती पर एक निशान बना होता है। विद्युत सप्लाई चालू करने पर 10 मिनट से 15 मिनट में एक बाल्टी पानी नहाने योग्य गर्म हो जाता है। चित्र—इमर्सन रॉड की कार्यप्रणाली प्रश्न 5. टार्च की आंतरिक संरचना का वर्णन कीजिए। उत्तर—टार्च—टार्च एक हल्का व पोर्टेबल यंत्र है जिसे लोग आसानी से अपने साथ रख सकते हैं। टार्च का उपयोग रात्रि के सफर दौरान, किसानों द्वारा रात्रि में खेतों पर कोई कार्य करते समय उजाला करने के लिये किया जाता है। आवश्यकतानुसार टॉर्च अलग-अलग आकारों में होती है। छोटी टॉर्च में प्रायः शुष्क सेल उपयोग में लाए जाते हैं? संरचना—टार्च में एक प्लास्टिक या एल्युमिनियम का बेलनाकार खोल होता है जिसके एक ओर चूड़ीदार ढक्कन होता है। इस ढक्कन में एक पारदर्शी काँच लगा होता है। काँच के पीछे एक छोटा बल्ब होता है। इसमें ऐसी व्यवस्था होती है कि इस बल्ब का संपर्क सेल के धनात्मक सिरे से हो जाए। बेलनाकार खोल के दूसरी ओर भी समतल बेलनाकार व चूड़ीदार ढक्कन होता है, जिसमें अन्दर की ओर एक स्प्रिंग होती है। बेलनाकार खोल में सामान्यतया एक से लेकर पाँच तक शुष्क सेलों को एक के बाद एक इस प्रकार रखते हैं कि सेलों की घुण्डी वाला सिरा बल्ब की तरफ रहे और समतल सिरा स्प्रिंग की ओर रहे। टार्च SUPW | 7 के खोल पर एक बटन होता है जो आगे पीछे खिसक सकता है। इसको आगे-पीछे खिसकाकर, विद्युत परिपथ को जोड़कर एवं तोड़कर बल्ब को आवश्यकतानुसार जलाया व बन्द किया जा सकता है। अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. जल वितरण व्यवस्था का उपकरण है— (अ) टोंटी (ब) वाल्व (स) वॉटर मीटर (द) ये सभी। 2. मरम्मत में काम आने वाला उपकरण है— (अ) पेंचकस (ब) हथौड़ा (स) स्पेनर (द) ये सभी। 3. वाटर लाइन एसेम्बली में लगाया जाने वाला उपकरण है— (अ) रिड्यूसर (ब) यूनियन (स) गेट वाल्व (द) ये सभी। 4. स्पिंडल, वाशर, ग्लेण्ड नट, हैण्डव्हील आदि पुर्जे हैं— (अ) टॉर्च के (ब) टोंटी के (स) इमर्सन रॉड के (द) फ्यूज के। 5. पोर्टेबल और छोटी टॉर्चों में प्रयुक्त किए जाते हैं— (अ) शुष्क सेल (ब) लैंड एसिड सेल (स) विद्युत सेल (द) इनमें से कोई नहीं। 6. इमर्सन रॉड का एलीमेंट बना होता है— (अ) लोहे का (ब) ताँबे का (स) नाइक्रोम का (द) टिन का। उत्तर—1. (द) 2. (द) 3. (द) 4. (ब) 5. (अ) 6. (स)। अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. वाटर मेन लाइन किसे कहते हैं? उत्तर—बड़ी हौजों से पानी को विभिन्न मोहल्लों में पाइपों द्वारा वितरित किया जाता है, इन्हें वाटर मेन लाइन कहते हैं। प्रश्न 2. जब वाल्व/टोंटी के स्पिंडल के साथ ऊपर से पानी निकलता है, तब इसे कैसे सुधारा जा सकता है? उत्तर—बुश का नट खोलकर वाशर/धागा और सफेदा लगाकर बुश नट को पुनः कस दिया जाता है। प्रश्न 3. जब वाल्व/टोंटी के स्पिंडल के हैण्डल को बन्द करने पर भी वह पानी कंट्रोल नहीं करता तब क्या करना चाहिए। उत्तर—ऐसी स्थिति में उसके जम्पिंग वाल्व की वाशर गल/कट गई होती है। वाशर को बदल कर नया वाशर लगा देते हैं। प्रश्न 4. किन्हीं दो प्रकार के सेलों के नाम लिखिए। उत्तर—1. शुष्क सेल 2. लैंड एसिड सेल। प्रश्न 5. इमर्सन रॉड की क्षमता बताइए। उत्तर—इमर्सन रॉड की क्षमता प्रायः 1000 वाट, 1500 वाट या 2500 वाट की होती है। प्रश्न 6. किट-कैट फ्यूज कितनी क्षमता वाले होते हैं? उत्तर—किट-कैट फ्यूज 6 से 100 एम्पीयर क्षमता वाले होते हैं। प्रश्न 7. रेटिंग क्या है? उत्तर—किसी फ्यूज की क्षमता उसकी रेटिंग द्वारा जानी जाती है। फ्यूज में बहने वाली विद्युत धारा की अधिकतम मात्रा निश्चित होती है, जिसे हम फ्यूज रेटिंग कहते हैं। लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. कैसे सुधारेंगे— (a) जब वाल्व टोंटी के स्पिंडल की चूड़ियाँ लगातार प्रयोग करने के कारण घिस जाती हैं? (b) जब वाल्व/टोंटी बिल्कुल ठीक होते हैं और लाइन में भी पानी होता है परन्तु वाल्व/ टोंटी को खोलने पर उससे पानी नहीं लिया जा सकता। उत्तर—ऐसी स्थिति में संभव हो तो स्पिंडल को बदल दिया जाता है अन्यथा टोंटी/वाल्व दूसरा लगा दिया जाता है। (b) इस स्थिति में वाल्व/टोंटी को लाइन से खोलकर अलग कर दिया जाता है तथा लाइन में फँसे कचरे को बाहर निकालकर पाइप को साफ करके वाल्व/टोंटी को पुनः लगा देते हैं। प्रश्न 2. यदि पानी सॉकेट के पास से टपक रहा हो तब क्या करना चाहिए? उत्तर—यदि पानी सॉकेट के पास से टपक रहा हो तब उसे रिंच-पाने की सहायता से कस दिया जाता है। यदि इससे भी ठीक नहीं हो तो पूरे सॉकेट को खोलकर उसकी चूड़ियों पर सुतली या सन लपेटकर पुनः कस दिया जाता है। यदि फिर भी ठीक न हो तो उस नाप का नया सॉकेट लगा देना चाहिए और उसके जोड़ों पर सफेदे का लेप कर देना चाहिए। प्रश्न 3. टोंटियों या वाल्वों की मरम्मत के लिए घर में क्या-क्या सामान होना चाहिए। उत्तर—टोंटियों या वाल्वों की मरम्मत के लिए हमारे घरों में आधा या पौन इंच की कुछ निष्पल्लें, एलबो, टी, वाशर, पाना, प्लास, पेंचकस, हथौड़ा, आदि सामान होना चाहिए। प्रश्न 4. इमर्सन रॉड का रखरखाव व मरम्मत कैसे करनी चाहिए? उत्तर—1. उपयोग करते समय इमर्सन रॉड को उस पर लगे हुए निशान तक पानी में डुबोते हैं। 8 | रतन पास बुक, कक्षा—9 2. कनेक्टर को जल से बाहर रखते हैं। 3. रॉड को बिना पानी के नहीं चलाना चाहिए। 4. इसकी मुख्य लीड तथा प्लग टॉप दोष युक्त होने पर इनको बदलकर नये लगा देने चाहिए अन्यथा स्पार्किंग के कारण उपकरण खराब होने की अधिक संभावना रहती है। प्रश्न 5. विद्युत फ्यूज का तार किस पदार्थ का बना होता है? विद्युत फ्यूज को कहाँ लगाया जाना चाहिए? उत्तर—विद्युत फ्यूज का तार कम गलनांक वाली मिश्र epsilon ातु (सीसा व जस्ता) का बना होता है। परिपथ में फ्यूज को विद्युत मीटर के ठीक बाद में मुख्य डिस्ट्रीब्यूशन बोर्ड से ठीक पहले लगाते हैं। फ्यूज को हमेशा विद्युत सप्लाई के फेज तार से ही जोड़ते हैं। विस्तृत उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. घरेलू पेयजल व्यवस्था किस प्रकार की जाती है। उत्तर—घरेलू पेयजल व्यवस्था—सरकार के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग द्वारा पेयजल की व्यवस्था की जाती है। इस विभाग द्वारा दूर-दराज के जलाशयों या बड़े-बड़े वाटर पंपों द्वारा मोटी-मोटी कास्ट आयरन या सीमेन्ट की पाइपों द्वारा शहरों में पानी भेजा जाता है। इस पानी को बड़े-बड़े हौजों में एकत्रित कर आवश्यकतानुसार कीटाणुनाशक दवाइयों द्वारा उपचारित कर जल को पीने योग्य बनाया जाता है। इन हौजों से पानी को विभिन्न मोहल्लों में पाइपों द्वारा वितरित किया जाता है। इनको वाटर मेन लाइन कहते हैं। किसी घर में जल का कनेक्शन लेने के लिए वाटर मेन लाइन पर एक फेरुल नामक उपकरण लगाया जाता है फिर रिड्यूसर, यूनियन, गेटवाल्व व आधा इंच के जी. आई. या पी.वी.सी. पाइप के साथ वाटर मीटर लगाया जाता है। वाटर मीटर के बाद पाइप द्वारा घर में आवश्यक स्थानों (रसोई, स्नानघर, शौचालय आदि) पर जल ले जाया जाता है। पाइप के अन्तिम सिरों पर टोंटी लगाते हैं। प्रश्न 2. टोंटी के विभिन्न भागों का नामांकन करते हुए चित्र बनाइए। उत्तर— चित्र—टोंटी के विभिन्न भाग प्रश्न 3. टॉर्च का रखरखाव कैसे किया जाता है? लम्बी दूरी की टॉर्च की संरचना बताइए। उत्तर—टॉर्च को सुरक्षित रखने व टॉर्च के सेलों को खराब/डिस्चार्ज होने से बचाने के लिए सेलों को दिन के समय टॉर्च में से निकाल देना चाहिए। टॉर्च को अधिक समय तक काम में न लेने पर सेल सूख जाते हैं तथा काम करना बन्द कर देते हैं। लम्बी दूरी की रोशनी के लिए जो टॉर्च काम में लाई जाती है। उसमें शुष्क सेल के बजाय लैंड एसिड सेल काम में लिए जाते हैं। इस तरह की टॉर्च की आकृति बॉक्सनुमा होती है जिसके ऊपर की तरफ हैण्डल लगा होता है। डिस्चार्ज हो जाने के पश्चात इस टॉर्च को बिजली के द्वारा पुनः चार्ज कर सकते हैं। इसके लिए इसके साथ लगे बिजली के तार के सिरे पर लगे प्लग को बिजली के बोर्ड पर स्थित थ्री पिन सॉकेट में लगाते हैं। प्रश्न 4. टॉर्च की रचना का नामांकित चित्र बनाइए। उत्तर— चित्र—टॉर्च की आंतरिक संरचना प्रश्न 5. बिजली के फ्यूज का महत्व बताइए। उत्तर—आजकल हम सभी अपने घरों में प्रकाश उत्पन्न करने के अलावा कई प्रकार के विद्युत उपकरण उपयोग में लाते हैं; जैसे—पंखा, मिक्सी, हीटर, वाशिंग मशीन, इंडक्शन, SUPW | 9 ओवन, इस्तरी, वाटर गीजर आदि। इनको काम में लेते समय लघु पथन (शॉर्ट सर्किट) या अतिभार (ओवर लोड) के कारण एवं कभी-कभी विद्युत सप्लाई भी हाई वोल्टेज से आ जाती है, जिसके कारण विद्युत उपकरणों व वायरिंग की सुरक्षा के लिए विद्युत परिपथ में ऐसा कमजोर स्थान बना देते हैं जो लघुपथन व अतिभार के समय पिघलकर परिपथ में आगे विद्युत प्रवाह को बन्द कर देता है जिससे विद्युत उपकरण खराब होने से बच जाते हैं। यह कार्य विद्युत फ्यूज आसानी से कर देता है। 3. डाकघर की सेवाएँ पाठ-सार ● डाकघर द्वारा डाक वस्तुओं को सुरक्षित एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का कार्य किया जाता है। ● डाकघर में कई बचत योजनाएँ भी संचालित होती हैं जिनमें प्रतिभाग करके व्यक्ति इन सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। ● कुछ प्रमुख डाकघर बचत योजनाएँ हैं—5 वर्षीय डाकघर आवर्ती जमा खाता, डाकघर सावधि जमा खाता, डाकघर मासिक आय खाता योजना, 15 वर्षीय लोक भविष्य निधि खाता, राष्ट्रीय बचत पत्र, वरिष्ठ नागरिक बचत योजना आदि। ● पंजीकरण का उद्देश्य ग्राहकों की डाक वस्तुओं का सुरक्षित पारेषण करना है। उन सभी चरणों का एक रिकार्ड रखा जाता है, जहाँ-जहाँ से होकर डाक वस्तु जाती है। ● डाक के द्वारा भेजी जाने वाली किसी वस्तु को डाकघर की खिड़की पर देकर और उसका निर्धारित मूल्य चुकाकर पंजीकरण रसीद-प्राप्त कर ली जाती है। ● स्पीड पोस्ट एक ऐसी डाक सेवा है जो कम समय में दस्तावेजों और पार्सलों को गंतव्य स्थान तक पहुँचाती है। स्पीड पोस्ट, घरेलू एक्सप्रेस उद्योग के बाजार में अग्रणी है। ● सम्पूर्ण देश एवं विश्व में पत्रों, दस्तावेजों और पार्सलों की तीव्र एवं समयबद्ध वितरण सेवाएँ प्रदान करने के लिए डाक विभाग द्वारा अगस्त 1986 में स्पीड पोस्ट सेवा शुरू की गई। ● स्पीड पोस्ट भारत के 1200 से अधिक शहरों को जोड़ती है जिनमें 290 स्पीड पोस्ट केन्द्र राष्ट्रीय नेटवर्क और करीब 1000 स्पीड पोस्ट केन्द्र राज्य नेटवर्क में है। ● यूनिवर्सल पोस्ट यूनियन द्वारा समर्थित, ई एम एस स्पीड पोस्ट 97 विदेशों को किफायती और शीघ्र सेवा प्रदान करती है। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. डाकघर बचत संयुक्त खाते में ब्याज दर होती है—(अ) 3% (ब) 4% (स) 5% (द) 6%। 2. डाकघर सावधि जमा खाते की न्यूनतम राशि है—(अ) 100 (ब) 200 (स) 300 (द) 400। 3. वरिष्ठ नागरिक बचत योजना की अवधि है—(अ) 2 वर्ष (ब) 3 वर्ष (स) 4 वर्ष (द) 5 वर्ष। 4. स्पीड पोस्ट की सेवा डाक विभाग द्वारा शुरू की गई थी—(अ) 1972 (ब) 1978 (स) 1982 (द) 1986। उत्तर—1. (ब), 2. (ब), 3. (द) 4. (द)। निबंधात्मक प्रश्न प्रश्न 1. स्पीड पोस्ट दर्ज करवाने की विधि को समझाइए। उत्तर—जिस वस्तु की स्पीड पोस्ट दर्ज करवानी है, उसे डाकघर की खिड़की पर प्रस्तुत किया जाता है। पत्र, दस्तावेज या पार्सल पर प्राप्त करने वाले और भेजने वाले दोनों का पता अंकित होता है। भेजने वाला व्यक्ति डाकघर खिड़की पर निर्धारित मूल्य भुगतान करता है। पंजीकरण कर्ता उस व्यक्ति को पंजीकरण की रसीद देता है। देशभर में अधिकांश डाकघरों में स्पीड पोस्ट की व्यवस्था है। इसके अलावा स्पीड पोस्ट के लिए अन्य केन्द्र भी होते हैं। कारपोरेट ग्राहकों एवं नियमित प्रयोक्ताओं के लिए स्पीड पोस्ट होम कनेक्शन क्रेडिट सुविधा, ऑन लाइन ट्रैकिंग, लेखा प्रबन्धन और व्यक्तिगत सेवाएँ प्रदान करता है। प्रश्न 2. डाकघर मासिक आय खाता योजना को समझाइए। उत्तर—डाकघर मासिक आय खाता योजना—यह योजना 01-04-2012 से लागू हुई। इसमें ब्याज 8.50% प्रति वर्ष के हिसाब से दिया जाता है। यह योजना एकल खाते में 1500 रुपए के गुणज में अधिकतम 4.5 लाख के निवेश वर्ग की है। इसकी परिपक्वता अवधि 5 वर्ष की है। कुछ शर्तों के साथ एक वर्ष के पश्चात् परिपक्वता अवधि के पूर्व इस राशि को भुनाया जा सकता है। 01-12 2011 को अथवा उसके पश्चात खोले गए एम.आई.एस. खातों पर परिपक्वता की स्थिति में कोई बोनस देय नहीं है। अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. डाकघर सावधि जमा खाते पर एक वर्षीय ब्याज दर होती है— 10 | रतन पास बुक, कक्षा—9 (अ) 4.0% (ब) 5% (स) 8.20% (द) 8.40%। 2. राष्ट्रीय बचत पत्र पर ब्याज दर है— (अ) 4.0% (ब) 5.40% (स) 8.40% (द) 8.90%। 3. वरिष्ठ नागरिक बचत योजना में अधिकतम निवेश राशि है— (अ) पाँच लाख (ब) दस लाख(स) पंद्रह लाख (द) बीस लाख। 4. पंजीकरण कराया जा सकता है— (अ) पत्र व पत्र कार्ड का (ब) पुस्तक व पैटर्न पैकेट का(स) अंध साहित्य पैकेट का (द) इन सभी का। 5. भारत में स्पीड सेवा प्रारम्भ हुई— (अ) 1976 से (ब) 1986 से (स) 1990 से (द) 1996 से 6. 'एक भारत एक दर' सम्बन्धित है— (अ) साधारण डाक सेवा से (ब) कोरियर सेवा से(स) परिवहन सेवा से (द) स्पीड पोस्ट सेवा से। उत्तर—1. (स) 2. (द) 3. (स) 4. (द) 5. (ब) 6.(द)। अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. डाकघर में सावधि जमा खाते की निवेश सीमा और मूल्य वर्ग बताइए। उत्तर—न्यूनतम राशि 200 रुपए और उसके गुणज में कोई अधिकतम सीमा नहीं। प्रश्न 2. पंजीकरण का क्या उद्देश्य है? उत्तर—ग्राहकों की डाक वस्तुओं का सुरक्षित पारेषण करना पंजीकरण का प्रमुख उद्देश्य है। प्रश्न 3. स्पीड पोस्ट क्या है? उत्तर—डाकघर द्वारा 1986 में एक त्वरित डाक सेवा प्रारम्भ की गई जो स्पीड पोस्ट कहलाती है। प्रश्न 4. स्पीड पोस्ट का मासिक वोल्यूम कितना है? उत्तर—स्पीड पोस्ट का मासिक वोल्यूम 1.4 करोड़ से अधिक है। प्रश्न 5. कौन-सी योजना 25 रु. की दर से पूरे भारत में शुरू की गई? उत्तर—"एक भारत एक दर योजना"। प्रश्न 6. स्पीड पोस्ट होम कलेक्शन क्या है? उत्तर—ग्राहकों को सुविधा प्रदान करने के लिए स्पीड पोस्ट कुछ कस्बों में ऑनलाइन कलेक्शन और नियमित कलेक्शन के माध्यम से ग्राहकों को परिसर कलेक्शन की सुविधा देता है। इसी को स्पीड पोस्ट होम कलेक्शन कहते हैं। लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. डाकघर बचत खाता योजना को समझाइए। उत्तर—डाकघर बचत खाता योजना व्यक्तिगत या संयुक्त खाता खोलकर प्रारम्भ की जा सकती है। खाते में जमा राशि पर 4.0% ब्याज मिलता है। खाता खोलने की न्यूनतम राशि 50 रु. है। इसमें चेक सुविधा भी उपलब्ध है। ब्याज कर मुक्त है। प्रश्न 2. 15 वर्षीय लोक भविष्य निधि खाते का विवरण दीजिए। उत्तर—15 वर्षीय लोक भविष्य निधि खाता 01-04-2012 से लागू है और इस पर 8.80% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देय है। इसकी शुरुआत एक वित्तीय वर्ष में न्यूनतम 500 तथा अधिकतम 100000 रुपये एकमुश्त अथवा 12 किश्तों में की जा सकती है। जमाएँ आयकर अधिनियम की धारा 80 C के अन्तर्गत आय में से कटौती योग्य हैं। ब्याज पूर्णतया कर मुक्त है। सातवें वित्त वर्ष से प्रत्येक वर्ष आहरण की अनुमति है। तीसरे वित्त वर्ष से ऋण सुविधा उपलब्ध है। कोर्ड डिक्री आर्डर के अन्तर्गत अटैचमेंट नहीं है। प्रश्न 3. पंजीकरण के उद्देश्य लिखिए तथा बताइए किन-किन वस्तुओं का पंजीकरण किया जाता है? उत्तर—पंजीकरण का उद्देश्य ग्राहकों की डाक वस्तुओं का सुरक्षित पारेषण करना तथा उन सभी चरणों का एक रिकार्ड रखना है जहाँ-जहाँ से डाक वस्तु होकर जाती है। इसके अलावा पंजीकृत डाक वस्तुओं को विशेष सावधानी के साथ पारेषित किया जाता है। निम्नलिखित डाक वस्तुओं को पंजीकृत किया जा सकता है— 1. पत्र, 2. पत्र कार्ड, 3. पोस्ट कार्ड, 4. पुस्तक एवं पैटर्न पैकेट, 5. अंध साहित्य पैकेट, 6. समाचार पत्र की दरों के पूर्व प्रदत्त संदाय के पार्सलों और समाचार पत्रों को किसी भी डाकघर में पंजीकृत किया जा सकता है। प्रश्न 4. स्पीड पोस्ट का विस्तार तथा सेवाएँ लिखिए। उत्तर—स्पीड पोस्ट भारत के 1200 से अधिक शहरों को जोड़ती है जिनमें 290 स्पीड पोस्ट केन्द्र राष्ट्रीय नेटवर्क और करीब 1000 स्पीड पोस्ट केन्द्र राज्य नेटवर्क में हैं। नियमित प्रयोक्ताओं के लिए स्पीड पोस्ट संविदात्मक सेवा के तहत भारत में कहीं भी पंजीकृत वस्तु को वितरित करता है। स्पीड पोस्ट मनीबैक गारंटी प्रदान करती है जिसके अन्तर्गत यदि पारेषित माल प्रकाशित वितरण मानदण्ड के अन्तर्गत वितरित नहीं किया गया तो स्पीड पोस्ट शुल्क वापस कर दिया जाएगा। प्रश्न 5. स्पीड पोस्ट पासपोर्ट सेवा का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर—डाक विभाग और विदेश मंत्रालय ने मिलकर पासपोर्ट प्रदान करने की सुविधा प्रदान करने के लिए एक अनूठा प्रयास किया है। आवेदकों को स्पीड पोस्ट केन्द्रों पर उपलब्ध 1 पासपोर्ट आवेदन फार्म खरीदने होते हैं। इसे भरकर शुल्क सहित जमा करना होता है। स्पीड पोस्ट केन्द्र फार्म की जाँच करेंगे, आगे की प्रोसेसिंग और पासपोर्ट जारी करने के लिए उसे निर्दिष्ट पासपोर्ट कार्यालय को प्रेषित करेंगे। SUPW | 11 यह सेवा केवल नए पासपोर्ट को जारी करने के लिए उपलब्ध है न कि पासपोर्ट का नवीनीकरण करने के लिए। प्रश्न 6. स्पीड पोस्ट खाता कैसे खोला जाता है? उत्तर—कारपोरेट ग्राहकों तथा नियमित प्रयोक्ताओं के लिए स्पीड पोस्ट कई मूल्य-संवर्धित सेवाओं, जिसमें परिसरों से डाक प्राप्त करने की सुविधा, मासिक विलिंग सुविधा, खाता प्रबंधन सुविधा, शिपमेंट के आयात/निर्यात प्रक्रियाओं विस्तृत उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. 5 वर्षीय डाकघर आवर्ती जमा खाते तथा डाकघर सावधि जमा खाते का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर— | योजना | देय ब्याज दरें, अवधि | निवेश सीमा और मूल्यवर्ग | कर रियायत सहित विशेषताएँ | |---|---|---|---| | 5 वर्षीय डाकघर आवर्ती जमा खाता | ब्याज दर 8.40 प्रतिशत 10 रु. के मासिक जमा के साथ 1.4.2012 को अथवा इसके पश्चात् खोल गए पाँच वर्षीय | प्रतिमाह न्यूनतम 10/- रुपये अथवा 15/- रुपये के गुणज में कोई राशि। कोई अधिकतम सीमा नहीं | एक वर्ष के पश्चात् शेष के 50% तक एक आहरण अनुमेय। कुछ शर्तें पूरी करने के अध्यधीन जमाकर्ता की मृत्यु के मामले में 50/- रुपए के मूल्यवर्ग तक सीमित आवर्ती जमा खातों पर पूर्ण परिपक्वता मूल्य की अनुमति। 6 और 12 महीने के अग्रिम जमा पर रियायत। | | डाकघर सावधि जमा खाते | ब्याज वार्षिक रूप से देय लेकिन तिमाही में परिकलितअवधि दर1 वर्षीय खाता 8.20%2 वर्षीय खाता 8.30%3. वर्षीय खाता 8.40%5. वर्षीय खाता 8.50%01.04.2012 से लागू | न्यूनतम 200 रुपए और उसके गुणज में। कोई अधिकतम सीमा नहीं। | व्यक्तिगत तौर पर खाता खोजा जा सकता है। पाँच वर्षीय सावधि जमा खाते 1.4.2007 से आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80 सी के अन्तर्गत छूट के पात्र है। | प्रश्न 2. राष्ट्रीय बचत पत्र (IXवाँ निर्गम) योजना का विवरण दीजिए। उत्तर— | योजना | देय ब्याज दरें, अवधि | निवेश सीमा और मूल्यवर्ग | कर रियायत सहित विशेषताएँ | |---|---|---|---| | राष्ट्रीय बचत पत्र (IX वाँ निर्गम) | ब्याज दर 8.90%। 1.4.2012 को अथवा उसके बाद खरीदे गए 100 रु. के बचत पत्र का परिपक्वता मूल्य दस वर्ष के पश्चात् 238.87 रु. होगा। | न्यूनतम 100/- रुपए। अधिकतम सीमा नहीं। 100/-, 500/-, 1000/-, 5000/- तथा 10000/- रु. के मूल्य वर्ग में उपलब्ध। | एक धारक प्रकार का बचत पत्र वयस्क द्वारा स्वयं के लिए अथवा किसी अवयस्क की ओर से अथवा अवयस्क के लिए खरीदा जा सकता है। इन बचत-पत्रों पर प्राप्त | 12 | रतन पास बुक, कक्षा—9 | | | | ब्याज पर आयकर अधिनियम, 1961 (1961 का 43, नियम 15 में विनिर्धारित वार्षिक प्रोद्भुत राशि के आधार पर) के अंतर्गत कर देय होगा, परन्तु निर्मोचन मूल्य के भुगतान के समय कर की कटौती नहीं की जाएगी | |---|---|---|---| प्रश्न 3. वरिष्ठ नागरिक बचत योजना का विवरण दीजिए। उत्तर— वरिष्ठ नागरिक बचत योजना देय ब्याज दरें एवं अवधि—9.30% प्रति वर्ष, पहली बार में 31 मार्च/30 सितम्बर/31 दिसम्बर को जमा की तिथि से देय और उसके पश्चात् ब्याज 31 मार्च, 30 जून, 30 सितम्बर और 31 दिसम्बर को देय होगा। निवेश सीमा और मूल्य वर्ग—खाते में केवल एक जमा 1000 रु. के गुणज में, अधिकतम पन्द्रह लाख। कर रियायत सहित विशेषताएँ—परिपक्वता अवधि 5 वर्ष है। जमाकर्ता व्यक्तिगत क्षमता से अथवा पति/पत्नी के साथ संयुक्त रूप से एक से अधिक खाते प्रचालित कर सकता है। आयु 60 वर्ष अथवा इससे अधिक और खाता खोलने की तिथि को अधिवर्षता की आयु को प्राप्त होने पर या अन्यथा रूप में सेवानिवृत्त व्यक्ति के मामले में आयु 55 वर्ष से अधिक किन्तु किसी भी दशा में 60 वर्ष से अधिक न हो, शर्त यह है कि कि यह खाता सेवानिवृत्ति के लाभ प्राप्त होने के एक महीने के अन्दर खोला गया हो। परिपक्वता पूर्व खाताबन्दी की अनुमति एक वर्ष की अवधि 1 पूरी होने के उपरान्त 1.5% ब्याज की कटौती पर तथा 2 वर्ष के उपरान्त 1% ब्याज की कटौती के आधार पर दी जाती है। यदि ब्याज की राशि 10,000 रु. से अधिक है तो ब्याज की राशि पर टी डी एस की कटौती की जाती है। इस योजना के अन्तर्गत किया गया निवेश 01.04.2007 के आयकर अधिनियम 1961 की धारा 80 सी के अन्तर्गत लाभ का पात्र है प्रश्न 4. किन-किन वस्तुओं के लिए पंजीकरण अनिवार्य है? उत्तर—निम्नलिखित वस्तुओं के लिए पंजीकरण अनिवार्य है— 1. कोई भी पार्सल जिसका भार 4 किलोग्राम से अधिक है। 2. कोई भी बीमित डाक वस्तु। 3. ऐसा कोई भी पार्सल जिस पर ऐसे स्थान का पता लिखा है जिसके लिए सीमा शुल्क घोषणा अपेक्षित है। 4. ऐसी डाक वस्तुएँ जिसमें स्टैम्प टेबल, चेक, हुंडी, बैंक नोट, पैक पोस्ट बिल, बिल ऑफ एक्सचेंज शामिल हों। 5. कोई भी डाक वस्तु जिसके आवरण पर 'पंजीकृत' शब्द लिखा हुआ हो। 6. ऐसी कोई पंजीकृत डाक वस्तु जिसको वितरित किए जाने के उपरान्त दुबारा डाक से प्रेषित किया जाता है। 7. कोई भी मूल्य देय डाक वस्तु। प्रश्न 5. डाक वस्तुओं को पंजीकृत करने की विधि लिखिए। उत्तर—डाक वस्तुओं को पंजीकृत करने की विधि— 1. जिस वस्तु का पंजीकरण किया जाना है, उसे डाकघर की खिड़की पर प्रस्तुत करना होगा। रसीद उस व्यक्ति को दी जाएगी जो पंजीकरण हेतु वयस्क को पंजीकृत वस्तुओं को डाक से भेजने के लिए निर्धारित कार्य-समय के दौरान डाकघर की खिड़की पर प्रस्तुत करता है। 2. निम्नलिखित वस्तुओं को पंजीकरण हेतु स्वीकार नहीं किया जाएगा—(क) जहाँ इस आशय के शब्द का उल्लेख होगा कि इसे किसी निश्चित राशि के लिए बीमाकृत किया गया है अथवा किया जाना है अथवा यह कि इसमें कोई मूल्यवान अन्तर्वस्तु है जब तक कि इसको भी बीमाकृत नहीं किया जाता है, अथवा(ख) जहाँ ऐसे शब्द को काट दिया गया है।अंतर्राष्ट्रीय व पंजीकृत वस्तुओं के संबंध में दिया जाने वाला मुआवजा हानि/चोरी/पूर्ण क्षति के मामले में भारत के डाकघरों में बुक किए गए अन्तर्राष्ट्रीय पंजीकृत वस्तु के सम्बन्ध में दिया जाने वाला मुआवजा निम्नानुसार है हानि। पूर्ण चौरी/पूर्ण क्षति के लिए-30 एस डी आर (। एस डी आर 658222, 2009 के लिए)। SUPW | 13 4. विद्यालय प्रबन्धन पाठ-सार ● किसी विद्यालय में संगठनात्मक ढाँचे में प्रभावी रूप से दो परतें होती हैं—विभाग प्रमुख तथा प्रशासन। ● अच्छा विद्यालय छात्रों को अपने जीवन के सभी क्षेत्रों जैसे—शारीरिक, भौतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक, में प्रवीणता विकसित करता है। ● अच्छे विद्यालय ऐसे तंत्र बनाते हैं जो सरलता से छात्रों की लक्ष्यपूर्ति में सहायक हो सकें ● किसी भी संगठन में समय, व्यक्ति तथा धन हमेशा सीमित होते हैं ऐसी दशा में तंत्र को उन्हें उसी रूप में संभालना होता है। ● कोई भी विद्यालय समय सारणी या कैलेण्डर के बिना नहीं चल सकता। प्रत्येक तंत्र का एक लक्ष्य होना चाहिए। लक्ष्यों के साथ-साथ तंत्र की बदलते हैं। ● विद्यालय प्रबन्धन में प्रबन्धन समिति तथा प्रमुखों के साथ-साथ छात्रों की सहभागिता भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। ● सुव्यवस्थित अध्ययन एवं अध्यापन के लिए विद्यालय की स्वच्छता तथा हरियाली भी महत्वपूर्ण है। छात्रों का विद्यालय में वृक्षारोपण में योगदान होना चाहिए। ● वृक्ष वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं तथा पशु-पक्षियों को आश्रय भी देते हैं। वृक्षों से अनेक उपयोगी वस्तुएँ भी प्राप्त होती हैं। ● स्वच्छता हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण विषय है। स्वच्छता और सफाईहीन वातावरण में हमारा जीना दुष्कर होता है। हमारे देश में स्वच्छता के मूलमंत्र को पहचान कर 'स्वच्छ भारत' अभियान चलाया गया है। ● पर्यावरण को हरा-भरा और प्रदूषण मुक्त बनाए रखने में वृक्षों का महत्वपूर्ण योगदान है। विद्यालय में पड़े-पौधे व पुष्पों वाले पौधों से युक्त वाटिका होगी तो विद्यालय प्रवेश करते ही मन उत्साह से परिपूर्ण हो जाएगा। ● कचरा प्रबन्धन का अर्थ अपशिष्ट पदार्थों को अहानिकारक बनाकर इन्हें पुनः उपयोग में लाना है। ● विद्यार्थियों का पढ़ाई के साथ-साथ खेलने हेतु उत्साहवर्धन आवश्यक है। इससे इनका शारीरिक और मानसिक विकास होता है तथा सहभागिता की भावना विकसित होती है। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. जीवन के लिए अधिक महत्व है— (अ) पेड़ों का (ब) कुर्सियों का (स) गहनों का (द) किसी का नहीं। 2. वन सहायक होते हैं— (अ) बाढ़ को रोकने में (ब) भूमि का कटाव रोकने में (स) मरुस्थल के प्रसार को रोकने में (द) उपरोक्त सभी में। 3. परिवहन का सबसे प्राचीन साधन क्या है— (अ) सड़क (ब) रेल (स) बस (द) वायुयान। 4. देश के बड़े शहरों को जोड़ने वाला राजमार्ग है— (अ) राज्यमार्ग (ब) राष्ट्रीय मार्ग (स) जिला मार्ग (द) ग्रामीण मार्ग। 5. खेल कूद से शरीर में होती है? (अ) कसरत (ब) लचीलापन (स) स्फूर्ति (द) तीनों। 6. विद्यालय प्रधान कौन होता है? (अ) प्रधानाचार्य (ब) कर्मचारी (स) शिक्षक (द) विद्यार्थी। 7. विद्यालय को उपयुक्त वातावरण देने व विद्यालय को सुचारु रूप से चलाने के लिए किन-किन सदस्यों की आवश्यकता होती है। (अ) शिक्षक (ब) प्रधानाचार्य (स) विद्यार्थी (द) उपरोक्त सभी। उत्तर—1. (अ), 2. (द) 3. (अ), 4. (ब), 5. (द), 6. (अ), 7.(द)। लघूउत्तरात्मक प्रश्न प्रश्न 1. भारत में सड़कों को कितने वर्गों में बाँटा गया है? उत्तर—भारत में सड़कों को तीन वर्गों में बाँटा गया है—1. राष्ट्रीय महामार्ग, 2. राज्य महामार्ग, 3. जिला व ग्रामीण सड़क प्रश्न 2. भारत में कितने राष्ट्रीय राजमार्ग हैं? उत्तर—भारत में 219 राष्ट्रीय राजमार्ग हैं। प्रश्न 3. कचरा प्रबन्धन क्या है? उत्तर—व्यर्थ अपशिष्ट पदार्थों को उपयोग में लाने योग्य बनाना ही कचरा प्रबन्धन कहलाता है। प्रश्न 4. स्थानीय स्तर पर खेल मैदान संरक्षण हेतु क्या प्रयास करने चाहिए? उत्तर—शाला प्रधान यह जाँच करें कि खेल मैदान की दीवार टूटी हुई हो नहीं है। यदि टूटी हुई है तो इसकी मरम्मत हेतु प्रयास करना चाहिए। अपने विभाग से इस हेतु आवश्यक राशि आवंटित करवाने हेतु प्रयास करें। चार दीवारी के लिए आस-पास के क्षेत्र के गाँवों मोहल्लों के गणमान्य व्यक्तियों एवं अभिवावकों को विद्यालय में दान देने हेतु प्रोत्साहित करें। 14 | रतन पास बुक, कक्षा—9 प्रश्न 5. भारत वर्ष को सम्पूर्ण स्वच्छ रखने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका किसकी है? उत्तर—भारत वर्ष के सम्पूर्ण स्वच्छ रखने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका विद्यार्थियों की है। प्रश्न 6. भारत सरकार द्वारा "स्वच्छ भारत अभियान" गाँधीजी की कौन-सी जयन्ती पर शुरू किया गया? उत्तर— प्रश्न 7. भारत को स्वच्छ बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए? उत्तर—भारत को स्वच्छ बनाए रखने के लिए आम जनता में जागृति उत्पन्न करनी चाहिए। हमें अपने घर, गली, मुहल्लों, सड़कों, हर गाँव एवं शहर में स्वच्छता अभियान को आगे बढ़ाना चाहिए। व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक स्तर पर स्वच्छता रखनी चाहिए। निबन्धात्मक प्रश्न प्रश्न 1. रास्तों के रखरखाव व संरक्षण के लिए क्या करना चाहिए? उत्तर—रास्तों के रखरखाव व संरक्षण के लिए निम्नलिखित प्रयास करने चाहिए— 1. सीमा सड़क मार्गों के निर्माण, मरम्मत तथा रखरखाव का संचालन एवं नियंत्रण "सीमा सड़क संगठन" करता है। इन सड़क मार्गों का सामरिक एवं अर्थिक महत्व है। 2. सड़क निर्माण में भारतीय सीमा सड़क संगठन के इंजीनियरों ने कुशलता एवं साहस का परिचय दिया है। भारत की अधिकांश सीमावर्ती सड़कें उन क्षेत्रों में बनाई गई हैं जहाँ की जलवायु दुष्कर एवं असहय है। 3. जिला व ग्रामीण सड़कों का निर्माण, परिवहन संचालन, रख-रखाव, मरम्मत इत्यादि का प्रबंध जिला पंचायत, जनपद पंचायत एवं ग्राम पंचायत जैसे स्वायत्त संस्थानों द्वारा किया जाता है, जिन्हें अर्थिक सहायता राज्य कोष से उपलब्ध करायी जाती है। 4. कम दूरी के लिए सड़क परिवहन आदर्श साधन है। सड़कों का रेल स्टेशनों को आन्तरिक नगरों, कस्बों, गाँवों से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान है। 5. रास्तों को सही ढंग से रखने से पर्यटन उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा। 6. सड़क मार्गों को पहाड़ी क्षेत्रों के अधिक ढलान वाले भागों में भी बनाया जा सकता है, पहाड़ में बिना सुरंग बनाए घुमावदार सड़कों बनाकर पहाड़ को पार किया जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में रेललाइन बनाना अधिक खर्चीला तथा कठिनाई भरा होता है। प्रश्न 2. अनुचित व्यक्तिगत आदर्श बताइए। उत्तर—अनुचित व्यक्तिगत आदर्श— 1. व्यक्तिगत स्तर पर साफ-सफाई न रखना, नियमित रूप से स्नान नहीं करना। दाँतों को साफ नहीं करना, कपड़ों की साफ-सफाई न करना आदि। 2. संतुलित भोजन न करना, समय पर नहीं खाना, खाद्य वस्तुओं की स्वच्छता पर ध्यान न देना, गरिष्ठ भोजन ग्रहण करना आदि। 3. अपने घर की सफाई न रखना, कूड़े-कचरे का सही प्रबंधन न करना। 4. अपने आस-पास सफाई न करना, जगह-जगह गंदगी फैलाना, गली, सड़कों नालियों में कचरा फैलाना आदि। 5. गलत आदर्श जैसे—तम्बाकू खाना, शराब पीना या नशीली वस्तुओं का सेवन करना इत्यादि। प्रश्न 3. अपशिष्ट पदार्थों के पुनः प्रयोग पर लेख लिखिए। उत्तर—कचरा अर्थात् व्यर्थ अपशिष्ट पदार्थों को उपयोग में लाने योग्य बनाना कचरा प्रबन्धन कहलाता है। आजकल घरों, उद्योगों एवं बाजारों में भारी मात्रा में कचरा पैदा होता है जो सभी के लिए एक समस्या बन गया है। कचरे की समस्या से निजात पाने के लिए कुछ प्रयासों की आवश्यकता है। अपशिष्ट पदार्थों के पुनः प्रयोग से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए हमें कुछ प्रयास करने होंगे— 1. कुछ अपशिष्ट पदार्थ सूक्ष्म जीवों द्वारा सड़ा-गला दिए जाते हैं। ऐसे पदार्थों का उपयोग खाद बनाने में कर लिया जाना चाहिए; जैसे—सब्जियों व फलों के छिलके, पत्तियाँ, वनस्पति अपशिष्ट आदि। 2. प्लास्टिक, लोहा, टिन, काँच आदि को पुनः चक्रण के लिए भेजना चाहिए। 3. कुछ वस्तुओं जैसे—खाली डिब्बों, बोतलों आदि को अन्य वस्तुएँ रखने के लिए प्रयोग में लेना चाहिए। 4. प्लास्टिक की थैलियों के बजाय कपड़े या कागज के थैले प्रयोग करने चाहिए। प्रश्न 4. विद्यालय प्रबन्धन में छात्रों की सहभागिता लिखिए? विद्यालय प्रबन्धन के लक्ष्य लिखिए। उत्तर—विद्यालय प्रबन्धन में छात्रों की सहभागिता—किसी भी विद्यालय में अध्यापक अच्छा अध्यापन एवं विद्यार्थी अच्छा अध्ययन तभी कर पाऐंगे जब विद्यालय परिसर में साफ-सफाई हो, इधर-उधर कचरा बिखरा न हो, पेड़-पौधों की हरियाली हो, छोटी-सी वाटिका हो, समतल एवं साफ-सुथरा मैदान हो, विद्यालय के अन्दर व बाहर अच्छा रास्ता हो। छात्र इन सभी चीजों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं— 1. छात्र अपने विद्यालय को साफ-सुथरा रखने में सहयोग कर सकते हैं। 2. छात्र विद्यालय परिसर में वृक्षारोपण करके इसे हरा-भरा बना सकते हैं। 3. छात्र विद्यालय परिसर में वृक्षारोपण करके इसे हरा-भरा बना सकते हैं। प्रश्न 4. विद्यालय प्रबन्धन में छात्रों की सहभागिता लिखिए? विद्यालय प्रबन्धन के लक्ष्य लिखिए। उत्तर—विद्यालय प्रबन्धन में छात्रों की सहभागिता—किसी भी विद्यालय में अध्यापक अच्छा अध्यापन एवं विद्यार्थी अच्छा अध्ययन तभी कर पाऐंगे जब विद्यालय परिसर में साफ-सफाई हो, इधर-उधर कचरा बिखरा न हो, पेड़-पौधों की हरियाली हो, छोटी-सी वाटिका हो, समतल एवं साफ-सुथरा मैदान हो, विद्यालय के अन्दर व बाहर अच्छा रास्ता हो। छात्र इन सभी चीजों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं— 1. छात्र अपने विद्यालय को साफ-सुथरा रखने में सहयोग कर सकते हैं। 2. छात्र विद्यालय परिसर में वृक्षारोपण करके इसे हरा-भरा बना सकते हैं। SUPW | 15 3. विद्यार्थी समाज में अपने क्षेत्र में वृक्षारोपण के लिए जागरूकता पैदा कर सकते हैं।4. विद्यालय की वाटिका तैयार कर सकते हैं।5. विद्यालय को गन्दा न करके इसकी सुन्दरता बनाए रख सकते हैं। विद्यालय प्रबन्धन के लक्ष्य 1. विद्यार्थियों में अच्छे व्यक्तित्व का विकास करना। 2. सीमित संसाधनों में प्रबन्धन करना। 3. विद्यार्थियों को सार्वजनिक परीक्षाओं में प्रवेश हेतु योग्य बनाना। 4. विद्यार्थियों को अच्छे महाविद्यालयों में प्रवेश योग्य बनाना। 5. विद्यार्थियों को अच्छी शैक्षिक जानकारी व विवादों को सूझ-बूझ से हल करने की सीख देना। 6. गैर शैक्षिक क्षेत्रों में श्रेष्ठता विकसित करना। 7. छात्रों को अच्छा जीवन जीने के लिए तैयार करना। 8. अध्यापकों के समुदाय तक पहुँच बनाते हुए बाहरी दुनिया से भागीदारी हेतु तैयार करना। प्रश्न 5. वृक्ष हमें क्या-क्या देते हैं? उत्तर—वृक्ष हमारे लिए वरदान हैं। ये हमें जीवन देते हैं। वृक्ष हमें प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से निम्नलिखित वस्तुएँ देते हैं— 1. वृक्ष हमारे पर्यावरण को स्वच्छ बनाते हैं जिसमें हम स्वच्छ साँस लेते हैं। 2. वृक्ष हमारे पर्यावरण को हरा-भरा बनाते हैं जो हमारे लिए आनन्ददायी होता है। 3. वृक्ष वर्षा कराने में मदद करते हैं। 4. वृक्ष भूमि-कटाव को रोकते हैं। 5. वृक्ष हमें भोजन, ईंधन, फल, सब्जियाँ, गोंद, रेशा, औषधियाँ आदि प्रदान करते हैं। 6. वृक्ष अनेक जीव-जन्तुओं को आश्रय प्रदान करते हैं। 7. वृक्ष वायु एवं ध्वनि के प्रदूषण को कम करते हैं। प्रश्न 6. वृक्षों की कटाई के दुष्परिणाम लिखिए। उत्तर—पृथ्वी पर वनों की हरियाली घटने लगी है, क्योंकि जनसंख्या विस्फोट के कारण वनों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। वन क्षेत्रों में खननकार्य, अत्यधिक पशुचारण, वनों को जलाकर अस्थाई कृषि करने के कारण भारत में वन क्षेत्र निरंतर कम होते जा रहे हैं। इसके भारी दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं; जैसे— 1. वातावरणीय असंतुलन पैदा होना, कहीं अत्यधिक गर्मी, कहीं सूखा, इत्यादि। 2. बाढ़ आने पर भूमि का अत्यधिक कटाव होना। 3. वातावरणीय प्रदूषण में वृद्धि। 4. वायुमण्डलीय CO2 का स्तर बढ़ने से वैश्विक ऊष्मीकरण होना। 5. वन्य जीव जन्तुओं के आवासों का नष्ट होना परिणामस्वरूप वन्य जीवन की क्षति होना। 6. देश की सम्पन्नता की क्षति होना। प्रश्न 7. वृक्षारोपण का महत्व लिखिए। उत्तर—वृक्षारोपण का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से बहुत बड़ा महत्व है। वृक्ष किसी भी देश की सम्पन्नता के प्रतीक हैं। वृक्षों के महत्व का जितना गुणगान किया जाए उतना कम है। वनों के निम्नलिखित प्रमुख महत्व हैं— 1. वृक्ष पृथ्वी को हरा-भरा बनाए रखते हैं, जिन स्थानों में पेड़-पौधे पर्याप्त संख्या में होते हैं वहाँ निवास करना आनन्ददायी होता है। 2. वृक्ष जलवायु को आर्द्र व सम बनाते हैं जिससे वर्षा अधिक होने की संभावना रहती है। वृक्षों से प्राकृतिक सौंदर्य बढ़ता है जो पर्यटकों को आकर्षित करता है। 3. वृक्ष बाढ़ को रोकने, भूमि कटाव व मरुस्थल के प्रसार को रोकने में सहायक होते हैं। वनों से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है क्योंकि पेड़-पौधों की पत्तियाँ सड़-गलकर खाद बनाती रहती हैं। 4. वृक्ष वायुमण्डल को प्रदूषण रहित बनाने में भी सहायक होते हैं। 5. वृक्षों से इमारती लकड़ी प्राप्त होती है जिसका उपयोग फर्नीचर, कृषि उपकरण एवं भवन निर्माण में होता है। 6. वनों से ईंधन व उत्तम चारागाह की व्यवस्था होती है। प्रश्न 8. वृक्षों के संरक्षण के उपाय लिखिए। वृक्षारोपण में विद्यार्थियों की क्या सहभागिता है ? उत्तर—राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश में 33 प्रतिशत भू-भाग पर वन होने चाहिए लेकिन भारत में वन 22.7 प्रतिशत भाग पर ही हैं। इसलिए वनों के विकास एवं विस्तार की वर्तमान समय में अत्यंत आवश्यकता है। इस दिशा में सरकार तो अनेक प्रयत्न कर ही रही है। हमें भी सामाजिक एवं व्यक्तिगत स्तर पर वृक्षारोपण हेतु विशेष प्रयास करने चाहिए। वृक्षों के संरक्षण के लिए निम्न उपाय किए जाने चाहिए— (i) वनों की अंधाधुंध कटाई रोकी जाए और कृषि कार्य से अतिरिक्त भूमि पर वृक्षारोपण किया जाए। (ii) तालाबों, नहरों सड़कों आदि के किनारे औद्योगिक क्षेत्रों, आवासीय व सरकारी परिसरों में अधिक से अधिक वृक्ष लगाने चाहिए। (iii) वृक्षों के प्रति समाज में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित कर वनों को राष्ट्रीय धरोहर माना जाए। (iv) वृक्षारोपण में जन सहभागिता बढ़ायी जाए। (v) वनों को विकसित एवं संरक्षित करने वाले विभिन्न कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाए। (vi) वन अनुसंधान कार्यों में तेजी लायी जाए तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाए। वृक्षारोपण में विद्यार्थियों की सहभागिता—विद्यार्थी समाज में अपने क्षेत्र में वृक्षारोपण के लिए जागरूकता पैदा कर 16 | रतन पास बुक, कक्षा—9 महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं। इसके लिए विद्यार्थी अपने क्षेत्र में घर-घर जाकर नागरिकों को वृक्षों की उपयोगिता बताते हुए वृक्षारोपण हेतु प्रेरित कर सकते हैं। विद्यार्थियों द्वारा सामूहिक रेली निकाल कर भी वृक्षारोपण, की प्रेरणा दी जा सकती है। विद्यार्थी स्वयं अपने घर के आस-पास, विद्यालय परिसर एवं अन्य खाली स्थानों पर वृक्ष लगाकर उनकी देखभाल कर सकते हैं। अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. किसी विद्यालय में संगठनात्मक ढाँचे में प्रभावी रूप से परतें होती हैं— (अ) दो (ब) तीन (स) चार (द) पाँच। 2. विद्यालय प्रबन्धन का कार्य है— (अ) विद्यार्थियों को सर्वांगीण विकास लायक बनाना(ब) शिक्षकों को शिक्षण का वातावरण उपलब्ध करवाना(स) छात्रों का अच्छा मार्गदर्शन(द) ये सभी। 3. वृक्ष सहायक हैं— (अ) पर्यावरण संतुलन में (ब) प्रदूषण कम करने में(स) वर्षा कराने में (द) ये सभी। 4. अपशिष्ट प्रबन्धन का तात्पर्य है— (अ) अपशिष्ट पदार्थों को एकत्र करके रखना(ब) अपशिष्ट पदार्थों को उपयोग योग्य बनाना(स) अपशिष्ट पदार्थों को सड़क पर एकत्र करना(द) अपशिष्ट पदार्थों को जला देना। 5. राष्ट्रीय महामार्गों की सकल लम्बाई है— (अ) 45500 किमी (ब) 65500 किमी(स) 75000 किमी (द) 10500 किमी। 6. सामान्य सड़क घनत्व है— (अ) मध्य प्रदेश में (ब) महाराष्ट्र में(स) गुजरात में (द) उत्तर प्रदेश में। 7. देश का कितने प्रतिशत यातायात राष्ट्रीय महामार्गों पर होता है— (अ) 20% (ब) 30% (स) 40% (द) 50%। उत्तर—1. (अ) 2. (द) 3. (द) 4. (ब) 5. (ब) 6. (अ) 7. (स)। अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. विद्यालय के ग्राहकों के प्रकार बताइए। उत्तर—विद्यालय के ग्राहक दो प्रकार के होते हैं—स्कूल के संपर्क में आने वाले छात्र तथा उनके माता-पिता। प्रश्न 2. विद्यालय का एक महत्वपूर्ण कार्य लिखिए। उत्तर—विद्यालय छात्रों के लिए एक सकारात्मक शिक्षण परिवेश बनाने में सहायक होता है। प्रश्न 3. वृक्षारोपण का क्या अर्थ है? उत्तर—वृक्षारोपण का अर्थ वृक्ष लगाना है? प्रश्न 4. भारत में कितने क्षेत्र पर वन हैं? उत्तर—भारत में 22.7 प्रतिशत भाग पर वन हैं। प्रश्न 5. पर्यावरण को वृक्ष किस प्रकार स्वच्छ करते हैं? उत्तर—वृक्ष वातावरण से हानिकारक गैसों को अवशोषित करते हैं। प्रश्न 6. शारीरिक स्वास्थ्य के लिए क्या आवश्यक है? उत्तर—पौष्टिक भोजन, स्वच्छ वातावरण, योगासन एवं प्रणायाम। प्रश्न 7. सड़क घनत्व का क्या आशय है? उत्तर—सड़क घनत्व का आशय प्रति 10 वर्ग किमी क्षेत्र पर सड़कों की कुल लम्बाई से है। प्रश्न 8. वनों से प्राप्त होने वाली चार वस्तुओं के नाम लिखिए उत्तर—वनों से प्राप्त वस्तुएँ—(i) भोजन, (ii) वस्त्र निर्माण के लिए रेशा, (iii) मकान व फर्नीचर बनाने के लिए लड़की, (iv) गोंद, रेजिन, औषधियाँ। प्रश्न 9. कचरा प्रबन्धन में आने वाली समस्याएँ कौन-कौन सी हैं? उत्तर—कचरा प्रबन्धन में आने वाली समस्याएँ— 1. अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि, 2. अनुचित व्यक्तिगत आदतें, 3. तकनीकी विज्ञान, 4. जागरूकता की कमी। लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. विद्यालय प्रबन्धन के तत्व लिखिए। उत्तर— चित्र—प्रबन्धन के तत्व प्रश्न 2. विद्यालय के प्रमुख कार्य लिखिए। उत्तर—विद्यालय के प्रमुख कार्य— (i) विद्यालय छात्रों के शारीरिक, भौतिक, सामाजिक व अध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवीणता विकसित करता है। (ii) विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास होने लायक वातावरण बनाता है। (iii) शिक्षकों व छात्रों को अध्यापन एवं अध्ययन हेतु उपयुक्त वातावरण प्रदान करता है। SUPW | 17 (iv) छात्रों को भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है। प्रश्न 3. वृक्ष वातावरण को कैसे स्वच्छ रखते हैं? उत्तर—वृक्ष वायु के प्राकृतिक शोधक होते हैं। ये वायु में उपस्थित हानिकारक कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित करते हैं तथा ऑक्सीजन छोड़ते हैं। जन्तु इस ऑक्सीजन को श्वसन के लिए प्रयोग करते हैं। कार्बन डाईऑक्साइड वायुमंडल में जन्तुओं की श्वसन क्रिया व ईंधन के जलने से आती है। प्रश्न 4. विद्यालयी खेलकूद का क्या महत्व है? उत्तर—विद्यालय में अध्ययन के अलावा खेलकूद व अन्य सह-शैक्षणिक गतिविधियाँ जैसे-नृत्य, गायन, वाद्ययंत्र बजाना, वाद-विवाद लेखन, अन्त्याक्षरी आदि से संबंधित प्रतियोगिताएँ चलती रहनी चाहिए। खेलकूद से शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है तथा मन भी अच्छा रहता है। खेलकूद से हमें बीमारियाँ नहीं होती हैं। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है। प्रश्न 5. सड़क परिवहन के विकास का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर—भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् सड़कों की लम्बाई में बहुत वृद्धि हुई है। पक्की सड़कों की लम्बाई 1950-51 में 1.57 लाख किमी से बढ़कर 1997 में 13.94 लाख किमी हो गई। इस अवधि में कच्ची सड़कों की लम्बाई 2.42 लाख किमी से बढ़कर 10.71 लाख किमी से भी ज्यादा हो गई। विस्तृत उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. विद्यालय एक सकारात्मक शिक्षण परिवेश बनाने में सहायक होता है। इस कथन को समझाइए। उत्तर—अच्छे विद्यालय ऐसे तंत्र बनाते हैं जो सरलता से इनकी लक्ष्यपूर्ति में सहायक हो सकें। ये तंत्र अध्यापकों चित्र—विद्यालय एक सकारात्मक शिक्षण परिवेश बनाने में सहायक होता है। को भी समर्थन देते हैं तथा ध्यान रखते हैं कि रचनात्मक वातावरण में सक्षमता का विकास हो। ये शिक्षा तंत्र प्रबन्धन द्वारा बनाए जाते हैं। इस बात को हम निम्नलिखित रेखांकन द्वारा समझ सकते हैं। प्रश्न 2. स्वच्छता का हमारे जीवन में क्या महत्व है? इसके लिए किये जा रहे प्रयास का विवरण दीजिए। उत्तर—स्वच्छता और सफाई के बिना हम ठीक प्रकार से जी नहीं सकते हैं। घरों के आस-पास सफाई के अभाव में मक्खी व मच्छरों का प्रकोप बढ़ता है जिससे तरह-तरह की बीमारियाँ फैलती हैं। गंदगी के कारण टी.बी., हैजा, टाइफाइड, चिकनपाँव आदि अनेक बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। गंदगीयुक्त वातावरण में किसी भी प्रकार का कार्य करने का मन नहीं करता। विद्यार्थियों के लिए तो स्वच्छता और भी महत्वपूर्ण है। अतः इन सभी कारणों को देखते हुए हमें अपनी व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक स्वच्छता सदैव रखनी चाहिए। स्वस्थ शरीर रखने के लिए हमें अपने घर एवं आस-पास की भी स्वच्छता रखनी चाहिए। स्वच्छता के मूल मंत्र को पहचान कर ही 'स्वच्छ भारत अभियान' चलाया गया है। इस अभियान को स्वच्छ भारत मिशन व स्वच्छता अभियान के नाम से भी जाना जा रहा है। इस अभियान ने अन्तर्गत मोहल्लों, कार्यालयों, गलियों, सड़कों की अच्छी तरह साफ-सफाई रखना, देश के सभी घरों में शौचालयों का निर्माण और देश के बुनियादी ढाँचे को बदलना आदि शामिल है। प्रश्न 3. भारत वर्ष को सम्पूर्ण स्वच्छ रखने में विद्यार्थी किस प्रकार अपनी सहभागिता निभा सकते हैं? समझाइए। उत्तर—भारत वर्ष को सम्पूर्ण स्वच्छ रखने में विद्यार्थी निम्न प्रकार से अपनी महत्वपूर्ण सहभागिता निभा सकते हैं— 1. विद्यार्थी को साफ-सफाई से रहने का महत्व समझकर रोजना प्रातः जल्दी उठकर दंतमंजन व स्नान की आदत डालनी चाहिए। 2. धुले हुए एवं साफ-सुथरे कपड़े पहनने चाहिए। 3. घर में साफ-सफाई रखने में अपनी माता जी का सहयोग करना एवं आवश्यक हो तो स्वयं घर पर झाड़ू लगाना। 4. घर के आस-पास गंदगी जमा न होने देना। 5. विद्यालय के रास्ते में मिलने वाली गन्दगी को थोड़ा-थोड़ा करके हटा सकते हैं और संबंधित नगर परिषद, नगर निगम या ग्राम पंचायत से शिकायत कर सकते हैं। 6. अपने विद्यालय की स्वच्छता पर ध्यान देना चाहिए। अपने स्कूल की कुर्सी मेज, स्टूल आदि को व्यवस्थित रखना चाहिए। कागज के टुकड़े व कूड़े को कचरा पात्र में डालना चाहिए। प्रश्न 4. वाटिका संरक्षण क्या है? वाटिका में कौन से पेड़-पौधे होने चाहिए? समझाइए। 18 | रतन पास बुक, कक्षा—9 उत्तर—पर्यावरण को हरा-भरा और प्रदूषण मुक्त बनाए रखने में वृक्षों का महत्वपूर्ण योगदान है। एक वृक्ष सौ पुत्रों से भी बढ़कर है क्योंकि वह जीवन भर अपने पालक को समान एवं निस्वार्थ भाव से लाभ पहुँचाता रहता है। विद्यालय में पेड़-पौधों व पुष्पों वाले पौधों से युक्त वाटिका होगी तो विद्यालय प्रवेश करते ही मन उत्साह से परिपूर्ण हो जाएगा। वाटिका में चारों तरफ छोटे पौधों की हैज लगानी चाहिए तथा जगह-जगह आकर्षक पौधे लगाने चाहिए। कुछ पौधे ऐसे होते हैं जो बिना फूल वाले होते हैं परन्तु उनकी पत्तियाँ बहुत सुन्दर लगती हैं। कुछ पौधे वर्षपर्यन्त आकर्षक फूल देते हैं। कुछ पौधे विशेष ऋतु में आकर्षक फूल देते हैं। वाटिका को विभिन्न प्रकार के पौधों से आवश्यकतानुसार इस तरह जमीन या गमलों में लगाना चाहिए कि वाटिका आकर्षक लगे। वाटिका में ऐसे पेड़-पौधों को महत्व देना चाहिए जिनका भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। पीपल, आँवला, तुलसी, बेल, बरगद, कमल, जामुन, बकुल, तेंदु, अशोक, कदली, शमी, कदम, गूलर, नीम आदि पेड़ विद्यालय की वाटिका में लगाने चाहिए। प्रश्न 5. भारत में सड़कों के प्रकारों का संक्षिप्त विवरण दीजिए— उत्तर—भारत में सड़कों को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है— 1. राष्ट्रीय महामार्ग—राष्ट्रीय महामार्ग प्रमुख मार्ग हैं जो देश के बड़े शहरों को जोड़ते हैं। इन मार्गों का निर्माण, रख-रखाव मरम्मत इत्यादि का संचालन केन्द्र सरकार द्वारा होता है। राष्ट्रीय महामार्गों की लम्बाई 65500 किमी है। भारत में 219 राष्ट्रीय महामार्ग हैं। 2. राज्य मार्ग—राज्य महामार्ग राज्यों द्वारा बनाए तथा देखरेख किए जाते हैं। राज्य सड़क परिवहन विभाग, राज्य के लोक निर्माण विभाग इन सड़कों के निर्माण, रखरखाव व मरम्मत इत्यादि का संचालन करते हैं। राज्य महामार्ग राज्य की राजधानी को राज्य के सभी जिला मुख्यालयों से जोड़ते हैं। 3. जिला तथा ग्रामीण सड़क—जिला तथा ग्रामीण सड़कों जिला मुख्यालय, छोटे कस्बों और ग्रामों को परस्पर जोड़ती हैं। प्रश्न 6. राष्ट्रीय महामार्ग विकास परियोजना के अन्तर्गत सड़कों के नवीन विकास को समझाइए। उत्तर—राष्ट्रीय महामार्ग विकास परियोजना (एन. एच. डी. पी.) के अन्तर्गत सड़कों का नवीन विकास—इस परियोजना के अन्तर्गत हाल ही में कई सड़कों का विकास हुआ है। भारत सरकार ने देश के आर्थिक विकास को प्रोन्नत एवं गतिमान करने के उद्देश्य से जिस परियोजना को संचालित किया उसे “राष्ट्रीय महामार्ग विकास कार्यक्रम (एन. एच. डी. पी.)” कहा जाता है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रथम दो चरणों के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा चुका है तथा सरकार अब तृतीय चरण में सुनिश्चित लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है। राष्ट्रीय महामार्ग देश के नगरों, महानगरों को जोड़ते हैं यद्यपि इनकी कुल लम्बाई पूरी पक्की सड़क की कुल लम्बाई का मात्र 2% ही है किन्तु देश का 40 प्रतिशत यातायात इन्ही राष्ट्रीय महामार्गों पर होता है। 5. आवागमन के सार्वजनिक साधन पाठ-सार ● आजकल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए समय बचाने हेतु आवागमन के विभिन्न साधनों जैसे—बस, रेल, हवाई जहाज आदि का उपयोग किया जाता है। ● आज के युग में समय प्रबन्धन अत्यंत आवश्यक है। रेल व बस यात्रा करने से पहले इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि रेलवे स्टेशन या बस स्टेशन पर आपका अधिक समय बर्बाद न हो। इसके लिए हमें रेलवे की समय-सारणी का अवलोकन कर लेना चाहिए। ● स्टेशनों पर रेलवे समय-सारणी अधिकांशतः हिन्दी व अँग्रेजी में लिखी होती है ताकि आम आदमी इसे पढ़ सके। इसके अतिरिक्त आजकल नेट पर भी रेलवे व बस की समय-सारणी देखी जा सकती है। ● समय-सारणी के अलावा नक्शे से रेलमार्ग की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और यह भी ज्ञात कर सकते हैं कि अमुक रेलगाड़ी कौन-कौन से स्टेशनों से होकर गुजरती है। ● प्रत्येक रोडवेज बस स्टैण्ड पर एक सूचना-पट्ट पर वहाँ आने-जाने वाली बसों का समय व किराया लिखा हुआ होता है। ● आवागमन की सुविधा के कारण पर्यटन में वृद्धि हो रही है। बड़े शहरों में घूमने के लिए हमें मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। यात्री मार्गदर्शिका उपलब्ध हो जाने पर मार्गदर्शक की भी आवश्यकता नहीं होती। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. रेलवे व बस स्टेशन पर जाने से पहले किस बात का ध्यान रखना चाहिए? (अ) समय (ब) नक्शा (स) चिन्ह (द) तीनों। उत्तर—(अ) समय। 2. रेल विभाग साल में, रेलों के समय में कितनी बार परिवर्तन करता है? SUPW | 19 (अ) चार बार (ब) दो बार(स) तीन बार (द) एक बार। उत्तर—(ब) दो बार। लघूत्तरात्मक प्रश्न प्रश्न 1. रेलवे-सारणी से हमें किन-किन बातों की जानकारी प्राप्त होती है? उत्तर—रेलवे-सारणी से हमें निम्नलिखित बातों की जानकारी प्राप्त होती है— 1. अमुक रेलगाड़ी किस-किस स्टेशन पर कितने-कितने बजे पहुँचती है। 2. ए. बी. सी. क्रम में रेलवे स्टेशनों की सूची। 3. रेलवे से संबंधित अधिकारियों के टेलीफोन व मोबाइल नम्बर। 4. रेलगाड़ी के का आगमन एवं प्रस्थान का समय। 5. आरक्षण, किराया तथा दूरी आदि की जानकारी। प्रश्न 2. अजमेर से जबलपुर रेल के रास्ते से कितनी किमी दूर है? उत्तर—अजमेर से जबलपुर रेल के रास्ते से 1028 किसी दूर है प्रश्न 3. रेलवे स्टेशनों पर अधिकांशतः समय- सारणी किन भाषाओं में लिखी रहती है? उत्तर—रेलवे स्टेशनों पर अधिकांशतः समय-सारणी हिन्दी एवं अँग्रेजी भाषाओं में लिखी रहती है। निबन्धात्मक प्रश्न प्रश्न 1. रेलवे/बस स्टैण्ड पर जाने से पहले यात्री को किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? उत्तर—रेलवे/बस स्टैण्ड पर जाने से पहले यात्री को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए— 1. सबसे पहले आवश्यकतानुसार बस या रेलगाड़ी की स्थिति को यात्रा के दिन के अनुसार पता कर लेना चाहिए। 2. आवश्यक हो तो पहले से ही अपनी सीट का आरक्षण करा लेना चाहिए और टिकट या रसीद को सँभाल कर रखना चाहिए। 3. रेलवे/बस की समय-सारणी को ठीक से समझ लेना चाहिए। 4. यात्रा के लिए आवश्यक सामान की समय से पहले पैकिंग कर लेना चाहिए। 5. रेल या बस यात्रा करने से पहले इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि रेलवे स्टेशन या बस स्टैण्ड पर आपका समय बर्बाद न हो। इसके लिए पहले से हमें इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि स्टेशन से अमुक रेलगाड़ी या बस कितने बजे रवाना होगी। स्टेशन से रवाना होने के बाद कौन-से स्टेशन पर कितने समय रुकेगी तथा अंतिम स्टेशन पर कितने बजे पहुँचेगी। 6. रेलवे या बस स्टेशन पर निर्धारित समय से लगभग आधा घंटा पहले पहुँच जाना चाहिए, जिससे आरक्षण आदि की स्थिति जान सकें। 7. यह आवश्यक है कि हमें रेलगाड़ी एवं बसों के आवागमन के सही समय की जानकारी हो। इस प्रकार की जानकारी के लिए रेल व बस समय-सारणी तथा विभिन्न मार्गों के नक्शों को देखना, समझना व रेलवे से संबंधित अन्य आवश्यक जानकारी करने सम्बन्धी ज्ञान आवश्यक है। प्रश्न 2. "आवागमन के सार्वजनिक साधनों का प्रयोग करते समय हमारी नैतिक जिम्मेदारी" विषय पर एक लेख लिखिए। उत्तर—"आवागमन के सार्वजनिक साधनों का प्रयोग करते समय हमारी नैतिक जिम्मेदारी"—हम आवागमन के लिए कई प्रकार के सार्वजनिक साधन जैसे बस, रेलगाड़ी हवाई जहाज आदि का प्रयोग करते हैं। ये प्रायः सार्वजनिक सम्पत्ति होती हैं और इनका उचित ढंग से उपयोग करना हमारा कर्तव्य है। इनका क्रियान्वयन हमारी सुविधा के लिए होता है। इन पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं। अतः हमें इनका प्रयोग करते समय कुछ नैतिक जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए— 1. हमें इन साधनों को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचानी चाहिए और न ही किसी अन्य व्यक्ति को हानि पहुँचने देनी चाहिए। 2. हमें आवागमन के साधनों को स्वच्छ रखना चाहिए। इनमें गंदगी न फैलाएँ और दूसरों को भी ऐसा करने से रोकना चाहिए। 3. रेलगाड़ी या बस में आवश्यक होने पर ही बल्ब या पंखों को चलाना चाहिए। 4. यात्रा के दौरान दूसरों की असुविधा को भी ध्यान में रखना चाहिए। 5. यात्रा के दौरान कम-से कम सामान लेकर यात्रा करनी चाहिए। अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. आधुनिक प्रतिस्पर्धा के युग में व्यक्ति का क्या प्रयास होना चाहिए? (अ) अधिक से अधिक धन कमाना (ब) अधिकांश समय विश्राम करना (स) कम समय में अधिक काम करना (द) अधिक श्रम के बदले कम दाम देना। 2. कहीं की यात्रा करने से पहले हमें जानकारी कर लेनी चाहिए— 20 | रतन पास बुक, कक्षा—9 (अ) बस या रेलगाड़ी के समय के बारे में(ब) रास्ते में होने वाले खर्चे के बारे में(स) गाड़ी में मिलने वाली सुविधाओं के बारे में(द) इनमें से कोई नहीं। 3. रेलवे की समय-सारणी देखी जा सकती है ? (अ) रेलवे स्टेशन पर (ब) इन्टरनेट पर(स) इन दोनों पर (द) टी. वी. पर। 4. दयोदया एक्सप्रेस कहाँ से कहाँ तक जाती है? (अ) आगरा से अजमेर (ब) अजमेर से जबलपुर(स) कोटा से पटना (द) इनमें से कोई नहीं। 5. बड़े शहरों में घूमने के लिए आवश्यकता होती है— (अ) नक्शे की (ब) मार्गदर्शक की(स) मार्गदर्शकिका की (द) इन सभी की। 6. किसी शहर की मार्गदर्शिका का प्रकाशन करता है— (अ) रेलवे विभाग (ब) नगरपालिका(स) पर्यटन विभाग (द) रोडवेज विभाग। 7. नक्शे में तीर का निशान होता है— (अ) रुकावट का (ब) दिशासूचक(स) खतरे का (द) सड़क का। उत्तर—1. (स) 2. (अ) 3. (स) 4. (ब) 5. (द) 6.(स) 7. (ब)। अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. हम आवागमन के किन त्वरित साधनों का उपयोग करते हैं? उत्तर—बस, रेलगाड़ी, हवाई जहाज, कार आदि साधनों का। प्रश्न 2. नीचे दी गई संक्षिप्त सारणी के आधार पर जयपुर से बाराँ के बीच की दूरी कैसे ज्ञात करेंगे? उत्तर— रेलवे समय-सारणी—दयोदया एक्सप्रेस के लिए | स्टेशनकोड | स्टेशन का नाम | आगमन | प्रस्थान | दूरी किमी | |---|---|---|---|---| | All | अजमेर जं. | — | 15:30 | 0 | | Fl | फुलेरा | 16:37 | 16:39 | 80 | | JP | जयपुर | 17:25 | 17:35 | 135 | | KOTA | कोटा जं. | 21:20 | 21:35 | 374 | | BAZ | बाराँ जं. | 22:25 | 22:30 | 441 | | JBP | जबलपुर | 08:45 दूसरे दिन | गन्तव्य | 1028 | उत्तर—उपरोक्त रेलगाड़ी अजमेर जंक्शन से जबलपुर जाती है। हम सारणी को देखकर बता सकते हैं कि जयपुर से बाराँ कितनी दूर है। सबसे अंतिम कॉलम में जयपुर के सामने 135 लिखा है तथा बाराँ के सामने 441 लिखा है। इन दानों राशियों का अन्तर 441 - 135 = 306 है अर्थात् जयपुर से बाराँ 306 किमी दूर है। प्रश्न 3. किसी बस स्टैण्ड पर लगी समय-सारणी व किराया सूची लिखिए। उत्तर—नीचे एक बस समय सारणी का नमूना दिया गया है— प्रश्न 2. समय की बचत के लिए हमें यात्रा से पहले क्या जानकारी कर लेनी चाहिए? उत्तर—रेलगाड़ी के स्टेशन पर आने तथा प्रस्थान के सही समय के बारे में जानकारी कर लेनी चाहिए। प्रश्न 3. रेलवे की मुद्रित समय सारणी कहाँ से प्राप्त की जा सकती है? उत्तर—बड़े रेलवे स्टेशनों एवं जंक्शनों पर। प्रश्न 4. नक्शे हमारे लिए क्यों उपयोगी होते हैं? उत्तर—नक्शों को देखकर हम आसानी से किसी स्थान पर पहुँच सकते हैं जहाँ पहले कभी नहीं गए हों। प्रश्न 5. नक्शे में विभिन्न स्थानों को कैसे दर्शाया गया होता है? उत्तर—नक्शे में विभिन्न स्थानों को चिन्हों द्वारा दर्शाया गया होता है। लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. रेलवे समय-सारणी क्या है? यह क्यों उपयोगी है? उत्तर—सभी रेलवे स्टेशनों पर वहाँ आने वाली तथा वहाँ से जाने वाली रेलगाड़ियों के नम्बर, नाम, आगमन समय तथा प्रस्थान समय से सम्बन्धित समय-सारणी दी हुई होती है, जिससे स्टेशन पर यात्री स्वयं रेलगाड़ियों के निश्चित आवागमन का पता कर सकते हैं। कई बड़े रेलवे स्टेशनों और जंक्शनों पर रेलवे की मुद्रित समय-सारणी भी मिल जाती है। रेलवे समय सारणी प्रायः हिन्दी व अंग्रेजी भाषा में मिलती है ताकि आम आदमी इसे पढ़ सके। इसके अतिरिक्त आजकल नेट पर भी रेलवे समय-सारणी देखी जा सकती है। SUPW | 21 | राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम | नोखा | 4:50 अपरान्ह | 100 | |---|---|---|---| | बस स्टैण्ड बीकानेर | नागौर | 6:00 सायं | 150 | | बस स्टैण्ड | किराया (र में) | मेड़ता | 8:15 रात्रि | 180 | | बीकानेर | 2:30 अपरान्ह | — | 9:30 रात्रि | 225 | | देशनोक | 3:00 अपरान्ह | 30 | अजमेर बस स्टैण्ड | 10:00 रात्रि | 250 | दीर्घ उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. किसी दैनिक रेलगाड़ी की उसके प्रस्थान से लेकर गन्तव्य स्थान तक की समय-सारणी बनाइए। उत्तर— | क्र.सं. (किमी में) | स्टेशन कोड | स्टेशन का नाम | आगमन समय | प्रस्थान समय | दूरी | |---|---|---|---|---|---| | 1. | All | अजमेर जं. | — | 15:30 | 0 | | 2. | KSG | किशनगढ़ | 15:56 | 15:58 | 29 | | 3. | FL | फुलेरा | 16:37 | 16:39 | 80 | | 4. | JP | जयपुर | 17:25 | 17:35 | 135 | | 5. | DPA | दुर्गापुरा | 17:42 | 17:44 | 142 | | 6. | BNLW | वनस्थली निवाई | 18:28 | 18:30 | 201 | | 7. | CKB | चौथ का बरवाड़ा | 19:03 | 19:05 | 245 | | 8. | SWM | सवाईमाधोपुर | 19:45 | 19:55 | 266 | | 9. | KOTA | कोटा जं. | 21:20 | 21:35 | 374 | | 10. | ATH | अंथ | 22:08 | 22:10 | 419 | | 11. | BAZ | बाराँ | 22:25 | 22:30 | 441 | | 12. | CAG | छाबरा गुगोर | 23:10 | 23:12 | 499 | | 13. | RTA | रूथिवाई | 00:15 दूसरा दिन | 00:20 दूसरा दिन | 538 | | 14. | GUNA | गुना | 00:45 दूसरा दिन | 00:50 दूसरा दिन | 559 | | 15. | ASKN | अशोक नगर | 01:26 दूसरा दिन | 01:28 दूसरा दिन | 603 | | 16. | MNV | मुंगोली | 02:07 दूसरा दिन | 02:09 दूसरा दिन | 649 | | 17. | MAKR | मलखेडी | 03:10 दूसरा दिन | 03:12 दूसरा दिन | 679 | | 18. | SGO | सौगोर | 04:11 दूसरा दिन | 04:13 दूसरा दिन | 749 | | 19. | DMO | दामोह | 05:16 दूसरा दिन | 05:18 दूसरा दिन | 827 | | 20. | KTE | कटनी | 07:05 दूसरा दिन | 07:15 दूसरा दिन | 938 | | 21. | SHR | सिरोही रोड | 07:56 दूसरा दिन | 07:58 दूसरा दिन | 990 | | 22. | JBP | जबलपुर | 08:45 दूसरा दिन | गन्तव्य | 1028 | प्रश्न 2. मार्गदर्शिका या नक्शे क्यों महत्वपूर्ण होते हैं? इन्हें कैसे पढ़ा जाता है? उत्तर—आधुनिक युग में प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी काम से एक शहर से दूसरे शहर आना-जाना होता है। आवागमन की सुविधा के कारण पर्यटन में वृद्धि हो रही है। बड़े शहरों में घूमने के लिए हमें मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है परन्तु यदि हमें किसी शहर की यात्री मार्गदर्शिका मिल जाए (जो. कि पर्यटन विभाग समय-समय पर प्रकाशित करता है।) तो बिना मार्गदर्शक हम स्वयं ही वांछित स्थानों व शहरों में जा सकते हैं। यात्री मार्गदर्शिका में किसी भी शहर के प्रमुख बाजारों व दर्शनीय स्थलों को दर्शाया जाता है। कहीं-कहीं पर नई बस्तियों में नक्शा बोर्ड या पत्थर पर भी दिया गया होता है। हम इसकी सहायता से वांछित स्थान पर पहुँच सकते हैं। इसलिए हमें नक्शों की जानकारी होनी चाहिए। नक्शे में तीर का निशान दिशा सूचक है। इस तरह के नक्शे मार्गदर्शिका में जगह-जगह पर होते हैं। बड़े नक्शों को पढ़कर हम भली प्रकार यात्रा कर सकते हैं। नक्शों में प्रमुख दर्शनीय स्थान, बाजार, स्मारक, बस स्टैण्ड, अस्पताल, महाविद्यालय, होटल, बाग बगीचे, खेल-मैदान आदि के स्थानों के संकेत भी दिए गए होते हैं। 22 | रतन पास बुक, कक्षा—9 6. विद्युत मीटर पाठ-सार ● आज के समय में बिजली रात को प्रकाश उत्पन्न करने का प्रमुख स्रोत है। ● बिजली का प्रयोग खेतों की सिंचाई, पम्प द्वारा पानी खींचने एवं अन्य कार्यों के लिए होता है। ● विभिन्न उद्योगों में मशीनों को चलाने के लिए भी बिजली का उपयोग किया जाता है। ● बहुत से घरेलू उपकरण जैसे—पंखे, कूलर, वॉशिंग मशीन, मिक्सी, हीटर, गीजर, इण्डक्शन कुकर, प्रगीज, एयरकण्डीशनर, विद्युत इस्तरी आदि बिजली द्वारा ही चलाए जाते हैं। ● विद्युत की आपूर्ति विद्युत विभाग द्वारा घरों में विद्युत लाइनों द्वारा की जाती है। ● उपभोक्ताओं को खर्च की गई बिजली का भुगतान विद्युत बिल के रूप में विद्युत विभाग को करना पड़ता है। ● घरों में खर्च की गई विद्युत की मात्रा को मुख्य लाइन से जोड़े गए विद्युत मीटर द्वारा आँका जाता है। ● मीटर में रीडिंग के आधार पर भुगतान योग्य राशि का बिल उपभोक्ता को भेज दिया जाता है। ● पुराने विद्युत मीटरों में एक चक्रीय प्रणाली होती है। जो शून्य से आरम्भ हो जाती है। विद्युत उपभोग के समय यह चक्र चलता रहता है और संख्या आगे बढ़ती रहती है। ● विद्युत खर्च किलोवाट घण्टा में प्रदर्शित होता है, जिसे हम सामान्य बोल-चाल की भाषा में यूनिट कहते हैं। ● आजकल अधिक उन्नत डिजिटल विद्युत मीटर लगाये जा रहे हैं। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. आजकल रात को प्रकाश करने का मुख्य स्रोत क्या है? | (अ) दीपक | (ब) चिमनी | |---|---| | (स) बिजली | (द) मोमबत्ती। | 2. उपभोक्ता द्वारा खर्च बिजली का मापन किसको आधार मानकर किया जाता है? | (अ) विद्युत मीटर | (ब) एमीटर | |---|---| | (स) स्विच बोर्ड से | (द) उपरोक्त तीनों। | उत्तर—1. (स) 2. (अ)। लघूत्तरात्मक प्रश्न प्रश्न 1. विद्युत ऊर्जा के उपयोग बताइए। उत्तर—विद्युत ऊर्जा के निम्नलिखित उपयोग हैं— 1. रात को प्रकाश उत्पन्न करने में, 2. सिंचाई एवं विभिन्न उपयोगों के लिए जल आपूर्ति हेतु पंप चलाने में, 3. घरेलू उपकरणों जैसे—पंखे, कूलर, गीजर, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन, हीटर, इस्तरी, एयरकण्डीशनर, टी.वी., साउण्ड सिस्टम आदि को चलाने में, 4. विभिन्न उद्योगों में मशीनों को चलाने के लिए आदि। प्रश्न 2. उपभोक्ताओं को सरकार बिजली का वितरण कैसे करती है ? उत्तर—उपभोक्ताओं को सरकार द्वारा विद्युत वितरण निगमों के मार्फत विभिन्न विद्युत स्टेशनों व विद्युत सब स्टेशनों के द्वारा उपभोक्ता स्थल तक विद्युत-लाइनों द्वारा विद्युत पहुँचाई जाती है। उपभोक्ता स्थल के ठीक बाहर लगे बिजली के खम्भे से बिजली सर्विस-लाइन के द्वारा बिजली के मीटर में पहुँचती है। मीटर से इसकी आपूर्ति उपभोग के स्थल/उपकरण तक होती है। निबन्धात्मक प्रश्न प्रश्न 1. विद्युत मीटर का सचित्र वर्णन कीजिए। उत्तर—विद्युत मीटर—बिजली का मीटर लोहे का बना एक चौकोर बॉक्स होता है। यह उपभोक्ता द्वारा खर्च की गई कुल बिजली की मात्रा को बताता है। उपभोग के आधार पर भुगतान योग्य राशि का बिल उपभोक्ता को भेज दिया जाता है। विद्युत मीटर के सामने ऊपरी भाग में काँच SINGLE PHASE ELECTRONIC METER की पारदर्शी पट्टिका होती है जहाँ रीडिंग के अंक इकाई, दहाई, सैकड़े व हजार में प्रदर्शित होते हैं। जैसे-जैसे उपभोग बढ़ता है, वैसे-वैसे रीडिंग की संख्या भी बढ़ती जाती है। कभी-कभी बिजली विभाग के कर्मचारियों की लापरवाही के कारण बिल गलती से कम या अधिक आ जाता है। ऐसी स्थिति में उपभोक्ता को विद्युत मीटर पढ़ने का व्यावहारिक ज्ञान होना आवश्यक है ताकि प्राप्त बिलों की जाँच करने के पश्चात् बिल का सही भुगतान किया जा सके। प्रश्न 2. बिजली बचाने के लिए हमें किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ? SUPW | 23 उत्तर—बिजली ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है। हमें इसका उपयोग संभलकर करना चाहिए। बढ़ती जनसंख्या एवं उसकी विद्युतचालित उपकरणों पर बढ़ती निर्भरता के कारण विद्युत की माँग निरंतर बढ़ती जा रही है। विद्युत की माँग की तुलना में इसका उत्पादन बहुत कम है। अतः हमें विद्युत बचाने के लिए प्रयास करने चाहिए। हमें मासिक विद्युत बिल में कमी लाने के लिए भी विद्युत बचाने के प्रयास करने चाहिए। हम निम्न प्रयासों द्वारा बिजली बचा सकते हैं— 1. हमें अनावश्यक रूप से विद्युत उपकरण नहीं चलाने चाहिए; जैसे-प्रयोग न होने पर भी बल्ब को जलता छोड़ना, पंखे को चालू छोड़ना आदि। 2. सार्वजनिक एवं घरेलू वायरिंग त्रुटिरहित होनी चाहिए जिससे शार्ट-सर्किट एवं स्पार्किंग में विद्युत हानि न हो। 3. आफिसों में कम्प्यूटरों, ट्यूबलाइटों, पंखों आदि को प्रयोग के बाद बन्द कर देना चाहिए। 4. आजकल विद्युत पंपों द्वारा जल आपूर्ति की जाती है। अतः जल बचाकर भी विद्युत को बचाया जा सकता है। 5. विद्युत ऊर्जा के विकल्प के रूप में सौर-ऊर्जा को उपयोग में लाना चाहिए। अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. ऊर्जा का स्रोत है— (अ) विद्युत (ब) कोयला (स) सूर्य (द) ये सभी। 2. किलोवाट घंटा को सामान्य बोल-चाल में कहा जाता है— (अ) के. डब्ल्यू. एच. (ब) यूनिट(स) मीटर (द) रीडिंग। 3. पुराने प्रकार के विद्युत मीटरों में होती है— (अ) वक्रीय प्रणाली (ब) डिजिटल प्रणाली(स) चक्रीय प्रणाली (द) स्क्रीन प्रणाली। 4. कभी-कभी विद्युत बिल गलत आ जाते हैं। इसका कारण है— (अ) कम्पनी का लालच (ब) सरकार द्वारा कमाई।(स) कर्मचारियों की लापरवाही (द) इनमें से कोई नहीं। उत्तर—1. (द) 2. (ब) 3. (स) 4. (स)। अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. दो घरेलू उपकरणों के नाम लिखिए जो बिजली द्वारा चलाए जाते हैं। उत्तर—एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर। प्रश्न 2. विद्युत मीटर को कहाँ लगाया जाता है? उत्तर—उपभोक्ता स्थल के ठीक बाहर मुख्य आपूर्ति लाइन पर। प्रश्न 3. विद्युत मीटर का क्या कार्य है? उत्तर—विद्युत मीटर उपभोक्ता द्वारा खर्च की गई बिजली को मात्रा बताता है। लघूत्तरात्मक प्रश्न प्रश्न 1. विद्युत बिल कम या अधिक कैसे हो जाते हैं? इससे कैसे बचा जा सकता है? उत्तर—कभी-कभी बिजली विभाग के कर्मचारियों की लापरवाही के कारण बिल गलती से कम या अधिक आ जाता है। ऐसी स्थिति में उपभोक्ता को विद्युतमीटर पढ़ने का व्यावहारिक ज्ञान होना आवश्यक है ताकि प्राप्त बिलों की जाँच करने के पश्चात सही भुगतान किया जा सके। प्रश्न 2. विद्युत मीटर को कैसे पढ़ा जाता है? उत्तर—उपभोक्ता द्वारा खर्च बिजली का मापन विद्युतमीटर द्वारा किया जाता है। पुराने विद्युत मीटरों में एक चक्रीय प्रणाली होती है जो शून्य से आरम्भ होती है। विद्युत उपभोग के समय यह चक्र चलता रहता है और संख्या आगे बढ़ती रहती है। विद्युत मीटर के सामने ऊपरी भाग में काँच की पारदर्शी पटिट्का के पीछे प्रदर्शित इस संख्या को पढ़ना सरल है। यह रीडिंग इकाई, दहाई, सैकड़ा व हजार में होती है। जैसे-जैसे उपभोग बढ़ता है, वैसे-वैसे रीडिंग की संख्या भी बढ़ती जाती है। यह खर्च विद्युत किलोवाट घंटा में प्रदर्शित होता है, जिसे हम सामान्य बोल चाल की भाषा में यूनिट कहते हैं। यानि एक यूनिट = एक किलोवाट घंटा। विस्तृत उत्तरीय प्रश्न प्रश्न—किसी विद्युत बिल के नमूने का विवरण दीजिए। उत्तर—जयपुर विद्युत वितरण निगम, लिमिटेड विद्युत बिल उपभोक्ता का नाम एवं पता..... खाता संख्या..... बिल का महीना—मार्च 2016 भुगतान तिथि—27-3-2016 मीटर का वर्तमान पठन (रीडिंग)—9531 यूनिट मीटर का गत पठन (रीडिंग)—9315 यूनिट उपभोग की गई विद्युत = 216 यूनिट विद्युत दर प्रति यूनिट = 1.20 रुपये विद्युत खर्च = 216 × 1.20 = 259.20 रुपये विद्युत कर (प्रति यूनिट 10 पैसे की दर से) = 216 \times .10 = 21.60 \text{ रुपये} मीटर किराया दो माह (प्रतिमाह 10 रू की दर से) = 2 \times 10 = 20 \text{ रुपये} स्थाई सेवा शुल्क = 2 × 8 = 16 रुपये नियत तिथि के बाद भुगतान राशि मीटर किराया दो माह = 316.80 रुपये छूट = 10.00 रुपये नियत तिथि तक भुगतान राशि = 306.80 रुपये। वैकल्पिक प्रवृत्ति समूह 6. प्रवृत्ति समूह (अ) पाठ-सार ● हम अनेक प्रकार की दैनिक उपयोगी सामग्री बनाकर धन बचा सकते हैं और छोटा-मोटा रोजगार स्थापित करके आय का स्रोत बढ़ा सकते हैं।● वैसलीन का उपयोग सर्दियों में त्वचा को शुष्क होने से बचाने के लिए किया जाता है।● वैसलीन का निर्माण कुछ सामान्य पदार्थों का उपयोग करके घर पर ही किया जा सकता है।● पेटदर्द, बदनदर्द, हैजा, जी मिचलाना और चक्कर आना आदि अनेक बीमारियों के लिए जो द्रव औषधि के काम में पाया जाता है उसे अमृतधारा कहते हैं।● बाम एक पेस्टनुमा पदार्थ होता है जिसे सिरदर्द होने पर उपयोग किया जाता है। फोड़े फुंसी होने पर भी इसका उपयोग किया जाता है।● टिंचर आयोडीन का उपयोग चोट लगने पर खून के बहने से रोकने के लिए किया जाता है।● दाँत मानव शरीर के महत्वपूर्ण अंग हैं। दाँत मजबूत एवं स्वस्थ रखने के लिए इनकी दैनिक देखभाल करना आवश्यक है।● दंतमंजन से दाँत तो साफ होते ही हैं साथ ही मसूड़े भी स्वस्थ रहते हैं और मुँह से बदबू भी नहीं आती है।● प्राचीन वैदिक काल से ही गौ अर्थात गाय को हमारी माता के रूप में माना गया है।● गाय के दूध से हमें विभिन्न पौष्टिक पदार्थ प्राप्त होते हैं।● गाय के मूत्र को विभिन्न बीमारियों के उपचार के लिए उपयोग किया जाता है।● गौमूत्र अर्क का उपयोग बहुत से रोगों में होता है जैसे सामान्य दुर्बलता, मोटापा, पेट और त्वचा रोग, खाँसी अस्थमा, गठिया, जोड़ों का दर्द आदि।● आज के युग में प्रत्येक व्यवसाय में बहुत प्रतिस्पर्धा है। व्यवसाय को सुचारु रूप से चलाने के लिए व्यवसाय में हर कदम पर नजर रखना अति आवश्यक है। इसके लिए प्रत्येक व्यवसायी व उद्यमी को अनेक रजिस्टरों में लेखे (रिकार्ड) तैयार करने पड़ते हैं।● रजिस्टरों में आय-व्यय, माल के आने-जाने आदि का लेखा रखा जाता है।● स्टॉक रजिस्टर दो प्रकार के होते हैं—स्थाई रजिस्टर एवं अस्थाई रजिस्टर।● प्रत्येक विद्यार्थी को प्रातः उठने से लेकर सोने तक की दिनचर्या प्रतिदिन रात को सोने से पूर्व एक डायरी में लिखनी चाहिए। इस डायरी को दैनंदिनी कहते हैं।● व्यापारिक पत्र लेखन एक कला है जिसे विशेष रूप से लिखा जाता है। इससे पत्र लेखक की साख बढ़ती है। ● किसी भी आदेश-पत्र को अत्यधिक सावधानी पूर्वक लिखना चाहिए क्योंकि एक शब्द का हेर-फेर आदेश का मूल स्वरूप बदल सकता है।● अपने आसपास की समस्याओं से संबंधित पत्र जो क्षेत्र से सम्बन्धित अधिकारियों को लिखे जाते हैं शिकायती पत्र कहलाते हैं।● व्यावसायिक क्षेत्र में एक व्यापारी द्वारा एक ही प्रकार की सूचना अपने ग्राहक व्यापारियों को जिस पत्र के माध्यम से दी जाती है उसे गश्ती पत्र या सर्कुलर पत्र कहते हैं।● किसी नये ग्राहक द्वारा किसी व्यापारिक संस्थान से अपनी साख पर माल मँगाए जाने पर उसकी व्यापारिक प्रतिष्ठा एवं आर्थिक स्थिति का पता लगाने के लिए व्यापारिक संदर्भ पत्रों का सहारा लिया जाता है।● अनेक प्रकाशकों द्वारा ज्ञान को एक से दूसरे को पहुँचाने के लिए भाषा को अंकित किया जाता है। ऐसा करते हुए संपादन के समय कुछ त्रुटि रह जाती है जिसे पढ़कर पुनः सुधारा जाता है। इसे प्रूफ रीडिंग कहते हैं। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. सर्दी के मौसम में ठण्ड के कारण शरीर की त्वचा कैसी हो जाती है?(अ) तैलीय (ब) शुष्क(स) सामान्य (द) अ व ब दोनों।2. वैसलीन बनाते समय नींबू के रस की कितनी बूँदे डालनी चाहिए—(अ) 5-6 (ब) 8-9 (स) 2-3 (द) 4-5।3. बाम कैसा पदार्थ है?(अ) ठोस (ब) तरल (स) गैसीय (द) पेस्टनुमा।4. किस तेल का प्रयोग अमृतधारा बनाने में होता है?(अ) सरसों का (ब) तिल्ली का(स) नारियल का (द) नीलगिरी का5. चोटग्रसित व्यक्ति को अस्पताल ले जाने से पहले कौन-सा उपचार किया जाता है—(अ) घरेलू उपचार (ब) प्राथमिक उपचार(स) अ व ब दोनों (द) कोई नहीं।6. चोटग्रसित व्यक्ति के खून को बहने से रोकने के लिए क्या लगाया जाता है?(अ) टिंचर आयोडीन (ब) पानी(स) फिटकरी (द) अमृतधारा।7. व्यापारिक संस्थानों व प्रतिष्ठानों में जो सामान नष्ट नहीं होते वह कौन से हैं?(अ) फर्नीचर (ब) कागज(स) पेन्सिल (द) उपरोक्त सभी। SUPW | 25 8. प्रत्येक विद्यार्थी को प्रातः उठने से लेकर सोने तक की दिनचर्या प्रतिदिन किस समय लिखनी चाहिए? (अ) रात को सोने से पूर्व (ब) प्रातः (स) दोपहर में (द) उपरोक्त सभी। उत्तर—1. (ब), 2. (द), 3. (द), 4. (द), 5. (स), 6. (अ), 7. (अ), 8. (अ) लघूत्तरात्मक प्रश्न प्रश्न 1. वैसलीन बनाने के लिए काम आने वाली उपयुक्त सामग्री लिखिए। उत्तर—वैसलीन बनाने के लिए काम आने वाली सामग्री— (i) तेल (मूँगफली, तिल, नारियल, अरण्डी अथवा व्हाइट आयल) — 250 मिली (ii) पेराफीन मोम — 20 ग्राम (iii) नींबू का रस या साइट्रिक अम्ल— 5 मिली (iv) सुगन्ध — इच्छानुसार (v) रंग (ऑयल कलर) आवश्यकतानुसार प्रश्न 2. स्टॉक रजिस्टर कितने प्रकार के होते हैं? उत्तर—स्टॉक रजिस्टर दो प्रकार के होते हैं—(1) स्थाई स्टॉक रजिस्टर—व्यापारिक प्रतिष्ठानों में कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जो जल्दी नष्ट नहीं होतीं; जैसे—कम्प्यूटर, प्रिंटर, पंखे और फर्नीचर आदि। इन वस्तुओं की वर्तमान स्थिति, क्रय, खर्च आदि का विवरण स्थाई स्टॉक रजिस्टर में होता है। स्थाई स्टॉक रजिस्टर में प्रत्येक वस्तु का हिसाब अलग-अलग पृष्ठों पर रखा जाता है। (2) अस्थाई स्टॉक रजिस्टर—व्यापारिक प्रतिष्ठान के इस रजिस्टर में ऐसी वस्तुओं का लेखा-जोखा रखा जाता है जो रोजाना प्रयोग में आती रहती हैं। ये वस्तुएँ या तो खर्च हो जाती हैं अथवा नष्ट हो जाती हैं; जैसे—रजिस्टर, कागज, तेल, ग्रीस और मोमबत्ती आदि। निबन्धात्मक प्रश्न प्रश्न 1. वैसलीन बनाने की विधि लिखिए। उत्तर—वैसलीन बनाने की विधि— 1. सबसे पहले तेल को अच्छी तरह से गर्म कीजिए तथा आँच से उतार लीजिए। 2. गर्म किये हुए इस तेल में नींबू का रस या एसिटेट की पाँच-छः बूँदें मिलाइए। 3. ऐसा करने से तेल साफ व हल्का हो जाता है। 4. अब इस तेल को बारीक कपड़े से छान लीजिए। 5. अब मोम को इस तेल में मिलाकर हल्का गर्म कीजिए ताकि तेल में मोम पिघल जाये। 6. ऑयल कलर लेकर पहले थोड़े से तेल में घोल लीजिए और पहले तैयार किये हुए मिश्रण में मिला दीजिए। 7. मिश्रण जब द्रव अवस्था में ठण्डा होने लगे तब सुगन्ध मिलाकर गुनगुने मिश्रण को ही शीशियों में भर दीजिए। प्रश्न 2. बाम का प्रयोग कब किया जाता है? बाम बनाने की विधि लिखिए। उत्तर—बाम एक पेस्टनुमा पदार्थ होता है जिसे सिरदर्द होने पर उपयोग किया जाता है। फोड़े-फुन्सी होने पर भी बाम को उन पर लगाया जाता है। बनाने की विधि—बाम को घर पर निम्नलिखित तरह से बनाया जा सकता है— (i) एक बर्तन में वैसलीन लेकर उसमें दालचीनी का तेल, लोंग का तेल, पोदीने का सत, अमृतधारा व पिपरमेण्ट मिला देते हैं। (2) इन पदार्थों को अच्छी तरह मिलाकर शीशी में भर लेते हैं। (3) बाम तैयार है अब इसका उपयोग किया जा सकता है। प्रश्न 3. स्टॉक रजिस्टरों के संधारण करने के क्या लाभ है? उत्तर—व्यवसाय को सुचारु रूप से चलाने के लिए हर कदम पर नजर रखना अति आवश्यक है। इसके लिए प्रत्येक व्यवसायी व उद्यमी को अनेक रजिस्टरों में लेखे (रिकार्ड) तैयार करने पड़ते हैं। आर्थिक स्थिति की सही जानकारी रखने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को आय व्यय का नियमित रूप से हिसाब रखना चाहिए। व्यापारिक संस्थानों, फैक्ट्रियों, कारखानों आदि में रखे जाने वाले सामान की जानकारी रखने के लिए अस्थाई व स्थाई स्टॉक रजिस्टरों का संधारण किया जाता है। इन स्टॉक रजिस्टरों को बाजार से खरीदे गए विभिन्न सामानों के वाउचर के आधार पर संधारित किया जाता है। स्टॉक रजिस्टरों के संधारण का सबसे बड़ा लाभ यह है कि संस्थान के मालिक या भण्डार प्रभारी को हमेशा यह मालूम होता रहता है कि कितना सामान कब और कहाँ से आया, वर्तमान में स्टॉक में कितना सामान है, कितना सामान कब व कौन से विभाग में खपत हुआ है तथा अब कितना शेष है। इससे निकट भविष्य में काम आने वाली वस्तुओं की खरीद के सम्बन्ध में योजना बनाई जा जाती है। प्रश्न 4. टिंचर आयोडीन बनाने की विधि लिखिए। टिंचर आयोडीन बनाते समय क्या-क्या सावधानी रखनी चाहिए? उत्तर—टिंचर आयोडीन बनाने की विधि आवश्यक समग्री 1. आयोडीन — 10 ग्राम 2. पोटैशियम आयोडाइड — 02 ग्राम 3. सफेद वैसलीन — 200 ग्राम 4. मोम — 30 ग्राम 5. स्प्रिंट — 50 मिली 6. पानी — 05 मिली विधि—पोटैशियम आयोडाइड को पानी में मिला दीजिए। अब इस पोटैशियम आयोडाइड के घोल में आयोडीन व स्प्रिंट मिलाकर उसे घोल लीजिए। इस प्रकार आयोडीन का घोल तैयार हो जाएगा जो टिंचर आयोडीन कहलाता है। 26 | रतन पास बुक, कक्षा—9 सावधानियाँ— 1. आयोडीन को हाथ से नहीं छूना चाहिए। 2. आयोडीन को केवल स्प्रिट में ही घोलना चाहिए। 3. टिंचर आयोडीन का उपयोग करने से पहले घाव को अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए। प्रश्न 5. दैनिक आय व्यय की सारणी बनाइए। उत्तर— दैनिक आय-व्यय की सारणी श्री गणेशाय नमः श्री शुभ मिति... दिनांक 05.06.2016 आय व्यय | 1000/-पिताजी से प्राप्त | 850/-विद्यालय शुल्क जमा कराये | |---|---| | 500/-दिव्या दीदी से प्राप्त | 400/-विद्यालय यूनिफार्म खरीदी | | 1500/-कुल आय | 120/-साइकिल की मरम्मत कराई | | | 10/-पेन खरीदा | शेष राशि कुल आय 1500 कुल शेष 100/- दिनांक आय 100/-पिछला शेष 1500/-मासिक ट्यूशन से प्राप्त (छोटे बच्चों को पढ़ाया) 20/-रजिस्टर खरीदा 1400/-कुल खर्च कुल खर्च 1400 20.08.2015 व्यय 500/-दिव्या दीदी को लौटाये 300/-फुटबाल खेलने हेतु जूते खरीदे 60/-बिट्टू के लिये खिलौना खरीदा 80/-वृक्षारोपण हेतु पौधे खरीदे 400/-किताबें खरीदी 1340 कुल खर्च 260/- प्रश्न 6. स्थाई स्टॉक रजिस्टर का नमूना बनाइए। उत्तर— स्थाई स्टॉक रजिस्टर का नमूना व्यापारिक संस्थान अथवा प्रतिष्ठान का नाम ..... वस्तु सामग्री का नाम ..... पृष्ठ संख्या ..... | दिनांक (लेन देन की) | सामग्री कहाँ से आई | बिल (बीजक) संख्या व दिनांक | सामग्री का पूरा विवरण | प्राप्त करने की मात्रा | खरीद मूल्य | सामग्री जारी करने अथवा खारिज (केस्सल) करने का ब्यौरा | बची सामग्री | भण्डारपाल (Store keeper) के हस्ताक्षर | संस्थान मालिक/इल्चार्ज के हस्ताक्षर | दिनांक | परिणाम | सत्यापनकर्ता अधिकारी के हस्ताक्षर | विशेष विवरण | |---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---| | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | | | | | | | | | | | | | | | | SUPW | 27 प्रश्न 7. दैनन्दिनी लेखन से क्या-क्या लाभ होते हैं? उत्तर—प्रत्येक विद्यार्थी को प्रातः उठने से लेकर सोने तक की दिनचर्या प्रतिदिन रात को सोने से पूर्व एक डायरी में लिखनी चाहिए। इस डायरी को दैनन्दिनी कहते हैं। दैनन्दिनी लेखन से कई लाभ हैं— 1. दैनन्दिनी लेखन से हम यह विश्लेषण कर सकते हैं कि दिनभर में हमने कौन से महत्वपूर्ण कार्यों का निपटारा किया तथा कितना समय बेवजह नष्ट किया। 2. समय का उचित प्रबन्धन करके हम निश्चित समय में अधिक काम गुणवत्ता के साथ निपटा सकते हैं। 3. दैनन्दिनी लेखन से एक और लाभ यह है कि उस दिन हमने किस व्यक्ति से कहाँ सम्पर्क किया। उस दिन क्या कार्य किया। इस बात का विवरण मालूम कर सकते हैं। 4. इस लेखन से हम अपनी आत्मकथा भी लिख सकते हैं। प्रश्न 8. दैनन्दिनी लेखन में हमें क्या लिखना चाहिए ? उत्तर—एक छात्र के दैनन्दिनी लेखन का नमूना निम्नलिखित है। छात्र इसकी सहायता से खुद दैनन्दिनी लेखन कर सकते हैं— | प्रातः 4:15 बजे | जागरण किया। | |---|---| | प्रातः 4:15 से 6 बजे तक | मुँह धोकर आज पढ़ाये जाने वाले पाठों का अध्ययन किया। | | प्रातः 5:00 से 6 बजे तक | दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्नान किया। | | प्रातः 6 से 6:30 बजे तक | पूजा, ध्यान, योग व व्यायाम किया। | | प्रातः 6:30 से 7 बजे तक | गाय के दूध के साथ नाशता किया। | | प्रातः 7 से 7:30 बजे तक | साइकिल द्वारा विद्यालय पहुँचा। | | प्रातः 7:40 से 1:30 बजे तक | विद्यालय में अध्ययन किया। | | दोप. 1:30 से 2 बजे तक | विद्यालय से घर पहुँचा। | | दोप. 2 से 2:30 बजे तक | हल्का नाशता किया। | | दोप. 2:30 से 4:30 बजे तक | लिखित कार्य पूर्ण किया। | | सायं 4:30 से 6 बजे तक | कबड्डी, खो-खो, फुटबाल, बॉलीबाल आदि खेल खेले एवं अन्य घरेलू कार्य किये। | | सायं 6 से 7 बजे तक | लिखित गृहकार्य किया। | | सायं 7 से 7:30 बजे तक | पड़ोस में साथी को गणित के सवाल समझाये। | | सायं 7:30 से 8 बजे तक | खाना खाया। | | सायं 8 से 8:30 बजे तक | दूरदर्शन पर समाचार सुने एवं देखे। | सायं 8:30 से 10 बजे तक विद्यालय में आज पढ़ाये गये अध्यायों को दोहरान किया। सायं 10 से 10:15 बजे तक दिनभर किये कार्यों का विश्लेषण एवं आत्मचिन्तन किया। सायं 10:30 बजे सोने हेतु बिस्तर पर लेट गया। प्रश्न 9. संदर्भ पत्र का विस्तार से वर्ण कीजिए। उत्तर—संदर्भ पत्र—किसी नए ग्राहक द्वारा किसी व्यापारिक संस्थान से अपनी साख पर माल मंगाये जाने पर उसकी व्यापारिक प्रतिष्ठा एवं आर्थिक स्थिति का पता लगाने के लिए व्यापारिक संदर्भ पत्रों का सहारा लिया जाता है। इन पत्रों के उत्तर सकारात्मक आने पर उस दुकान या प्रतिष्ठान को साख की सुविधा प्रदान की जाती है। प्रतिकूल उत्तर पर नकद व्यवहार करने पर माल दिया जाता है या एडवांस राशि भेजने के लिए लिखा जाता है। ऐसे संदर्भ पत्रों को गोपनीय रखा जाता है। एक संदर्भ पत्र का नमूना नीचे प्रस्तुत है— विशाखा ओटोमोबाइल्स स्टेशन रोड, अजमेर फोन नं. .... दिनांक..... पत्र सं. .... फैक्स नं. .... ई. मेल. .... श्री जानकीबल्लभ मोटर्स, चित्तौड़गढ़ (राज.) प्रिय महोदय, हम विपुल मोटर्स धौलपुर से व्यापारिक लेन-देन करना चाहते हैं। इस फर्म के मालिक ने आपका नाम संदर्भ के रूप में दिया है। आपका इस फर्म से वर्षों से लेन-देन चल रहा है। इसलिए आप उनके सम्बन्ध में सही जानकारी दे सकते हैं। कृपया बताने का कष्ट करें कि क्या हम इन्हें 50 लाख तक का माल उधार दे सकते हैं। कृपया इनकी वास्तविक आर्थिक स्थिति, व्यवहार, बाजार में पैठ आदि की विस्तृत जानकारी देने का कष्ट करें। कृपया यह बताएँ कि हम इन्हें कितनी सीमा तक का माल उधार दे सकते हैं। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि व्यापारिक गरिमा को ध्यान में रखते हुए आपके द्वारा प्राप्त सूचना को हम पूर्णतया गोपनीय रखेंगे। आपके सहयोग के लिए धन्यवाद। हमारे योग्य कोई सेवा हो तो निः संकोच लिखने का कष्ट करें। कृपया पत्र का उत्तर शीघ्र देने की कृपा करें। डाक टिकट लगा लिफाफा इस पत्र के साथ संलग्न है। भवदीय देवेश कपूर (पार्टनर) अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न 1. अमृतधारा का उपयोग किया जाता है, इसकी औषधि के रूप में— (अ) पेटदर्द (ब) जी मिचलाना(स) हैजा (द) ये सभी। 2. बाम का उपयोग किया जाता है— (अ) पेट दर्द में (ब) सिर दर्द में(स) मधुमेह के इलाज में (द) उल्टी आने में। 3. टिंचर आयोडीन का उपयोग किया जाता है— (अ) रक्त स्राव रोकने में (ब) बदन दर्द के उपचार में(स) खाँसी के उपचार में (द) इनमें से कोई नहीं 4. गाय का यह उत्पाद उपयोगी है— (अ) मूत्र (ब) दूध (स) गोबर (द) ये सभी। 5. गाय है एक— (अ) पवित्र पशु (ब) हानिकारक पशु(स) तेज पशु (द) महँगा पशु। 6. गौमूत्र अर्क— (अ) रक्त में कोलेस्ट्राल को कम करता है(ब) सीरम ट्राइग्लिसराइड को कम करता है।(स) एक एंटी ऑक्सीडेंट हैं(द) उपरोक्त सभी। 7. गौमूत्र अर्क के सम्बन्ध में कौन-सा कथन असत्य है— (अ) यह मस्तिस्क व हृदय को शक्ति प्रदान करता है।(ब) यह बुढ़ापा रोकता है।(स) यह लीवर पर हानिकारक प्रभाव डालता है।(द) इसमें ताम्र तत्व होता है। 8. स्टॉक रजिस्टर होते हैं— (अ) दो प्रकार के (ब) तीन प्रकार के(स) चार प्रकार के (द) पाँच प्रकार के। 9. पत्र महत्वपूर्ण होते हैं— (अ) व्यावहारिक क्षेत्र में (ब) व्यापारिक क्षेत्र में(स) सामाजिक क्षेत्र में (द) ये सभी। उत्तर—1. (द) 2. (ब) 3. (अ) 4. (द) 5. (अ) 6. (द) 7. (स) 8. (अ) 9. (द)। अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. सर्दियों में त्वचा शुष्क क्यों हो जाती है? उत्तर—सर्दी के मौसम में ठण्ड के कारण शरीर की त्वचा की तेल ग्रन्थियाँ अपना कार्य करना कम कर देती हैं जिससे त्वचा शुष्क हो जाती है। प्रश्न 2. सर्दियों में त्वचा को मुलायम रखने के लिए किसका उपयोग किया जाता है? उत्तर—सर्दियों में त्वचा को मुलायम रखने के लिए वैसलीन का उपयोग किया जाता है। प्रश्न 3. अमृतधारा क्या है? उत्तर—पेटदर्द, बदन दर्द, हैजा, जी मिचलाना और चक्कर आना आदि अनेक बीमारियों के लिए जो द्रव औषधि के काम में लिया जाता है उसे अमृतधारा कहते हैं। प्रश्न 4. अमृतधारा को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है? उत्तर—अमृतधारा को साफ-सुथरी एवं वायुरोधक शीशी में रखा जाना चाहिए। प्रयोग के पश्चात शीशी का ढक्कन तुरंत बंद कर देना चाहिए। प्रश्न 5. बाम क्या है? उत्तर—बाम एक पेस्टनुमा पदार्थ होता है जिसका उपयोग सिरदर्द एवं फोड़े-फुन्सियों पर लगाने में भी किया जाता है। प्रश्न 6. गौमूत्र के शुद्धिकरण प्रक्रम को क्या कहते हैं? उत्तर—डिस्टिलेशन प्रॉसेस। प्रश्न 7. अस्थाई स्टॉक रजिस्टर में किन-किन वस्तुओं का लेखा-जोखा होता है? उत्तर—शीघ्र खर्च होने वाली वस्तुओं; जैसे—रजिस्टर, पेन, आलपिन, कागज आदि। लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. अमृतधारा बनाने में प्रयुक्त सामग्री का विवरण दीजिए। उत्तर—आवश्यक सामग्री— (1) पिपरमेन्ट ऑयल — 20 मिली.(2) सफेद वैसलीन — 200 ग्राम(3) पेराफीन मोम — 10 ग्राम(4) देशी कपूर — 10 ग्राम(5) पोदीने के फूल — 10 ग्राम(6) अजवाईन केफूल (थाइमोल) — 10 ग्राम(7) नीलगिरी का तेल — 20 मि.ग्रा प्रश्न 2. अमृतधारा बनाने की विधि तथा सावधानियाँ लिखिए। उत्तर—अमृतधारा बनाने की विधि विधि—कपूर, पिपरमेन्ट एवं थाइमोल तीनों पदार्थों को एक शीशी में रखकर वायुरोधक ढक्कन बंद कर दीजिए। कुछ समय बाद तीनों पदार्थों का द्रव पदार्थ बन जायेगा। यही द्रव पदार्थ अमृतधारा कहलाता है। सावधानियाँ— 1. शीशी वायुरोधक एवं साफ सुथरी होनी चाहिए। 2. अमृतधारा को उपयोग में लेने के पश्चात शीशी को तुरन्त बन्द कर देना चाहिए। प्रश्न 3. बाम बनाने में क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए? उत्तर—बाम बनाने में निम्न सावधानियाँ रखनी चाहिए— 1. वैसलीन उपचारित (मेडीकेटेड) होनी चाहिए। SUPW | 29 2. बाम को हमेशा वायुरोधक शीशी में रखना चाहिए।3. बाम को प्रयोग में लेने के पश्चात शीशी को बन्द कर देना चाहिए। प्रश्न 4. दंतमंजन बनाने समय रखी जाने वाली सावधानियाँ लिखिए। उत्तर—दंतमंजन बनाने में सावधानियाँ— (1) कपूर, पीपरमेन्ट और अजवाइन के फूल-तीनों पदार्थ वाष्पशील होते हैं। अतः इन्हें खुला नहीं रखना चाहिए वरना ये उड़ जायेंगे। (2) फिटकरी व नीला थोथा दोनों का फूला बनाकर ही उपयोग में लेना चाहिए। (3) सभी पदार्थों को बारीक पीस लेना चाहिए अन्यथा इनसे मसूड़े छिल सकते हैं। प्रश्न 5. स्थाई स्टॉक रजिस्टर का उपयोग कहाँ किया जाता है? उत्तर—व्यापारिक संस्थानों व प्रतिष्ठानों में कई सामान ऐसे होते हैं जो जल्दी नष्ट नहीं होते हैं; जैसे—फर्नीचर, पंखे, कम्प्यूटर, प्रिंटर, विभिन्न मशीनरी आदि। इन सामानों के क्रय, वर्तमान स्थिति, खर्च व शेष सामानों की स्थिति का विवरण स्थायी स्टॉक रजिस्टर में होता है। स्थाई स्टॉक रजिस्टर में प्रत्येक वस्तु का हिसाब अलग-अलग पृष्ठों पर लिखा जाता है। प्रश्न 6. दैनिक खर्च लिखना क्यों आवश्यक है? उत्तर—किसी व्यक्ति के आर्थिक विकास के लिए उसकी आय व व्यय की जानकारी उसको लगातार होनी चाहिए। उसे यह पता रहना चाहिए कि किस मद में उसने कितने रुपए खर्च किए। इससे बेवजह के खर्चों पर रोक लगाई जा सकती है और बचत की आदत पड़ती है। इसलिए विद्यार्थियों को नियमित रूप से दैनिक खर्च लिखने का अभ्यास करना चाहिए। दैनिक खर्च लिखने से यह पता चलता है कि खर्च कहीं अधिक तो नहीं हो रहा है। ऐसा न हो कि खर्च आय में अधिक बढ़ जाए और मासिक बजट गड़बड़ हो जाए। प्रश्न 7. किन्हीं चार प्रकार के व्यापारिक पत्रों के नाम लिखिए। उत्तर—व्यापारिक पत्र कई प्रकार के होते हैं जिनमें मुख्य पत्र निम्न हैं— 1. आदेश पत्र (Letter of Order) 2. शिकायती पत्र (Letter of Complaint) 3. गश्ती पत्र (Circular letter) 4. संदर्भ पत्र (Letter of Reference) प्रश्न 8. गश्ती पत्र किसे कहते हैं? समझाइए। उत्तर—व्यावसायिक क्षेत्र में एक व्यापारी द्वारा एक ही प्रकार की सूचना अपने ग्राहक व्यापारियों को जिस पत्र के माध्यम से दी जाती है उसे गश्ती पत्र या सर्कुलर पत्र कहते हैं। गश्ती पत्र सरकारी क्षेत्रों में भी लिखे जाते हैं। जब सरकार के किसी मुख्य विभागीय कार्यालय से अपने अधीनस्थ कार्यालयों को एक ही प्रकार की सूचना दी जाती है तो उन्हें गश्ती पत्र के द्वारा सूचित किया जाता है। यम से दी जाती है उसे गश्ती पत्र या सर्कुलर पत्र कहते हैं। गश्ती पत्र सरकारी क्षेत्रों में भी लिखे जाते हैं। जब सरकार के किसी मुख्य विभागीय कार्यालय से अपने अधीनस्थ कार्यालयों को एक ही प्रकार की सूचना दी जाती है तो उन्हें गश्ती पत्र के द्वारा सूचित किया जाता है। प्रश्न 9. व्यापारिक क्षेत्र में गश्ती पत्र किन परिस्थितियों में लिखे जाते हैं? उत्तर—व्यापारिक क्षेत्र में गश्ती पत्र निम्न परिस्थितियों में लिखे जाते हैं। (1) नये विभाग या कार्यालय की स्थापना के समय। (2) जब किसी नई वस्तु का उत्पादन या विक्रय शुरू किया गया हो। (3) जब कोई नया साझेदार फर्म से जोड़ा जाए या कोई पुराना साझेदार फर्म से अलग हो जाए। (4) जब व्यापारी का नाम या पता बदला हो। (5) जब नया माल स्टॉक में आया हो आदि। प्रश्न 10. प्रूफ रीडिंग क्या है? यह कितने प्रकार की होती है? उत्तर—प्रूफ रीडिंग वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मुद्रणालय में मुद्रित होने वाली सामग्री की गलतियाँ ठीक की जाती हैं ताकि छपने वाली सामग्री सही-सही छपे। प्रूफ रीडिंग मुख्यतः तीन प्रकार की होती है— 1. पेज प्रूफ 2. गेली प्रूफ 3. फर्मा प्रूफ दीर्घ उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. दंतमंजन क्यों उपयोगी है? काला दंत मंजन बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। उत्तर—दंतमंजन—दाँत हमारे शरीर के महत्वपूर्ण अंग हैं। मजबूत दाँत भोजन को अच्छी तरह चबा सकते हैं तथा कठोर फलों एवं गन्ने की चीड़-फाड़ भी कर सकते हैं। सुन्दर और चमकीले सफेद दाँत चेहरे की खूबसूरती बढ़ाने में सहायता करते हैं। यदि हम दाँतों की नियमित सफाई नहीं करें तो ये गन्दे दिखेंगे और मुँह से बदबू भी आएगी। अतः दाँतों की नियमित सफाई अत्यंत आवश्यक है। दाँतों की सफाई के लिए दंतमंजन, टूथपेस्ट, माउथवास अथवा दातून का उपयोग किया जाता है। काला दंत मंजन बनाने की विधि— सामग्री—काले दंतमंजन में प्रयुक्त सामग्री को चार अगल-अलग समूहों में एकत्रित कर लिया जाता है। 1. प्रथम समूह—बबूल की छाल का पाउडर, वज्रदंती, छोटी पीपल, मजीठ, माजूफल, कालीमिर्च, आकरकरा, शीतल मिर्च, चिकनी सुपारी, वायोविडिंग एवं बोरजड़ी को 20-20 ग्राम की मात्रा में लेकर बारीक पीस लेते हैं। 2. द्वितीय समूह—लाल फिटकरी एवं नीला थोथा 10-10 ग्राम लेकर तवे पर इनके अलग-अलग फूले बना लेते हैं। 30 | रतन पास बुक, कक्षा—9 3. तृतीय समूह—शुद्ध की गई गौदन्ती, सेंधानमक, साँभर नमक तथा समुद्री झाग, प्रत्येक को 20-20 ग्राम लेकर बारीक पीसकर मिश्रण बना लेते हैं। 4. चतुर्थ समूह—पिपरमेन्ट, अजवाइन के फूल, देशी कपूर, प्रत्येक को 5-5 ग्राम मात्रा लेकर शीशी में एकत्र कर लेते हैं इससे अमृतधारा द्रव अवस्था में बन जाएगी। अब इस द्रव में पिपरमेंट का तेल, नीलगिरी का तेल, कार्बलिक अम्ल 10-10 मिली मिला लेते हैं। इसके बाद सारे द्रव में 100 मिली व्हाइट ऑयल मिला देते हैं। विधि—अब गाय के गोबर के कण्डों को जलाकर कोयला बनाइए और इसे बारीक पीसकर एक किग्रा मात्रा तौल लीजिए। इसमें उपरोक्त तीनों समूह के पदार्थों को बरीक पीसकर मिला दीजिए और अन्त में चौथे समूह वाले द्रव पदार्थों को मिलाकर मिश्रण को शीशियों में भर लीजिए। काला दंतमंजन तैयार है। प्रश्न 2. गाय को महत्वपूर्ण व पवित्र पशु क्यों माना जाता है? उत्तर—गाय को महत्वपूर्ण एवं पवित्र पशु मानने का कारण—वैदिक काल से ही गौ (गाय) को हम अपनी माता के रूप में मानते आ रहे हैं। गाय को ऋषि-मुनियों ने भी अपनी माता के रूप में पूजा है। गाय ही एक ऐसा पशु हैं जिसमें हमारे 33 करोड़ देवी-देवताओं का निवास माना जाता है। गाय से हमें कई प्रकार की वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। गाय से हमें दूध प्राप्त होता है जिससे मक्खन, दही, छाछ, घी आदि बनाए जाते हैं। गाय का मल-मूत्र भी अत्यंत उपयोगी होता है। गाय का मूत्र अनेक औषधीय गुणों से परिपूर्ण होता है। गौमूत्र अर्क गाय के मूत्र से तैयार किया जाता है। गौमूत्र का उपयोग वैदिक काल से ही विभिन्न रोगों के उपचार के लिए आयुर्वेद में होता आया है। यह शरीर को शुद्ध करता है। गाय के गोबर में जीवाणुनाशी गुण पाए जाते हैं जिससे हम अनेकानेक व्याधियों से दूर हर सकते हैं। प्रश्न 3. गौमूत्र के उपयोग लिखिए। उत्तर—गौमूत्र का उपयोग—गौमूत्र अर्क अनेक रोगों में उपयोग किया जाता है— 1. गौमूत्र अर्क रक्त में कोलेस्ट्रॉल मात्रा को कम करता है। 2. गौमूत्र अर्क सीरम ट्राइग्लिसराइड्स को कम करने में उपयोगी है। 3. गौमूत्र अर्क मोटापा कम करने में उपयोग किया जाता है। 4. गौमूत्र अर्क खाँसी के इलाज में भी कारगर है। 5. गौमूत्र रक्त में ग्लूकोज को कम करता है। अतः यह मधुमेह में उपयोगी है। 6. गौमूत्र अर्क तीनों दोषों वात, पित्त, कफ का संतुलन करता है। 7. गौमूत्र अर्क एंटी ऑक्सिडेंट व एंटी हाइपरग्लीसीमिक है। एंटी हाइपरग्लीसीमिक एंजेट रक्त में अतिरिक्त वसा के संचय का विरोध करता है। गौमूत्र Immunomodulatry गुण युक्त है। 8. यह विषाक्त पदार्थों को शरीर से दूर करता है और दिल, यकृत, मस्तिष्क, प्रतिरक्षा प्रणाली, श्वसन प्रणाली व पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है। प्रश्न 4. गौमूत्र अर्क के लाभ लिखिए। उत्तर—गौमूत्र अर्क के लाभ—1. गौमूत्र में सभी प्रकार के कीटाणुओं को नष्ट करने का चमत्कारी गुण होता है। इससे सभी कीटाणुजन्य बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं। 2. गौमूत्र त्रिदोष सामान्य बनाता है। 3. गौमूत्र लिवर को स्वस्थ बनाकर किसी भी रोग का विरोध करने की शक्ति प्रदान करता है। 4. गौमूत्र में कई प्रकार के खनिज विशेषकर ताम्र होता है, जिससे ताम्र तत्व की पूर्ति होती है। 5. मस्तिष्क शोथ से स्नायु तंत्र को अघात पहुँचता है। गौमूत्र अर्क मस्तिष्क व हृदय को शक्ति प्रदान करता है। अतएव यह मानसिक कारणों से होने वाले आघात से हृदय की रक्षा करता है। 6. गौमूत्र रसायन है यह बुढ़ापा रोकता है व व्याधियों को दूर करता है। 7. विद्युत तरंगें हमारे शरीर को स्वस्थ रखती हैं व वातावरण में विद्यमान है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप से तरंगें हमारे शरीर में गौमूत्र से प्राप्त ताम्र के अपने विद्युतीय आकर्षण गुण के कारण शरीर में आकर्षित होकर स्वास्थ्य प्रदान करती हैं। 8. शास्त्रों में पूर्व कर्मज व्याधियाँ भी कही गयी हैं जो हमें भुगतनी पड़ती हैं। गौमूत्र में गंगा ने निवास किया है। गंगा पापनाशिनी हैं अतएव गौमूत्रपान से पूर्व जन्म के पाप क्षय होकर इस प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं। 9. शास्त्रों के अनुसार भूतों के शरीर में प्रवेश के कारण होने वाले रोगों पर गौमूत्र इसलिए प्रभाव करता है कि भूतों के अधिपति भगवान शिव शंकर के शीश पर गंगा हैं तथा गौमूत्र में भी गंगा है। अतः गौमूत्र के पान से भूतगण अपने अधिपति के मस्तक पर गंगा के दर्शन से शांत हो जाते हैं। 10. जो रोगी व्यक्ति वंश परम्परा से रोगी हो। रोग के होने से पहले ही गौमूत्र पान करने से रोगी के शरीर में इतनी प्रतिरोधी शक्ति आ जाती है कि रोग नष्ट हो जाते हैं। अतः गौमूत्र का अर्क हमारे लिये अमृत के समान है। इसका उपयोग या सेवन सभी को करना चाहिए। SUPW | 31 प्रश्न 5. अस्थाई स्टॉक रजिस्टर का नमूना बनाइए। उत्तर— अस्थाई स्टॉक रजिस्टर का नमूना संस्थान अथवा प्रतिष्ठान का नाम ..... वस्तु या सामग्री का नाम ..... पृष्ठ संख्या ..... | दिनांक (लेन देन की) | सामग्री कहाँ से आई | बिल (बीजक) संख्या व दिनांक | सामग्री का पूरा विवरण | प्राप्त करने की मात्रा | खरीद मूल्य | सामग्री जिस विभाग को जारी की गई | जारी करने की मात्रा | बची सामग्री | संस्थान के मालिक/इन्वार्ज के हस्ताक्षर | विशेष विवरण | |---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---| | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | | | | | | | | | | | | | प्रश्न 6. व्यापारिक पत्र लेखन क्या है? ये क्यों लिखे जाते हैं ? इनके भाग लिखिए। एक व्यापारिक पत्र लेखन का नमूना बनाइए। उत्तर—व्यापारिक पत्र लेखन—वर्तमान समय में व्यापार का क्षेत्र विस्तृत हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति को व्यापारिक पत्रों का लेखन करना पड़ता है। ये व्यापारिक पत्र व्यक्ति के प्रतिनिधि की भाँति कार्य करते हैं। अच्छे पत्र लेखन से पत्र लेखक की साख भी बढ़ती है। व्यापारिक पत्र लेखन एक कला है जिसे विशेष रूप से लिखा जाता है। इसको कई भागों में विभाजित किया जा सकता है और इन भागों के स्थान निश्चित होते हैं। वर्तमान में प्रचलित पद्धति के अनुसार व्यापारिक पत्र के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं— (1) शीर्षक (2) तिथि (3) संदर्भ क्रमांक (4) भीतरी पता (5) अभिवादन (6) विषय शीर्षक (7) पत्र का मुख्य भाग (8) प्रशंसात्मक भाग (9) प्रेषक के हस्ताक्षर (10) संकलन पत्र (11) टाइपिस्ट या लिपिक के हस्ताक्षर (12) पुनश्च: (13) हाशिया। .....(शीर्षक) .....(व्यवसाय का विवरण) ईमेल या फैक्स का पता..... पता..... टेलीफोन/मोबाईल न. .... तिथि..... कोड संख्या..... (संदर्भ क्रमांक)..... (अभिवादन)..... (विषय शीर्षक)..... (पत्र का मुख्य भाग)..... ..... 32 | रतन पास बुक, कक्षा—9 (प्रशंसात्मक वाक्य)..... (प्रेषक के हस्ताक्षर)..... (पद)..... संलग्न पत्र..... (अभिवादन)..... टाइपिस्ट या लिपिक के हस्ताक्षर..... (पुनश्च:) प्रश्न 7. आदेश पत्र क्या है ? इसमें कौन-सी बातें लिखी जानी चाहिए। उत्तर—आदेश पत्र—व्यापार में प्राप्त पत्रों के आधार पर किसी कम्पनी या संस्थान को आदेश देने का निर्णय लिया जाता है। आदेश पत्र अत्यंत सावधानी पूर्वक लिखे जाने चाहिए क्योंकि यह कानूनी बंधन वाला पत्र होता है। एक बार आदेश देने के बाद जब माल या वस्तु विक्रेता उसे स्वीकार कर लेता है तो क्रेता उस आदेश से कानूनी रूप से बाध्य हो जाता है। वह अपने आदेश को वापस नहीं ले सकता। आदेश पत्र में निम्न लिखित बातें लिखी जानी चाहिए। 1. खरीद किये जाने वाले माल का नाम, किस्म आदि का सम्पूर्ण विवरण। 2. माल की संख्या या मात्रा 3. माल भेजने का माध्यम, अवधि तथा किराया। 4. माल का मूल्य 5. माल के मूल्य के भुगतान (Payment) का माध्यम आदि। प्रश्न 8. एक आदेश पत्र का नमूना बनाइए। उत्तर—आदेश पत्र का नमूना ललित सीमेन्ट लिमिटेड, धौलपुर फोन नं..... फैक्स नं..... मोबाइल नं..... ईमेल..... दिनांक..... मैसर्स मिलन बिल्डिंग मैटेरियल सप्लायर्स, नेहरू रोड, उदयपुर (राज.) पत्र क्रमांक : मिलन/7/2016 महोदय, आपका मेल दिनांक.....को प्राप्त हुआ। कृपया निम्नलिखित माल "अभिलाषा ट्रांसपोर्ट अजमेर" के द्वारा बिल्टी बनाकर भिजवाने की व्यवस्था करें। | विवरण | मात्रा | |---|---| | 1. सीमेन्ट 53 ग्रेड | 200 कट्टे | | 2. सीमेन्ट 43 ग्रेड | 400 कट्टे | | 3. व्हाइट सीमेन्ट | 100 कट्टे | कृपया माल समय पर भेजने का कष्ट करें। राशि का भुगतान आपके स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर के खाता संख्या..... में जमा करा दिया जाएगा। भवदीय, वास्ते ललित सीमेन्ट लि. धौलपुर प्रश्न 9. शिकायती पत्र क्या हैं। ये कितने प्रकार के होते हैं? इनकी भाषा एवं लिखने में सावधानियाँ बताइए। उत्तर—शिकायती पत्र—कभी-कभी हमें अपने सामान्य जीवन में कई प्रकार के शिकायती पत्र लिखने पड़ते हैं। कभी-कभी हमें पोस्टमास्टर को समय पर डाक नहीं पहुँचने की शिकायत करनी पड़ती है तो कभी मोहल्ले में गन्दगी होने की शिकायत सरपंच या नगर परिषद में करनी पड़ती है। ऐसे पत्र परिवाद या शिकायती पत्र कहलाते हैं। ऐसे पत्र दो प्रकार के होते हैं—(1) डाकखाने, रेलवे, बिजली, स्वास्थ्य, अभियांत्रिकी, यातायात सम्बन्धी कार्यालयों की पर्याप्त व्यवस्था करने हेतु लिखे जाने वाले पत्र। (2) व्यापारियों को लिखे जाने वाले पत्र। एक व्यापारी द्वारा दूसरे व्यापारी को उस समय शिकायती पत्र लिखना पड़ता है जबकि— (1) प्राप्त माल दिये गये आदेश पत्र के अनुसार न हो। (2) माल कम प्राप्त हुआ हो। (3) माल की किस्म घटिया हो। (4) माल का मूल्य तय मूल्य से अधिक हो। (5) माल समय पर प्राप्त नहीं हुआ हो। (6) माल रास्ते में टूट-फूट गया हो या खराब हो गया हो। शिकायती पत्र लिखते समय निम्न बातों को अवश्य ६ यान रखना चाहिए। (1) शिकायती पत्र शिष्ट और विनम्र भाषा में लिखना चाहिए। इन पत्रों को क्रोधित भाषा में नहीं लिखना चाहिए। (2) जिसके लिये शिकायत लिखी जाये उसका पूर्ण ब्यौरा देना चाहिए (3) माल की हानि के सम्बन्ध में विक्रेता व ट्रांसपोर्टर (रेलवे या ट्रक ट्रांसपोर्टर) दोनों को ही लिखना उचित होगा। (4) किसी निजी स्वार्थ व बेईमानी के इरादे से शिकायत नहीं करनी चाहिए। (5) जिन्हें पत्र लिखा जा रहा है उनके सम्मान एवं प्रतिष्ठा को बनाये रखने वाले शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। (6) पत्र लिखते समय सम्बन्धित अधिकारी अथवा व्यापारी का सहयोग प्राप्त करने का आग्रह करना चाहिए। इसी प्रकार इसका उत्तर भी संयत भाषा में संतोष दिलाता हुआ देना चाहिए। प्रश्न 10. किसी कम्पनी द्वारा आदेशानुसार माल नहीं भेजने पर एक शिकायती पत्र लिखिए। उत्तर— आदेशानुसार माल नहीं भेजने की शिकायत का पत्र SUPW | 33 विपिन कुमार, अशोक कुमार फैक्स न. .... सदर बाजार ई मेल— श्रीनगर फोन न..... दिनांक 06.06.2016 पत्र सं..... देव मार्केट, रजनीपुर, (राज), प्रिय महोदय, आपके पत्र संख्या 1822 दिनांक 6 अगस्त 2014 के साथ भेजे गये बिल संख्या 122 के माल की सुपुर्दगी आज हमें प्राप्त हुई है। हमें आपको बड़े खेद के साथ लिखना पड़ रहा है कि यह माल आपके एजेन्ट द्वारा दिखाये गये नमूने के अनुसार नहीं है। यह माल दिखाये गये नमूने से हल्के स्तर का है, जबकि मूल्य नमूने वाले माल के आधार पर ही लगाये गये हैं। हमने साफे मोठड़े के माँगाए थे जबकि हमें सादे पीले रंग के साफे भेजे गये हैं। ऐसी स्थिति में इस माल को स्वीकार करना हमारे लिये असम्भव है क्योंकि सादे पीले रंग के साफे पहले से ही हमारे पास अतिरिक्त पड़े हैं। कृपा करके अपने खर्चे पर इस माल को वापस मँगवाने की व्यवस्था कीजिए। हमारे पास मोठड़े के साफों की बहुत माँग है और ऐसा माल हमारे पास नहीं है। हमारे स्थाई ग्राहक खाली हाथ वापस लौट रहे हैं। अतः हमारे पूर्व में दिये गये आदेश के अनुसार दूसरा माल भेजने की शीघ्र व्यवस्था करने का कष्ट करें। भवदीय कृते विपिन कुमार, अशोक कुमार व्यस्थापक प्रश्न 11. गश्ती पत्र का नमूना प्रदर्शित कीजिए। उत्तर—गश्ती पत्र का नमूना माँ कैला देवी पुस्तक भण्डार फैक्स न. .... चौड़ा रास्ता ई मेल—..... जयपुर फोन न. .... दिनांक..... पत्र सं. .... मैसर्स..... ..... ..... प्रिय महोदय, हमारे सभी व्यापारी बन्धुओं को आपके द्वारा दिये जा रहे सहयोग के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद। सभी सम्माननीय बन्धुओं को सूचित करते हुए अत्यन्त हर्ष हो रहा है कि हमारे व्यवसाय के विस्तार के अन्तर्गत दिनांक 01 अप्रैल 2016 से हमारी नई शाखा बस स्टैण्ड के पास उदयपुर में खोली जा रही है। इस नई दुकान में कक्षा नर्सरी से बारहवीं तक की विभिन्न प्रकाशकों की पुस्तकें और साथ ही साथ महाविद्यालय स्तर एवं विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें उपलब्ध रहेगी। प्रकाशकों की विस्तृत सूची इस पत्र के साथ संलग्न है। आशा करते हैं कि आपका सहयोग पूर्व की भाँति बना रहेगा। भविष्य में हमारी उदयपुर की नई फर्म से व्यावसायिक लेन-देन करते रहेंगे। हमारी नई दुकान का पता निम्न लिखित है। माँ सरस्वती पुस्तक भण्डार दुकान न. 218 बस स्टैण्ड के पास, उदयपुर (राज.) भवदीय वास्ते माँ कैला देवी पुस्तक भण्डार,जयपुर। प्रश्न 12. प्रूफ रीडिंग क्या है ? इसे कैसे किया जाता है? उत्तर—प्रूफ रीडिंग—विभिन्न प्रकार की पुस्तकें मुद्रणालय (प्रेस) में मुद्रित की जाती हैं। जो विषय सामग्री छपने के लिए मुद्रणालय में भेजी जाती है उसे पहले कम्प्यूटर टाइपिस्ट द्वारा टाइप किया जाता है। टाइप की गई सामग्री को प्रिन्टर से एक सादे कागज पर प्रिन्ट कर लेते हैं जिसे प्रूफ कहते हैं। इस प्रूफ में जो अशुद्धियाँ रह जाती हैं, उन्हें सुधारना प्रूफ संशोधन या प्रूफ रीडिंग कहलाता है। अतः प्रूफ संशोधन वह क्रिया है जिसके द्वारा मुद्रणालय में मुद्रित होने वाली सामग्री की गलतियाँ ठीक की जाती है ताकि छपने वाली सामग्री सही-सही छपे। प्रूफ रीडिंग करना 1. प्रूफ के अगल-बगल में काफी चौड़ा हाशिया छोड़ना चाहिए तथा प्रूफ साफ होना चाहिए। 2. प्रत्येक पंक्ति की गलतियाँ उसी पंक्ति के सामने चिन्हित करनी चाहिए। 3. कोलन, सेमीकोलन, पूर्ण विराम आदि को वृत्त से घेर देना चाहिए। 4. गलतियाँ सुधारते समय संकेत चिन्ह क्रमशः होने चाहिए ताकि कम्प्यूटर ऑपरेटर उसी क्रम में अशुद्धियाँ सुधारता जाये। 5. प्रूफ में छपी सामग्री में अशुद्धि पर एक छोटी लकीर कर देनी चाहिए। 6. विषय सामग्री में चित्र होने पर यथास्थान चित्रों को जगह देनी चाहिए। 7. नया वाक्य जोड़ते समय हाशिये में स्थान न होने पर जोड़ने के स्थान पर स्पष्ट चिन्ह बनाकर प्रूफ के ऊपर या नीचे उसी तरह का चिन्ह बनाकर वाक्य को लिख देते हैं। प्रूफ के प्रकार— मुख्य रूप से प्रूफ तीन प्रकार के होते हैं— 1. पेज प्रूफ 2. गेली प्रूफ 3. फर्मा प्रूफ पेज प्रूफ में प्रत्येक पृष्ठ फोलियो (पृष्ठ संख्या) के साथ रहता है। गेली प्रूफ में ठोस मैटर रहता है। फर्मा प्रूफ में 34 | रतन पास बुक, कक्षा—9 पृष्ठ यथास्थान कम्पोज कर कसे जाते हैं या कम्प्यूटर पर टाइप किए जाते हैं। प्रश्न 3. प्रूफरीडिंग में प्रयुक्त संकेत चिन्हों का विवरण दीजिए। उत्तर—संकेत चिन्ह—प्रूफरीडिंग में गलतियों को सुधारने के लिए संकेत देने वाले चिह्न 'संकेत चिह्न' कहलाते हैं। संकेत चिन्हों को कागज में दोनों साइड में छोड़े गये हाशिये में लिखते हैं। गलतियाँ निकालने में काम आने वाले सभी चिन्ह प्रायः अंग्रेजी के ही होते हैं। इसलिए हिन्दी में भी उन्हीं का प्रयोग होता है। ये चिन्ह निम्नलिखित हैं— | क्रमांक | संकेत चिह्न | विवरण | |---|---|---| | 1. | Ital | इटेलिक्स में लिखिए | | 2. | L.C. | छोटे टाइप के अक्षर लगाइए | | 3. | Bold | गहरा अक्षर या शब्द लगाइए | | 4. | Stel | जैसा छपा है वैसा ही रहने दीजिए | | 5. | Run on | उसी परिच्छेद में चालू रखिए | | 6. | D | शब्द या अक्षर को निकाल दीजिए | | 7. | j/ | हाशिये में लिखे सामग्री जोड़िए या बदलिए | | 8. | Out see copy | भूली हुई सामग्री जोड़िए | | 9. | Spell out | संख्या या शब्द पूरा लिखिए | | 10. | X | टूटा अक्षर बदलिए | | 11. | w.f | गलत टाइप बदलिए | | 12. | /// | लीडर लगाइए | | 13. | S.C | कैपिटल अक्षर छोटा होना चाहिए | | 14. | C.&S.C. | प्रथम अक्षर कैपिटल और शेष अक्षर छोटे होने चाहिए | | 15. | Lees= | शब्दों के बीच स्थान कम कीजिए | | 16. | Underline | सामग्री को रेखांकित कीजिए | | 17. | Caps | कैपिटल अक्षर में लिखिए | | 18. | ? | सन्देह है अतः उचित अधिकारी से मिलिए | | 19. | trs | आपस में जगह बदल दीजिए | | 20. | Ds | शब्द या अक्षर को निकालकर मिला दीजिए | | 21. | NP | नया परिच्छेद प्रारम्भ करिए | | 22. | 6 | उल्टा अक्षर सीधा करिए। | | 23. | Centre | विषय सामग्री को पंक्ति के मध्य लाइए। | | 24. | Eq.# | स्थान बराबर छोड़िए | | 25. | # | अक्षरों के मध्य स्थान छोड़िए | | 26. | ? | प्रश्नवाचक चिह्न लगाइए | | 27. | " " | उद्धरण कोष्ठ लगाइए | | 28. | ./ | कोलन लगाइए | | 29. | / | फुल स्टाप लगाइए | | 30. | Take back | अक्षर, शब्द की लाइन, अगली पंक्ति स्तम्भ या पृष्ठ पर ले जाइए | |---|---|---| | 31. | (I) | विषय सामग्री कोष्ठक में लाइए | | 32. | ;/ | अर्धविराम लगाइए | | 33. | / | तिरछी रेखा लगाइए | | 34. | - | डैस लगाइए | | 35. | ' | अल्प विराम लगाइए | | 36. | ! | विस्मय बोधक चिह्न लगाइए | | 37. | I | पूर्ण विराम लगाइए | | 38. | ' | एपास्टापी लगाइए | | 39. | Tack over | अक्षर, शब्द की लाइन, पिछली पंक्ति स्तम्भ या पृष्ठ पर ले जाइए | | 40. | II | पंक्ति ठीक करिए | वैकल्पिक प्रवृत्ति समूह (ब) 7. खाद्य सामग्री का संरक्षण व शर्बत, साँस, अचार, मुख्या आदि का निर्माण पाठ-सार ● हमारे खाने के काम में आने वाले पदार्थ खाद्य-सामग्री कहलाते हैं। ● खाद्य पदार्थ को सड़ने से बचाने एवं लम्बे समय तक उनके रंग, सुगन्ध और स्वाद को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया को खाद्य संरक्षण कहते हैं। ● खाद्य पदार्थ को सुखाना या निर्जलीकरण करना खाद्य संरक्षण की एक प्राचीन विधि है। ● फलों एवं सब्जियों के संरक्षण की अनेक विधियाँ प्रचलित हैं; जैसे—सुखाना, ताप कम करना, रासायनिक पदार्थों से उपचारित करना, अन्य उत्पादों में बदलना आदि। ● कुछ फल एवं सब्जियाँ अधिक नमी के कारण खराब हो जाते हैं। इनका संरक्षण इन्हें सुखाकर किया जाता है। ● मटर, गाजर, गोभी, आलू, पालक, लहसुन आदि का निर्जलीकरण करके इन्हें भावी प्रयोग हेतु सुरक्षित रखा जा सकता है। ● खाद्य पदार्थों का निर्जलीकरण धूप में सुखाकर, मशीनों द्वारा अथवा विकिरण द्वारा सुखाकर किया जाता है। ● अनेक खाद्य पदार्थों का संरक्षण ताप को निम्न करके किया जाता है। ऐसा करने से खाद्य पदार्थों को खराब करने वाले जीवाणु निष्क्रिय हो जाते हैं। ● खाद्य पदार्थों के संरक्षण में काम आने वाली विधियों में रासायनिक पदार्थों द्वारा संरक्षण की विधि सरलतम है। SUPW | 35 ● रासायनिक पदार्थों द्वारा संरक्षण विधि में अनेक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है; जैसे—तेल, चाशनी, नमक, सिरका नीबू का रस, सोडियम या पोटैशियम मैटाबाइसल्फाइट, सोडियम बैंजोएट आदि। ● सेब, आम आँवला आदि का मुरब्बा चाशनी में डूबा हुआ रखकर संरक्षित किया जाता है। ● अदरक, प्याज आदि पदार्थों के अचार का संरक्षण करने के लिए उसे सिरका या नीबू के रस में डुबो कर रखा जाता है। ● सोडियम और पोटैशियम मैटाबाइसल्फाइट का प्रयोग फलों के रस, स्क्वैश, जैम, जैली आदि के संरक्षण में होता है। ● सोडियम बैंजोएट, बैंजोइक ऐसिड का लवण होता है जिसका प्रयोग फलों के रस, स्क्वैश, शर्बत आदि के संरक्षण में होता है। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. खाद्य सामग्रियों की नमी को हटाकर क्या रोका जा सकता है? (अ) उनका बढ़ना (ब) उनका सड़ना(ब) उनका गलना (द) उपर्युक्त में से कोई नहीं। 2. सोडियम का प्रयोग खाद्य सामग्री में किसलिए किया जाता है? (अ) संरक्षण हेतु (ब) स्वाद हेतु(स) निस्तारण हेतु (द) उपर्युक्त में से कुछ नहीं। उत्तर—1. (ब), 2. (अ)। लघूत्तरात्मक प्रश्न प्रश्न 1. खाद्य सामग्री के संरक्षण से क्या अभिप्राय है? उत्तर—खाद्य पदार्थों को सड़ने एवं खराब होने से बचाने और काफी समय तक उनके रंग, सुगन्ध और स्वाद को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया खाद्य सामग्री का संरक्षण कहलाती है। प्रश्न 2. निर्जलीकरण से आप क्या समझते हैं? उत्तर—बहुत से खाद्य पदार्थ उनमें उपस्थित अधिक नमी के कारण खराब हो जाते हैं। इससे बचाने के लिए खाद्य सामग्री को सुखाकर रखा जाता है। खाद्य सामग्री को सुखाने की प्रक्रिया को ही निर्जलीकरण कहते हैं। प्रश्न 3. शर्बत निर्माण में किस सामग्री की आवश्यकता होती है? उत्तर—शर्बत निर्माण में निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है— | पिसी हुई चीनी | — | 200 ग्राम | |---|---|---| | साइट्रिक ऐसिड | — | 10 ग्राम | | एथेन्स | — | 5 मिली | | खाने का रंग | — | 1 ग्राम | | पानी | — | 1 लीटर | निबन्धात्मक प्रश्न प्रश्न 1. अनाज के संरक्षण की विधि बताइए तथा इसमें रखी जाने वाली सावधानियाँ कौन-कौन सी हैं? उत्तर—अनाज का संरक्षण करने के लिए निम्नलिखित वस्तुओं का उपयोग किया जाता है— (i) कण्डे की राख(ii) पारे की मिट्टी या गोबर में गोलियाँ बनाकर डालने से(iii) नीम की सूखी पत्तियाँ डालकर(iv) विभिन्न कीटनाशक औषधियों के द्वारा जैसे— मेलाथियोन, इथायलीन, डाइब्रोमाइड एम्पून आदि। अनाज संरक्षण की विधि (i) सबसे पहले अनाज को धूप में भली भाँति सुखा लेते हैं। जिससे कि उसमें नमी न रहे। (ii) भण्डारण किए जाने वाले कनस्तर एवं धातु की टंकियों को अच्छी तरह साफ करके धूप में सुखा लीजिए। (iii) अब अनाज संरक्षण के लिए इसमें कण्डे की राख, नीम की सूखी पत्तियाँ या पारे की मिट्टी से बनी गोलियाँ अनाज में मिलाकर इसे संग्रहण पात्र में भर दीजिए। (iv) इसी प्रकार अनाज से भरी कोठियों के अन्दर अनाज को पैक कर देते हैं। यह ध्यान रखें कि हवा इनके अन्दर-बाहर नहीं आ-जा सके। (v) अनाज को चूहों से बचाने के लिए जिंक फास्फेट को आटे में मिलाकर शक्कर मिला देते हैं। जिससे चूहे इसे खाकर मर जायँ। सावधानियाँ— (i) अनाज को संरक्षण से पहले धूप में भली भाँति सुखा लेना चाहिए। (ii) अनाज की बोरियों को दीवार के साथ सटाकर नहीं रखना चाहिए क्योंकि दीवार में सीलन हो सकती है। (iii) अनाज को ठंडे एवं शुष्क स्थान पर संरक्षित करना चाहिए। (iv) जहाँ तक संभव हो अनाज का भण्डारण धातु के पात्रों में करना चाहिए। (v) नीम की पत्तियों को सुखाकर ही अनाज में डालना चाहिए। नीम के पत्तियों की पोटली बनायी जा सकती है। (vi) यदि औषधि की गोलियाँ रखी जाएँ तो डिब्बों को वायुरोधक कर देना चाहिए। (vii) जिंक फास्फेट जहर है अतः इससे बचकर रहना चाहिए। प्रश्न 2. किन्हीं दो प्रकार के अचार निर्माण की विधि विस्तार से समझाइए। उत्तर— 1. आम का अचार (सादा) | आम | — | 1 किलोग्राम | |---|---|---| | पिसी मिर्च | — | 20 ग्राम | | मेथी के बीज | — | 10 ग्राम | 36 | रतन पास बुक, कक्षा—9 | सौंफ | — | 15 ग्राम | |---|---|---| | नमक | — | 140 ग्राम | | सरसों का तेल | — | 150 ग्राम | | हल्दी | — | 6 ग्राम | विधि—आमों को धोकर टुकड़ों में काटिए। तश्तरी में सारी सामग्री आधे तेल के साथ मिलाइए। कटे हुए आम को चीनी मिट्टी या काँच के बर्तन में रखें और बचे हुए तेल को ऊपर से मिलाकर पात्र को ढक दें। कुछ दिन तक आम के पात्र को धूप में रखिए। हर दिन पात्र को हिलाइए ताकि तेल ऊपर आ जाए। जब आम मुलायम पड़ जाए, तब इस अचार का उपयोग कर सकते हैं। 2. नींबू का मीठा अचार | नींबू | — | 1 किलोग्राम | |---|---|---| | चीनी | — | 500 ग्राम | | पिसी मिर्च | — | 3 चाय चम्मच | | काला नमक | — | 50 ग्राम | | हल्दी | — | 2 चाय चम्मच | | हींग | — | 2 चाय चम्मच | विधि—प्रत्येक नींबू को काटकर उसके चार बराबर हिस्से कीजिए। नींबुओं का लगभग आधा रस निचोड़ लीजिए। मुलायम होने तक नींबुओं को भाप दिखाइए। फिर ठंडा होने के लिए अलग रख दीजिए, बाकी सामग्री को मिलाएँ और नींबुओं के आधे हिस्से में भर दें। नींबुओं का निकाला गया रस डालें और अच्छी तरह मिलाएँ। नींबू के अचार को काँच के पात्र में या चीनी मिट्टी के पात्र में रखें और 2 - 3 दिन तक धूप में रखें। अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न 1. खाद्य पदार्थों के संरक्षण से— (अ) इन्हें लम्बे समय तक सड़ने से बचाया जा सकता है। (ब) इनके रंग, स्वाद और सुगन्ध को सुरक्षित रखा जा सकता है। (स) इन पर जीवाणुओं के प्रभाव को कम किया जा सकता है। (द) उपरोक्त सभी। 2. निर्जलीकरण संखाद्य पदार्थ में— (अ) नमी दूर हो जाती है (ब) एन्जाइमों की अभिक्रिया एक जाती है (स) जीवाणुओं की क्रिया रुक जाती है (द) ये सभी 3. निर्जलीकरण के लिए किस प्रकार की विकिरण प्रयोग की जाती है? (अ) पराबैंगनी किरणें (ब) बीटा किरणें(स) गामा किरणें (द) ये सभी। 4. भण्डार गृहों में खाद्य सामग्री को संरक्षित किया जाता है— (अ) निर्जलीकरण द्वारा (ब) निम्न ताप रखकर (स) उच्च ताप देकर (द) रसायनों का उपयोग करके। 5. निम्नलिखित में से कौन-सा खाद्य सामग्री के संरक्षण में उपयोग किया जाता है? (अ) नमक (ब) सिरका (स) सोडियम बैंजोएट (द) ये सभी। 6. जैम तथा जैली में सोडियम मेटाबाई सल्फाइट की सान्द्रता रखी जाती है— (अ) 0.1 प्रतिशत (ब) 0.2 प्रतिशत (स) 1.0 प्रतिशत (द) 2.0 प्रतिशत। 7. ओ. आर. एस. घोल के घटक हैं— (अ) पानी-नमक-चीनी (ब) पानी-नमक-ग्लूकोज (स) पानी-सोडा-चीनी (द) पानी-काला नमक-सोडा। उत्तर—1. (द) 2. (द) 3. (द) 4. (ब) 5. (द) 6. (ब) 7. (अ)। अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. खाद्य सामग्री किसे कहते हैं? उत्तर—हमारे खाने के काम में आने वाले पदार्थ खाद्य सामग्री कहलाते हैं। प्रश्न 2. खाद्य संरक्षण किसे कहते हैं? उत्तर—खाद्य पदार्थों को सड़ने व खराब होने से बचाने एवं उनके रंग, सुगन्ध व स्वाद को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने की क्रिया खाद्य संरक्षण कहलाती है। प्रश्न 3. संरक्षित की जाने वाली फल व सब्जियाँ कैसी होनी चाहिए? उत्तर—संरक्षित की जाने वाली फल व सब्जियाँ अधिक पकी या अधिक कच्ची नहीं होनी चाहिए। ये मध्यम आकार की होनी चाहिए। प्रश्न 4. मटर, गाजर, गोभी, आलू आदि का संरक्षण किस विधि द्वारा किया जा सकता है? उत्तर—धूप में सुखाकर। प्रश्न 5. आलू को संरक्षित करने के लिए उसे कोल्ड स्टोरेज में क्यों रखा जाता है? उत्तर—आलू को खराब करने वाले एन्जाइम एवं जीवाणु कम ताप के कारण निष्क्रिय हो जाते हैं। प्रश्न 6. फलों के रस, स्क्वैश एवं शर्बत के संरक्षण में सोडियम बैंजोएट की सान्द्रता कितनी रखी जाती है? उत्तर—0.3 प्रतिशत। प्रश्न 7. किन्हीं दो खाद्य उत्पादों के नाम बताइए जिनमें परिरक्षक मिलाने की आवश्यकता होती है? उत्तर—(i) टमाटर का सॉस, (ii) जैली। SUPW | 37 प्रश्न 8. किन्हीं दो कीटनाशक औषधियों के नाम लिखिए। उत्तर—(i) मेलाथियोन (ii) डाइब्रोमाइड एम्पून। लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. ताप कम करके संरक्षण कैसे किया जाता है? उत्तर—जीवाणुओं की उत्पत्ति के लिए उचित ताप की आवश्यकता होती है। अतः भण्डारगृहों में ताप कम करके उनमें रखी खाद्य सामग्री को सड़ने से बचाया जा सकता है। इसी सिद्धान्त पर आलू जैसी खाद्य सामग्री को कोल्ड स्टोरेज में रखकर उसे सड़ने से बचाया जाता है। प्रश्न 2. परिरक्षक क्या हैं? उदाहरण सहित लिखिए। उत्तर—ऐसे पदार्थ जिनका उपयोग खाद्य सामग्री के परिरक्षण के लिए किया जाता है, परिरक्षक कहलाते हैं। उदाहरण—तेल, चाशनी, नमक, सिरका, नींबू का रस, सोडियम या पोटेशियम मेटा बाइसल्फाइट, सोडियम बैंजोएट आदि। प्रश्न 3. तेल या चाशनी में किन पदार्थों को संरक्षित किया जाता है? उत्तर—1. कैरी, मिर्च आदि का अचार डालकर उसे एक बर्तन में रख देते हैं और फिर उसमें सरसों का तेल इतना भर देते हैं कि सम्पूर्ण अचार उसमें डूबा रहे। इस प्रकार अचार खराब होने से बच जाता है। 2. सेब, आँवला, आम आदि का मुरब्बा चाशनी में डूबा हुआ रखकर संरक्षित किया जाता है। प्रश्न 4. किन खाद्य पदार्थों को नींबू के रस एवं रासायनिक पदार्थों द्वारा संरक्षित किया जाता है? उत्तर—1. अदरक, प्याज, लहसुन आदि के अचार को सिरका या नींबू के रस द्वारा संरक्षित किया जाता है। 2. फलों के रस, स्क्वैश, जैम, जैली आदि को रासायनिक पदार्थ जैसे सोडियम और पोटेशियम मेटा बाइसल्फाइट द्वारा संरक्षित किया जाता है। प्रश्न 5. मटर का निर्जलीकरण करने की विधि लिखिए। उत्तर—मटर का निर्जलीकरण—ताजा मटर छील लें। छिले हुए मटर के दानों को मलमल के एक कपड़े में बाँधकर 2-3 मिनट के लिए उबलते हुए पानी में रखें। इसके बाद इन्हें उण्डे पानी में डाल दें। अब इन्हें पोटेशियम मेटाबाइ सल्फाइट के घोल में 5 मिनट तक रखकर निकाल लें और धूप में सुखा लें। अब मटर के दानों को कीटाणु रहित किये गये बर्तन में रखकर उण्डे स्थान पर रख दें। इन्हें कभी भी उपयोग किया जा सकता है। प्रश्न 6. आम का मीठा अचार बनाने की विधि लिखिए। उत्तर— आम का मीठा अचार | सामग्री | मात्रा | |---|---| | आम | 1 किलोग्राम | | चीनी | 1 किलोग्राम | | नमक | 20 ग्राम | |---|---| | पिसी मिर्च | 20 ग्राम | | इलायची | आधा चम्मच | विधि— (i) आमों को भली-भाँति धोकर इनकी लम्बी-लम्बी फाँके काट लें। (ii) इनमें अब नमक मिला लीजिए और अनावश्यक द्रव निचोड़ दीजिए। (iii) अब इसमें चीनी डालिए और चासनी गाढ़ी होने तक गर्म करें। (iv) अब इसमें पिसी हुई इलायची और मिर्च डालिए। (v) अब मुरब्बे को चीनी मिट्टी या काँच के बर्तन में रखिए। (vi) यदि आग पर नहीं पकाना है तो 15 दिन तक धूप में रखा जा सकता है। प्रश्न 7. नींबू के खट्टे-मीठे अचार बनाने में प्रयुक्त सामग्री लिखिए। उत्तर— | सामग्री | मात्रा | |---|---| | नींबू | 1 किलोग्राम | | चीनी | 1 किलोग्राम | | हल्दी | 50 ग्राम | | नमक | 50 ग्राम | | राई | 50 ग्राम | | धनिया | 50 ग्राम | | सौंफ | 50 ग्राम | | मिर्च पाउडर | 30 ग्राम | | हींग | 5 ग्राम | | मेथी के बीज | 100 ग्राम | प्रश्न 8. नींबू का खट्टा-मीठा अचार बनाने की विधि लिखिए। उत्तर—नींबू का खट्टा-मीठा अचार बनाने की विधि—नींबूओं को धोकर उन्हें दो या चार भागों में काटिए। इनमें नमक न हल्दी मिलाइए और चीनी मिट्टी या काँच के पात्र में रखिए। दस दिनों तक प्रत्येक दिन हिलाते हुए रखिए। नींबूओं को छाया में सुखाइए बाकी सामग्री अच्छी तरह मिलाइए और तीन-चार घण्टों के बाद नींबू के टुकड़े डालिए। काँच के पात्र में रखिए और 15 दिन तक तैयार होने तक पड़ा रहने दीजिए। प्रश्न 9. आँवले का मुरब्बा बनाने की विधि लिखिए। उत्तर—आँवले का मुरब्बा बनाने की विधि— (i) ठीक से पके हुए तथा बिना दाग धब्बों वाले 2 किग्रा आँवले लेकर इन्हें सादे पानी में डालकर तीन दिन के लिए रख देते हैं। (ii) अब इन्हें पानी से निकाल कर कपड़े से अच्छी तरह 38 | रतन पास बुक, कक्षा—9 पोंछ लेते हैं तथा काँटे, किसी नुकीली वस्तु की सहायता से इन्हें गोदते हैं। (iii) अब आँवलों को तीन दिन तक चूने के पानी में भिगोने दें। (iv) चौथे दिन इन्हें साफ पानी से धो लेते हैं। (v) अब 1 लीटर पानी में 100 ग्राम मिश्री घोलकर आँवलों को इस घोल में उबालते हैं। जब ये आधे गल जाएँ तो इन्हें स्वच्छ कपड़े पर फैला देते हैं। (vi) अब आँवले से दुगुने वजन की चीनी की चाशनी बना लेते हैं और एक उबाल आने पर आँवले डालकर पकाते हैं। दस मिनट बाद उतारकर रख देते हैं। (vii) अगले दिन फिर आग पर चढ़ाकर एक तार की चासनी आने तक पकाते हैं। उतारकर ठंडा कर लेते हैं व इलायची पाउडर व केसर बुरक देते हैं। (viii) अब इसे मर्तबान (चीनी मिट्टी के पात्र) या काँच के ढक्कनदार जार में रख देते हैं। (ix) इसमें किसी भी परिरक्षक को मिलाने की आवश्यकता नहीं है। प्रश्न 10. शर्बत पाउडर कैसे बनाया जाता है। सामग्री सहित लिखिए ? उत्तर— शर्बत पाउडर बनाना | सामग्री | मात्रा | |---|---| | पिसी हुई चीनी | — 200 ग्राम | | साइट्रिक ऐसिड | — 10 ग्राम | | ऐथेन्स | — 5 मिली | | खाने का रंग | — 1 ग्राम | विधि—समस्त पदार्थ एक में मिलाकर एयर-टाइट ढक्कन वाले डिब्बों में पैक कर लेते हैं। इस पाउडर की एक चम्मच गिलास भर पानी में घोलने से तुरन्त शर्बत तैयार हो जाता है। रंग व ऐथेन्स अपनी पसन्द के अनुसार कम या अधिक मिला सकते हैं। प्रश्न 11. ठण्डाई बनाने की विधि लिखिए। उत्तर— ठण्डाई बनाने की विधि | सामग्री | मात्रा | |---|---| | दूध | — 100 ग्राम | | पानी | — 200 ग्राम | | चीनी | — 100 ग्राम | | इलायची | — 4 ग्राम | | काली मिर्च पाउडर | — 20 ग्राम | | बादाम गिरी | — 10 ग्राम | | गुलाब के पत्ते | — कुछ | | खरबूजे की गिरी | — 2 चाय चम्मच | | सौंफ | — 2 चाय चम्मच | (यह मात्रा दो गिलास ठण्डाई के लिए है) विधि—सामग्री में बताए गए सभी मसालों को सिलबट्टे पर बारीक पीसकर पानी में घोल लें और छान लें। अब दूध तथा चीनी मिलाकर बर्फ डाल दें। ठण्डाई तैयार है। प्रश्न 12. ओ. आर. एस. घोल बनाने की विधि लिखिए। उत्तर— ओ. आर. एस. घोल बनाना | सामग्री | मात्रा | |---|---| | पानी | — 1 गिलास | | चीनी | — 2 चाय चम्मच | | नमक | — 2 चुटकी | विधि—एक गिलास पानी में 2 चम्मच चीनी व दो चुटकी नमक मिलाकर उसको घोल लें। O.R.S घोल तैयार है। विस्तृत उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. खाद्य पदार्थों को सुखाकर संरक्षित करने की विभिन्न विधियाँ बताइए। उत्तर—खाद्य पदार्थों को सुखाकर संरक्षित करना— (अ) धूप में सुखाना—इस विधि में फलों एवं सब्जियों को सबसे पहले धोकर, सुखाकर टुकड़ों में काट लिया जाता है। इन्हें अब एक ट्रे में लेकर किसी छोटे कमरे में रख देते हैं और कमरे में गन्धक जला देते हैं। गन्धक का धुआँ फलों व सब्जियों को जीवाणुओं द्वारा नष्ट होने व सड़ने से बचाता है साथ ही उनकी प्राकृतिक सुगन्ध एवं रंग को भी बनाए रखता है। अब फलों व सब्जियों की इस ट्रे को धूप में तब तक रखते हैं जब तक कि ये पूर्णतः सूख नहीं जाएँ। अब इन्हें बड़े डिब्बों में भरकर सुरक्षित स्थान पर रख देते हैं। मटर, गाजर, गोभी, आलू आदि का संरक्षण इसी विधि से किया जाता है। (ब) यान्त्रिक निर्जलीकरण—सामान्यतया घरों में सामान्य परिस्थितियों में खाद्य पदार्थों को धूप में सुखाकर इनका निर्जलीकरण आसानी से किया जाता है। यदि खाद्य पदार्थों का निर्जलीकरण बड़े पैमाने पर और व्यापारिक उद्देश्य से किया जाना है, तब इसके लिए यान्त्रिक विधि अपनाते हैं। इस विधि में निर्जलीकरण के लिए मशीनों का उपयोग किया जाता है। इसमें धुली व कटी हुई सब्जियों एवं फलों को मशीन के विशेष कक्ष में रख दिया जाता है। इसमें ताप, नमी एवं वायु प्रवाह नियंत्रित रहता है। मटर, आलू, गाजर, पालक, अंगूर आदि का निर्जलीकरण इस विधि से किया जाता है। (स) विकिरण द्वारा सुखाना—इस विधि में फलों एवं सब्जियों को सुखाने के लिए पराबैंगनी किरणें, गामा किरणें, बीटा किरणें आदि उपयोग की जाती हैं। ये किरणें जीवाणुनाशक का कार्य करके खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखती हैं। पराबैंगनी किरणों का उपयोग भण्डारगृहों की वायु में उपस्थित जीवाणुओं को मारने के लिए किया जाता है। ये किरणें खाद्य पदार्थ के रंग, सुगन्ध एवं स्वाद को भी SUPW | 39 नष्ट कर देती है। अतः इसका प्रयोग कुछ विशेष पदार्थों के संरक्षण में ही किया जाता है। प्रश्न 2. टमाटर का सॉस बनाने में प्रयुक्त सामग्री और बनाने की विधि लिखिए। उत्तर— टमाटर का सॉस | सामग्री | मात्रा | |---|---| | लाल टमाटर | — 2 किग्रा | | अदरक | — 25 ग्राम | | चीनी | — 250 ग्राम | | नमक | — 40 ग्राम | | सोडियम बैंजोएट | — 2 चम्मच | | सिरका | — 20 ग्राम | | लाल मिर्च | — 5 ग्राम | | प्याज, लहसुन | — आवश्यकतानुसार | | पिसा गर्म मसाला | — 10 ग्राम | विधि—अच्छी तरह धुले हुए टमाटरों को काटकर स्टील की पतीली या भगोने में आग पर चढ़ा दें। उबल जाने पर उसे बारीक छलनी में मथकर छान लें ताकि बीज व छिलके अलग हो जाएँ। लाल मिर्च, गर्म मसाला, पिसी अदरक, प्याज, लहसुन और चीनी एक अलग बर्तन में थोड़े पानी में उबाल लें। पानी उबल जाने पर इस घोल को टमाटर की स्टील वाली पतीली में डालकर आग पर गर्म करें। इसमें नमक डाल दें। थोड़ी देर बाद टमाटर का सॉस तैयार हो जाता है। अब पतीली को आग से उतारकर उसमें बैंजोएट और सिरका डाल दें। शीशियों में गर्म-गर्म ही भरकर रख लें। प्रश्न 3. मिलाजुला अचार और हरी मिर्च का अचार बनाने की विधि सामग्री सहित लिखिए। उत्तर— मिला-जुला अचार | सामग्री | मात्रा | |---|---| | कच्चे हरे आम | — 1 किलोग्राम | | नींबू | — 250 ग्राम | | हरी मिर्च | — 100 ग्राम | | गाजर | — 100 ग्राम | | शलजम | — 200 ग्राम | | नमक | — 500 ग्राम | | हल्दी पाउडर | — 60 ग्राम | | धनिया पाउडर | — 50 ग्राम | | मिर्च पाउडर | — 250 ग्राम | | मूँगफली या सरसों का तेल | — 500 ग्राम | विधि—(i) सभी सब्जियों को उपयुक्त आकार में काटकर टुकड़े कर लेते हैं। (ii) अब इनमें अच्छी तरह नमक मिलाकर धूप में सुखाते हैं। (iii) अगले दिन सभी मसाले तेल में रखकर 3-4 मिनट तक गरमाते हैं, आग से हटाकर ठंडा होने देते हैं। (iv) अब इसमें मिश्रित सब्जियाँ डालते हैं। (v) मिश्रण को चीनी मिट्टी या काँच के बर्तन में रखते हैं और लगभग एक सप्ताह तक धूप में पड़ा रहने देते हैं। (vi) इसे सात-आठ दिन तक प्रतिदिन हिलाते हुए रखते हैं। (vii) मिला-जुला अचार तैयार है। हरी मिर्चों का अचार | सामग्री | मात्रा | |---|---| | हरी मिर्च | — 500 ग्राम | | सरसों का तेल | — 300 ग्राम | | लहसुन | — 60 ग्राम | | राई | — 60 ग्राम | | खट्टे नींबू | — 6 | | मेथी के बीज | — एक चाय चम्मच | | हल्दी | — 40 ग्राम | | नमक | — 6 चाय चम्मच | विधि—(i) हरी मिर्चों को धोकर व पोंछकर लम्बाई में चीर लेते हैं। (ii) मेथी को छोड़कर अन्य मसाले पीस लेते हैं। (iii) कड़ाही में तेल गर्माकर मेथी के बीजों को तलकर भून लेते हैं। (iv) अब इसमें हरी मिर्च डालकर मुलायम होने तक तलते हैं, ध्यान रहे कि इनका रंग हरा ही बना रहे। (v) पिसी सामग्री में एक प्याला पानी अथवा नींबू का रस डालते हैं। (vi) सामग्री को तब तक पकाएँ जब तक अचार कड़ाही में तेल छोड़ने न लगे। (vii) गर्म-गर्म अचार चीनी मिट्टी या काँच के बर्तन में भर दें। (viii) इसे तुरंत ही इस्तेमाल कर सकते हैं। प्रश्न 4. निम्न के अचार बनाने में प्रयुक्त सामग्री तथा विधि लिखिए। (अ) भरी हुई लाल मिर्च (ब) गाजर का अचार उत्तर— (अ) भरी हुई लाल मिर्च का अचार | सामग्री | मात्रा | |---|---| | लाल मिर्च | — 500 ग्राम | | सरसों का तेल | — 400 मिली लीटर | | आम का चूरा (अमचूर) | — 400 ग्राम | | राई | — 50 ग्राम | | मेथी के बीज | — 50 ग्राम | | अजवाइन | — 50 ग्राम | | धनिया पाउडर | — 100 ग्राम | | नमक | — 100 ग्राम | विधि—(1) अचार वाली बड़ी-बड़ी लाल मिर्च लेते हैं। इनके डण्ठल तोड़कर डण्ठल के स्थान पर छेद कर देते हैं। 40 | रतन पास बुक, कक्षा—9 2. छोटी खोदनी (स्टिक) की सहायता से बीज निकाल देते हैं। 3. राई, मेथी के बीज, प्याज और धनिए को हल्की आँच में भून कर पीस लेते हैं। 4. नमक, अमचूर और मिर्च के बीज डालते हैं। 5. मिश्रण को छोटी खोदनी की सहायता से मिर्चों में भरते हैं। 6. भरी मिर्चों को चीनी मिट्टी या काँच के पात्र में रखते हैं। 7. सरसों का तेल छोड़ते हैं और अच्छी तरह बंद कर दे हैं। 8. महीने भर में अचार तैयार हो जाएगा। (ब) गाजर का अचार | सामग्री | मात्रा | |---|---| | गाजर | — 500 ग्राम | | सरसों का तेल | — 2 बड़े चम्मच | | नमक | — 50 ग्राम | | मिर्च पाउडर | — 50 ग्राम | | राई | — 50 ग्राम | | हल्दी पाउडर | — 1 चाय चम्मच | | खट्टे नींबूओं का रस | — आवश्यकतानुसार | | हींग | — चुटकी भर | विधि—1. गाजरों को धोकर इनके लगभग दो इंच लम्बे टुकड़े काट लेते हैं। 2. नमक, मिर्च, हल्दी और राई डालकर अच्छी तरह मिलाते हैं। 3. किसी बर्तन में तेल गरमाकर उसमें हींग को भूरा होने तक तल लेते हैं और फिर आग से उतार लेते हैं। 4. जब ठंडा हो जाए तो सारी सामग्री एक साथ मिला देते हैं और फिर काँच के पात्र में भर लेते हैं। प्रश्न 5. फूलगोभी का अचार बनाने में प्रयुक्त सामग्री तथा बनाने की विधि लिखिए। उत्तर— फूलगोभी का अचार बनाना | सामग्री | मात्रा | |---|---| | फूलगोभी | — 5 किलोग्राम | | नमक | — 300 ग्राम | | मिर्च पाउडर | — 150 ग्राम | | जीरा | — 10 ग्राम | | इलायची | — 8 ग्राम | | लौंग | — 10 ग्राम | | कच्चा अदरक | — 2 इंच का टुकड़ा | | दाल-चीनी | — 2 इंच का टुकड़ा | | राई | — 100 ग्राम | | प्याज | — 150 ग्राम | | सरसों का तेल | — 750 ग्राम | | सिरका | — 750 मिलीलीटर | विधि—(i) फूलगोभी और प्याज को टुकड़ों में काट लीजिए। (ii) फूलगोभी को धोकर, निचोड़कर सूखने के लिए धूप में दो घंटे फैला दीजिए। (iii) राई को छोड़कर अन्य सभी मसालों को पीस कर महीन पाउडर बना लीजिए। (iv) अब फूलगोभी में प्याज, मसाला पाउडर व राई डालकर चलाइए। (v) तीन-चार घंटे धूप में रहने दीजिए। (vi) अब इसमें सिरका डालिए और धूप में पुनः 2-3 दिन तक रखिए। (vii) लगभग एक सप्ताह में अचार तैयार हो जाएगा। प्रश्न 6. आम और गाजर का मुरब्बा बनाने में प्रयुक्त सामग्री तथा बनाने की विधि लिखिए। उत्तर— आम का मुरब्बा | सामग्री | मात्रा | |---|---| | कच्चे आम | — 2 किलोग्राम | | चीनी | — 4 किलोग्राम | | चूना | — 4 चाय चम्मच | | जीरा | — 25 ग्राम | | सौंफ | — 20 ग्राम | | साबुत काली मिर्च | — 10 ग्राम | | इलायची | — 5 ग्राम | | तेजपात | — 5 ग्राम | | तेल | — 100 ग्राम | विधि—(i) पहले आमों को छीलकर पतली-पतली चिप्सों में काट लीजिए। (ii) अब चार चम्मच चूने में 500 मिली पानी डालकर छान लीजिए तथा आम के टुकड़ों को इस पानी में लगभग 20 मिनट के लिए भीगने दीजिए। (iii) अब आम के टुकड़ों को चूने के पानी से निकाल कर धो लीजिए। (iv) अब एक कड़ाही में 100 ग्राम तेल गर्म करके जीरे का छोंक लगाइए ओर आम के टुकड़े मसाले सहित इसमें डाल दीजिए। (v) इसी समय चीनी भी डाल दीजिए (vi) जब चाशनी पककर गाढ़ी हो जाए तब इन्हें मर्तबान में भर लीजिए। गाजर का मुरब्बा | सामग्री | मात्रा | |---|---| | गाजर | — 2 किलोग्राम | | चीनी | — गाजर के वजन से डेढ़ गुनी | | नींबू | — 1 | SUPW | 41 विधि—(i) दो किग्रा मीठी गाजर लेकर उन्हें साफ कर लीजिए। (ii) ध्यान रखना चाहिए कि गाजर मोटी हो किन्तु बीच में बड़े नट वाली न हो। (iii) गाजरों के छोटे-छोटे टुकड़े काट लीजिए। (iv) गाजर के टुकड़ों को एक उबाल देकर उतार लीजिए फिर साफ कपड़े पर डाल कर उन्हें स्टील के काँटे से गोद लीजिए। (v) अब गाजर के वजन से डेढ़ गुनी चीनी की चाशनी बनाइए। (vi) एक उबाल आने पर गाजर उसमें डाल दीजिए और 10 मिनट तक पकाइए। इसके बाद आँच से उतार कर रख दीजिए। (vii) अगले दिन इन्हें फिर आँच पर चढ़ाइए और चाशनी को एक तार आने तक पकाइए। (viii) अब इसमें एक नींबू का रस डाल कर उतार लीजिए। (ix) इसमें इलायची पाउडर को बुरककर काँच या चीनी मिट्टी के बर्तन में भर लीजिए। प्रश्न 7. निम्नलिखित शर्बतों को बनाने में प्रयुक्त सामग्री तथा बनाने की विधि लिखिए। (अ) पुदीने का शर्बत (ब) शहतूत का शर्बत (स) फालसे का शर्बत। उत्तर— (अ) पुदीने का शर्बत | सामग्री | मात्रा | |---|---| | पुदीने की पत्तियाँ | — 50 ग्राम | | गुलकन्द | — 100 ग्राम | | काली मिर्च | — 15-20 | | छोटी इलायची | — 8-10 | | पीपल | — 4-5 | | चीनी | — 150 ग्राम | | बर्फ | — शर्बत ठण्डा होने योग्य | विधि—(i) पुदीने की पत्तियों को धो लें जिससे सारी मिट्टी साफ हो जाए। (ii) अब सिलबट्टे या मिक्सी में पुदीना व गुलकन्द तथा सभी मसाले डालकर बारीक पीस लें। (iii) पिसी सामग्री को किसी पतले कपड़े से छान लें तथा चीनी व आवश्यकतानुसार पानी मिलाकर पुनः छान लीजिए। (iv) बर्फ के टुकड़े गिलासों में डालिए और शर्बत पीजिए। (ब) शहतूत का शर्बत | सामग्री | मात्रा | |---|---| | पानी | — 1 किलोग्राम | | पक्के शहतूत | — 250 ग्राम | | चीनी | — स्वादानुसार | विधि—(i) सबसे पहले अच्छी तरह पके शहतूत लीजिए। सम्भव हो तो काले शहतूत अधिकता में लीजिए क्योंकि इनमें आयरन अधिक होता है। (ii) अब इन्हें पानी में डालकर तब तक मसलिए जब तक कि इनका गूदा बारीक न हो जाए। (iii) गूदा बारीक हो जाने पर एक लीटर पानी व स्वादानुसार चीनी डालकर छलनी से छान लीजिए। (iv) शहतूत का शर्बत तैयार है। (स) फालसे का शर्बत | सामग्री | मात्रा | |---|---| | फालसे | — 100 ग्राम | | पानी | — 1 किलोग्राम | | चीनी | — स्वादानुसार | | बर्फ | — शर्बत ठण्डा होने योग्य | विधि—(i) लगभग 100 ग्राम अच्छी तरह पके फालसे लेकर उन्हें धोकर स्टील, चीनी मिट्टी या काँच के बर्तन में लेकर इसमें एक गिलास ठंडा पानी डालिए। (ii) अब इन्हें हाथों से अच्छी तरह मसलिए। (iii) बीज अलग होने पर इसमें एक किग्रा चीनी व आवश्यकतानुसार पानी डालकर घोल लीजिए और हिलाइए। (iv) अब इस घोल को छलनी से छान लीजिए। (v) इसमें बर्फ मिलाकर फालसे के शर्बत का आनन्द लीजिए। प्रश्न 8. निम्नलिखित शर्बतों को बनाने में प्रयुक्त सामग्री व बनाने की विधि लिखिए। 1. चन्दन का शर्बत 2. आम का पन्ना (शर्बत) 3. इमली का शर्बत उत्तर— 1. चन्दन का शर्बत | सामग्री | मात्रा | |---|---| | चीनी | — 5½ प्याले | | पानी | — 3 प्याले | | चन्दन पाउडर | — 25 ग्राम | | रूह केवड़ा | — 2 उपहार चम्मच | विधि—(i) चन्दन पाउडर को रातभर 1½ प्याले पानी में भिगो दीजिए। (ii) कुछ मिनट तक उबालिए। (iii) अब इसे मलमल के कपड़े से दो बार छानिए और अलग रख लीजिए। (iv) चीनी और बाकी पानी से चिपचिपी चाशनी बनाइए। (v) इसमें चन्दन का पानी डालिए और फिर से चिपचिपी हाने तक पकाइए, ठण्डा करके केवड़ा डालिए। (vi) चन्दन का शर्बत तैयार है। 2. आम का पन्ना (शर्बत) | सामग्री | मात्रा | |---|---| | कच्चे आम | — 4 मध्यम आकार के | 42 | रतन पास बुक, कक्षा—9 | चीनी | — | 100 ग्राम | |---|---|---| | पोदीना | — | 10 ग्राम | | नमक | — | स्वादानुसार | | लाल मिर्च | — | ½ चम्मच (चाय वाली) | | सूखा धनिया पाउडर | — | ½ चम्मच (चाय वाली) | | भुना हुआ जीरा | — | 1 चाय चम्मच | विधि—(i) सबसे पहले आम को पानी में उबलने हेतु रख दीजिए। (ii) गलने पर आमों को छीलकर गुठली से अलग कर लीजिए, अब सामग्री में बताये गये सभी मसाले रस में डालकर चम्मच से चलाइए। (iii) आम का पन्ना तैयार है। गर्मियों में इसे पीने से लू नहीं लगेगी। 3. इमली का शर्बत | सामग्री | मात्रा | |---|---| | पक्की इमली | — 50 ग्राम | | चीनी | — स्वादानुसार | | काला नमक | — (1/4) एक चौथाई (चाय चम्मच) | | पिसा पुदिना | — 1 चाय चम्मच | | पानी | — 1 किलोग्राम | | बर्फ | — ठण्डा होने योग्य | विधि—(i) सबसे पहले इमली को पानी में भिगो दीजिए। (ii) आधा घण्टा भीगने के बाद इसे खूब मसलिए। (iii) जब गूदा अलग हो जाए तो चीजों को अलग कर दीजिए। (iv) अब एक किलो पानी में चीनी, काला नमक, पिसा हुआ पोदीना मिलाकर हिलाइए। इसके बाद शर्बत को छानकर बर्फ डाल दें। (v) इमली का शर्बत तैयार है। प्रश्न 9. निम्नलिखित को बनाने में प्रयुक्त सामग्री तथा बनाने की विधि लिखिए। 1. जलजीरा 2. आलू के चिप्स 3. आलू के पापड़ उत्तर— 1. जलजीरा | सामग्री | मात्रा | |---|---| | इमली | — 100 ग्राम | | गरम पानी | — 6 प्याले | | जीरा (भुना हुआ) | — 2 बड़े चाय चम्मच | | पुदीना पत्तियाँ | — 1/4 गाँठ | | काला नमक | — ½ चाय चम्मच | | चीनी | — 3 बड़े चाय चम्मच | | काली मिर्च पाउडर | — ½ चम्मच (चाय वाली) | | नमक सादा | — ½ चम्मच (चाय वाली) | विधि—(i) इमली को गर्म पानी में एक घण्टे तक भिगोइए। (ii) इसका रस निकालकर छान लें। (iii) पुदीने की पत्तियाँ और भुने हुए जीरे को पीसकर बारीक लेप बना लें और इन्हें इमली के रस में मिला लें। (iv) चीनी, नमक और काली मिर्च डालिए और अच्छी तरह मिलाइये। (v) ठण्डा कीजिए और उसका प्रयोग कीजिए। 2. आलू के चिप्स | सामग्री | मात्रा | |---|---| | आलू | — 4 बड़े आलू | | नमक | — 3 चाय चम्मच | | तेल | — 250 ग्राम | विधि—(i) आलू को अच्छी तरह धोकर उनको छील लें। (ii) अब इन्हें गोल व बारीक-बारीक टुकड़ों में काट लीजिए और पानी में धोकर एक बड़े बर्तन में पानी लेकर उसमें नमक मिला लें तथा आलू के टुकड़ों को उसमें 30 मिनट तक भिगोकर रखें। (iii) उसके बाद टुकड़ों को उसमें से निकालकर सुखा लेते हैं। (iv) फिर एक कढ़ाई में तेल को 180° पर गर्म कर लेते हैं। (v) अपने स्वाद के अनुसार उसमें नमक व मिर्च मिला लेते हैं और अब उनका उपयोग करते हैं। 3. आलू के पापड़ | सामग्री | मात्रा | |---|---| | आलू | — 1 किलोग्राम | | नमक | — स्वादानुसार | | काली मिर्च | — 10 ग्राम | | जीरा | — 10 ग्राम | | हींग | — 2 ग्राम | | तेल | — 100 ग्राम | विधि—(i) आलुओं को उबालकर व छीलकर, सिलबट्टे पर बारीक पीस लीजिए। (ii) इससे उसमें आँटे की तरह लोच आ जायेगी। (iii) आलुओं में सभी मसाला डालकर सिलबट्टे से पीसकर गूंद लें। (iv) अब हाथों पर तेल लगाकर छोटी-छोटी लोईयाँ बनाकर दो पॉलीथीन शीट के मध्य रखकर बेलन एवं चकले से बेलें या हाथ से दबा-दबाकर लोई को फैला लें या बढ़ा लें। (v) अब इसे धूप में सुखा लें। (v) सूख जाने पर पापड़ को तेल में तलकर नमक-मिर्च बुरककर खाइए। प्रश्न 10. अनाज का संरक्षण करना क्यों आवश्यक है? समझाइए। उत्तर—अनाज का संरक्षण—अनाज हमारा प्रमुख खाद्यान्न है और हमारे भोजन का मुख्य अवयव भी है। विभिन्न प्रकार के खाद्यान्न हमारे देश में विभिन्न ऋतुओं में पैदा किए जाते हैं। हरियाणा व पंजाब का गेहूँ, बीकानेर व बाड़मेर का बाजरा, टोंक व देहरादून का चावल अपनी अत्यधिक मात्रा को दर्शाते हैं। अनाज की आवश्यकता हर किसी को सदैव रहती है इसलिए प्रायः सभी घरों में अनाज का भण्डारण वर्ष भर के लिए किया जाता है। व्यापार के SUPW | 43 लिए व्यापारी भी अनाज का संरक्षण करते हैं और समय आने पर अधिक मुनाफे के साथ बेचते हैं। भण्डारण में अनाज खराब न हो इसलिए छात्रों को अनाज संरक्षण के बारे में जानकारी देना आवश्यक है। अनाज संरक्षण की आवश्यकता अनाज का संरक्षण निम्नांकित कारणों से आवश्यक है— (1) अनाज में नमी रहने पर कीड़े लग जाते हैं जो अनाज के स्वाद, गंध तथा पौष्टिक तत्वों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। (2) अनाज में नमी के कारण ही उसमें घुन लग जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक हैं। (3) नमी के कारण सूक्ष्म जीवाणु भी अनाज में पनपने लगे हैं जो अनाज को विषाक्त कर देते हैं। (4) नमी के कारण अनाज में फफूँदी लग जाती है, जिससे अनाज खाने योग्य नहीं रहता है। (5) चूहे भी अनाज को कुतरकर नष्ट कर देते हैं तथा मलमूत्र त्यागकर अनाज को दूषित कर देते हैं। ● ● 8. प्रवृत्ति समूह (स) (1) विभिन्न प्रकार के टाँके लगाना, कपड़ों की मरम्मत करना, हुक लगाना, काज बनाना और बटन टाँकना। (2) कढ़ाई और फेब्रिक पेंटिंग, कपड़ों पर कलफ लगाना, बाटिक पेंटिंग। सारांश ● वस्त्रों की सिलाई हेतु विभिन्न टाँकों का प्रयोग किया जाता है। ● दो कपड़ों को अस्थाई रूप से जोड़ने के लिए या तुरपाई के लिए कपड़े को व्यवस्थित करने के लिए कच्चे टाँके का प्रयोग किया जाता है। ● बखिया टाँका हाथ की सिलाई का सबसे मजबूत टाँका कहलाता है। ● तुरपाई वस्त्रों के मोड़े गए किनारों जैसे—स्कर्ट का घेर, गले की पट्टी, बाजू के किनारे आदि पर की जाती है। ● इन्टरलॉक टाँका कपड़ों, कम्बल, गर्म कपड़ों के किनारों पर सज्जा के लिए तथा वस्त्रों के भीतरी किनारों से रेशों को निकलने से रोकने के लिए परिसज्जा के लिए बनाया जाता है। ● कपड़ों की सजावट एवं फिटिंग के लिए अलग-अलग आकार के बटन लगाए जाते हैं। बटन के लिए काज की आवश्यकता होती है। ● हुक अधिकतर स्त्रियों के कपड़ों की फिटिंग के लिए प्रयोग किए जाते हैं। हुक धातु के बने हुए छोटे एवं बड़े आकार के होते हैं। ● आई दो प्रकार से लगाई जाती है। एक धातु से बनी और दूसरी धागे से तैयार की जाती है। ● कशीदाकारी वस्त्रों को सुई एवं बहुरंगी धागों से सुसज्जित करने का हस्तशिल्प है। ● कशीदाकारी के अनेक तरीके प्रचलित हैं; जैसे—चेन स्टिच, क्रोस स्टिच, बटन होल, रनिंग, लेजीडेजी, जीकजेक आदि। ● फेब्रिक पेंटिंग छात्राओं एवं घरेलू महिलाओं के लिए बहुत अच्छी रूचि एवं लघु स्तर पर अर्थ प्राप्ति का अच्छा साधन है। ● वस्त्र में ताजगी, कड़ापन, चमक व आकर्षण लाने के लिए कलफ लगाया जाता है। ● बाटिक एक प्रकार की अवरोधक रंगाई है। इससे वस्त्रों का आकर्षण बढ़ता है। अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. दो कपड़ों को अस्थाई रूप से जोड़ने के लिए प्रयोग किया जाता है— (अ) बखिया टाँका (ब) कच्चा टाँका (स) इन्टरलॉक (द) तुरपाई 2. उल्टी तरफ से लगाया जाने वाला टाँका है— (अ) बखिया टाँका (ब) कच्चा टाँका (स) काज (द) तुरपाई 3. वस्त्रों को कड़क एवं चमकदार बनाने के लिए लगाया जाता है। (अ) मोम (ब) कलफ (स) पेंट (द) कढ़ाई 4. माँड होता है— (अ) गेहूँ का स्टार्च (ब) अरारोट का स्टार्च (स) चावल का स्टार्च (द) उपरोक्त सभी 5. बाटिक पेंटिंग में अवरोध के रूप में उपयोग होता है— (अ) मोम (ब) स्टार्च (स) रंग (द) खड़िया उत्तर—1. (ब) 2. (द) 3. (ब) 4. (स) 5. (अ)। लघूउत्तरात्मक प्रश्न प्रश्न 1. कपड़ों के आन्तरिक किनारों से रेशे निकलने से रोकने के लिए कौन-सा टाँका उपयोग करते हैं ? उत्तर—कपड़ों के आन्तरिक किनारों से रेशे निकलने से रोकने के लिए इंटरलॉक टाँके का उपयोग किया जाता है। प्रश्न 2. कशीदाकारी के मुख्य टाँकों के नाम लिखिए। उत्तर—(i) कच्चा टाँका, (ii) बखिया टाँका, (iii) तुरपाई, (iv) इंटरलॉक टाँका। 44 | रतन पास बुक, कक्षा—9 प्रश्न 3. बाटिक पेंटिंग की विधि बताइए। उत्तर—बाटिक पेंटिंग की विधि—बाटिक कार्य में वस्त्र पर नमूना ट्रेस कर लिया जाता है। डिजाइन के जिस भाग को कपड़े के रंग का रखना है, उस पर मोम लगा दिया जाता है। कपड़े को रंग के घोल में डुबोते हैं। मोम लगे भाग को छोड़कर शेष भाग पर रंग चढ़ जाता है। सुखाने पर मोम जगह-जगह चटक जाता है जिससे इन जगहों पर भी रंग चढ़ जाता है। अब मोम को साफ कर दिया जाता है। यही बाटिक पेंटिंग विधि है। निबन्धात्मक प्रश्न प्रश्न 1. कलफ कितने प्रकार के होते हैं ? कलफ लगाने की विधि का वर्णन कीजिए। उत्तर—कलफ लगाना—लगातार प्रयोग से सूती वस्त्र नरम, मुलायम तथा चमकहीन हो जाते हैं। ये वस्त्र पहनने वाले व्यक्ति के आकर्षण को कम करते हैं। अतः वस्त्र में ताजगी, कड़ापन, चमक व आकर्षण लाने के लिए कलफ (स्टार्च) लगाया जाता है। स्टार्च या कलफ विभिन्न प्रकार के होते हैं। साधारणतया घरेलू उपयोग में, (1) गेंहूँ का स्टार्च, (2) चावल का स्टार्च (माँड़), (3) अरारोट का स्टार्च लिया जाता है। (1) गेंहूँ का स्टार्च—इसके लिए मैदे का पेस्ट बनाकर खौलते पानी में पेस्ट डालते जाते हैं और साथ ही हिलाते जाते हैं। एक समान श्यान घोल बन जाने के बाद इसमें अधिक जल मिलाकर हिलाते हैं। (2) चावल का स्टार्च—चावलों को खौलते पानी में पकाइए। जब चावल पककर नरम हो जाए तो इसमें से माँड़ अलग कर लीजिए। माँड़ में अतिरिक्त जल मिलाकर एक समान घोल तैयार कर लीजिए। इस विधि से स्टार्च तैयार हो जाता है लेकिन चावल के पौष्टिक तत्व निकल जाते हैं। (3) अरारोट का स्टार्च—अरारोट का कलफ तैयार करने के लिए इसकी थोड़ी सी मात्रा को जल में घोलकर पेस्ट तैयार कर लेते हैं। अब इस पेस्ट को खौलते हुए जल में डालकर कलफ तैयार कर लेते हैं। कलफ तैयार करते समय लगातार कलछी से चलाते रहते हैं ताकि गुठली नहीं बने। जब घोल गाढ़ा व पारदर्शी बन जाए तो आवश्यकतानुसार ठंडा पानी मिलाकर इस्तेमाल करते हैं। कलफ लगाने की विधि— (1) उपरोक्त विधि द्वारा तैयार किए गए घोल को वस्त्र भिगोने जितनी मात्रा में एक नाद या बाल्टी में लेते हैं। (2) वस्त्र की तहों को अच्छी तरह खोलकर तैयार किए गए कलफ में एक बार भीतर डुबोकर ऊपर उठाइये। यह क्रिया तब तक दोहराएँ जब तक कि सम्पूर्ण वस्त्र कलफ से पूर्णतः संतृप्त न हो जाए। (3) वस्त्र को निचोड़ कर सूखने के लिए फैला दीजिए। (4) वस्त्र पर कुछ नमी रहे तभी इस पर इस्तरी कर दीजिए। प्रश्न 2. बेडशीट पर फेब्रिक पेंटिंग की विधि का वर्णन कीजिए एवं एक आकर्षक डिजाइन बनाइए। उत्तर—फेब्रिक पेंटिंग की विधि—सबसे पहले कपड़े को फ्रेम पर कस लिया जाता है। कपड़े पर जो डिजाइन बनाना है उसे चित्रित कर लिया जाता है अथवा छाप लिया जाता है। प्रारम्भ में सरल प्रकार के डिजाइन बनाए जाते हैं किन्तु अच्छा अभ्यास होने पर जटिल डिजाइन बनाए जा सकते हैं। इसमें इच्छानुसार या डिजाइन की आवश्यकतानुसार सपाट रंग भरे जाते हैं। तत्पश्चात् आवश्यकतानुसार शेडिंग दे दी जाती है। कपड़े पर रंगों को अच्छे से सूखने देने के पश्चात् पीछे से प्रेस कर लिया जाता है या कोई पतला कपड़ा उस पर रखकर प्रेस कर लिया जाता है। फ्रेब्रिक गोंद की सहायता से कपड़े पर नगीने तार-सितारे, मोती, चीड़े, काँच आदि भी चिपकाए जा सकते हैं और इसे अलंकृत किया जा सकता है। अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न 1. ये टाँके दूर-दूर लगाए जाते हैं और ये अस्थाई होते हैं— (अ) कच्चे टाँके (ब) बखिया टाँके(स) इंटरलॉक टाँके (द) ये सभी 2. बटन के लिए इसकी आवश्यकता होती है— (अ) हुक की (ब) काज की(स) तुरपाई की (द) सलाई की 3. आई लगाई जाती है— (अ) दो प्रकार से (ब) तीन प्रकार से(स) चार प्रकार से (द) अनेक प्रकार से 4. लूप-स्टिच टाँका उपयोग किया जाता है— (अ) बखिया टाँका में (ब) कशीदाकारी में(स) इंटरलॉक टाँके में (द) बटन टाँके में 5. कशीदाकारी का तरीका है— (अ) रनिंग स्टिच (ब) चेन स्टिच(स) स्टेम स्टिच (द) ये सभी SUPW | 45 6. बाटिक होती है— (अ) सम्पूर्ण रंगाई (ब) ठप्पे की छपाई(स) अवरोधक रंगाई (द) इनमें से कोई नहीं उत्तर—1. (अ), 2. (ब), 3. (अ), 4. (स), 5. (द), 6. (स) अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. वस्त्रों पर टाँके क्यों लगाए जाते हैं ? उत्तर—वस्त्रों की मरम्मत, दो सतहों को जोड़ने तथा काज एवं बटन टाँकने के लिए टाँके लगाए जाते हैं। प्रश्न 2. बखिया में सुई से एक बार में कितने टाँके लगाए जाते हैं ? उत्तर—बखिया में सुई से एक बार में एक ही टाँका लगाया जाता है। प्रश्न 3. कशीदाकारी क्या है ? उत्तर—कशीदाकारी वस्त्रों को सुई एवं बहुरंगी धागों से सुसज्जित करने का हस्तशिल्प है। प्रश्न 4. कशीदाकारी किन कपड़ों पर की जाती है ? उत्तर—कशीदाकारी साड़ी, सूट, कुर्ती, लहँगे आदि पर की जाती है। प्रश्न 5. स्टेम स्टेच का प्रयोग विशेष रूप से किसके लिए किया जाता है ? उत्तर—स्टेम स्टेच का प्रयोग फूलों की डंडियों या टहनियों को बनाने के लिए विशेष रूप से किया जाता है। प्रश्न 6. फेब्रिक पेंटिंग छात्राओं के लिए क्यों आवश्यक है ? उत्तर—फेब्रिक पेंटिंग से छात्राओं में प्रतिभा का विकास होता है। प्रश्न 7. फेब्रिक व एक्रेलिक कलर का प्रमुख गुण क्या है ? उत्तर—फेब्रिक व एक्रेलिक कलर रेडी टू यूज एवं धोने योग्य होते हैं। लघूउत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. कच्चे टाँके का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर—दो कपड़ों को अस्थाई रूप से जोड़ने के लिए या तुरपाई के लिए कपड़े को व्यवस्थित करने हेतु कच्चे टाँके का प्रयोग किया जाता है। कच्चे टाँके दूर-दूर लगाए जाते हैं। इसके लिए लंबे धागे एवं लंबी सुई का उपयोग किया जाता है। पक्की सिलाई होने पर कच्चा टाँका निकाल दिया जाता है। प्रश्न 2. बखिया टाँका क्या होता है ? समझाइए। उत्तर—बखिया टाँका हाथ की सिलाई का सबसे मजबूत टाँका होता है। कपड़े के हिसाब से यह टाँका छोटा या बड़ा लगाया जाता है। यह टाँका दाहिनी ओर से बाँयी ओर लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। बखिया में सुई से एक बार में एक ही टाँका लगाया जाता है। टाँका बराबर लगाते हुए जहाँ से सुई निकाली गई हो वहीं से एक बार पीछे की ओर सुई निकाल कर आगे बढ़ते हैं जहाँ एक टाँका खत्म होता है वहीं से दूसरा टाँका प्रारम्भ होता है। प्रश्न 3. हुक कहाँ और कैसे लगाए जाते हैं ? उत्तर—हुक प्रायः महिलाओं के कपड़ों की फिटिंग के लिए उपयोग किए जाते हैं। हुक धातु के बने हुए छोटे या बड़े आकार के होते हैं। ये सदैव पोशाक के दायें भाग की बटन पट्टी पर लगाए जाते हैं। जहाँ हुक लगाना है वहाँ निशान लगाकर हुक को निशान पर रखें एवं दोनों ओर के गोल भाग को सुई द्वारा दोहरे धागे से चार-पाँच बार बाहर निकाल कर पक्का कर लें। फिर मुड़े हुए भाग को धागे को तीन बार निकालकर पक्का कर दें। प्रश्न 4. आई कैसे लगाई जाती है ? उत्तर—आई दो प्रकार से लगाई जाती है। एक आई धातु की बनी हुई होती है और दूसरी धागे द्वारा बनायी जा सकती है। धातु से बनी आई को लगाने के लिए निशान पर रखकर छेद से तीन चार बार दोहरे धागे से पक्का कर लेते हैं। धागे से आई बनाने के लिए धागे को सुई की सहायता से कुछ दूरी पर तीन चार बार निकालते हैं। फिर उस धागे पर बटन होल (लूप टाँके) की सहायता से पूरा बना लेते हैं। प्रश्न 5. कशीदाकारी क्या है ? यह किन कपड़ों पर की जाती है ? उत्तर—कशीदाकारी वस्त्रों को सुई एवं बहुरंगी धागों से सुसज्जित करने का हस्तशिल्प है। इसमें कपड़े को अलंकृत करने के लिए मोती, सितारे, चीड़े, सिक्केन्स, काँच, गोटा आदि का भी उपयोग किया जाता है। कशीदाकारी साड़ी, सूट, कुर्ती, लहँगे इत्यादि पर की जाती है। प्रश्न 6. कशीदाकारी के लिए आवश्यक सामग्री लिखिए। उत्तर—कशीदाकारी की सामग्री—(1) कपड़ा (सूती, रेशमी आदि) (2) सुई (आवश्यकतानुसार विभिन्न आकारों वाली) (3) विभिन्न रंगों एवं प्रकार के धागे (4) डिजाइन पैटर्न (5) अन्य सामान जैसे—मोती, सितारे, काँच, चीड़े आदि (6) आवश्यकतानुसार फ्रेम विस्तृत उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए— (1) तुरपाई (2) इन्टरलॉक टाँका उत्तर—(1) तुरपाई—वस्त्रों की सिलाई के लिए यह एक उपयोगी टाँका है। यह वस्त्रों के मोड़े गए किनारों जैसे—स्कर्ट का घेर, मोहरी, गले की पट्टी, बाजू के किनारे आदि पर की जाती है जिससे वस्त्रों पर मशीन के टाँके न 46 | रतन पास बुक, कक्षा—9 दिखें। तुरपाई करने के लिए कपड़े के उस स्थान को अच्छी तरह प्रेस करके कपड़े के किनारे को भली भाँति अंदर की ओर मोड़ लेते हैं, जिससे वस्त्र बाहर न निकले। तुरपाई का टाँका सदैव उल्टी ओर लगाते हैं। तुरपाई के वस्त्र को बराबर मोड़ते हुए कपड़े को अपने बायें हाथ की उँगलियों में फँसाकर, दायें हाथ में सुई पकड़कर नीचे वाले भाग को लेते हुए ऊपर की ओर छोटा टाँका निकालते हैं। इस प्रकार थोड़ी-थोड़ी दूरी पर टाँका लगाते हैं। कपड़े के सीधी ओर टाँका कम दिखाई देने चाहिए। उल्टी ओर टाँका तिरछापन लिए हुए दिखाई देता है। (2) इंटरलॉक टाँका—इस प्रकार के टाँके कम्बल, गर्म कपड़ों के किनारे पर सज्जा के लिए तथा वस्त्रों के, भीतरी किनारों से रेशों को निकलने से रोकने के लिए परिसज्जा हेतु बनाए जाते हैं। इस टाँके को लूप स्टिच भी कहते हैं। यह टाँका हाथ से बनाते समय बाईं ओर से प्रारम्भ करते हुए सुई को कपड़े की परत में डालकर ऊपर किनारे की ओर आगे की ओर डालते हुए लूप बनाते हुए निकालते हैं। आजकल मशीन द्वारा यह टाँके लगाए जाते हैं। प्रश्न 2. काज-बटन की प्रविधियाँ समझाइए। उत्तर—कपड़ों की सजावट एवं फिटिंग के लिए अलग-अलग आकार-प्रकार के बटन लगाए जाते हैं। बटन लगाने के लिए काज की भी आवश्यकता होती है। बटनों के अनुसार काजों का भी आकार होता है। बटन—ये कई प्रकार के होते हैं। कुछ बटन दो छेद वाले तो कुछ चार छेद वाले होते हैं। बटन सदैव दोहरी सतह पर मजबूत दोहरे धागे से लगाए जाने चाहिए। काज के अनुसार कपड़े पर पेंसिल से निशान लगाने के बाद बटन को सही प्रकार से जमाकर छेद में से सुई निकाल लेते हैं। कपड़े के निचले भाग तक सुई को बाहर निकालना चाहिए। कई बार सुई निकाल कर बटन को मजबूती से लगाते हैं। मजबूती हेतु बटन को सतह से ऊपर की ओर उठाकर बटन के नीचे गोलाई में धागा घुमाकर टाँका पक्का कर देते हैं। काज—जहाँ काज बनाना होता है कपड़े के इस भाग को लकड़ी के तख्ते पर रखकर काज के आकार का निशान लगाकर कपड़े को दोहरा कर कैंची से कट लगाते हैं। कटे हुए किनारे पर बारीक कच्चा टाँका लगाकर पास-पास लूप टाँका बनाते हुए काज भरना शुरू करते हैं। दोनों किनारों पर लूप टाँके गोलाई में भरकर काज बनाते हैं। प्रश्न 3. कशीदाकारी के विभिन्न तरीकों का विवरण दीजिए। उत्तर—कशीदाकारी के अनेक तरीके प्रचलित हैं। जैसे—चेन स्टिच, क्रॉस स्टिच, बटन होल, रनिंग स्टिच, लेजीडेजी, जीकजेक आदि। कुछ तरीकों का विवरण निम्न प्रकार है— (1) रनिंग स्टिच—यह कशीदाकारी में आउट लाइन करने का एक अच्छा तरीका है। यह बहुत जल्दी कम समय में हो जाता है। यह कशीदा हाथ की सामान्य सिलाई के समान किया जाता है। (2) बैक स्टिच—इससे बेस लाइन बनायी जाती है। यह भी आउट लाइन करने का एक तरीका है। (3) स्टेम स्टिच—इस स्टिच का प्रयोग फूलों की डंडियों या टहनियों को बनाने के लिए विशेष रूप से किया जाता है। इससे घुमावदार लाइनें भी आसानी से बनायी जा सकती हैं। SUPW | 47 (4) स्टेन स्टिच—यह एक अच्छी भरवां स्टिच है, इसमें प्राथमिक टॉके के विपरीत ओर से सुई कपड़े में पिरोई जाती है और फिर इसके पास में टॉका लगाया जाता है। प्रश्न 4. फेब्रिक पेंटिंग के लिए आवश्यक सामग्री लिखिए। फेब्रिक डिजाइन के प्रकार भी बताइये। उत्तर—फेब्रिक पेंटिंग के लिए आवश्यक सामग्री— (1) कपड़ा (सूती, रेशमी, ऊनी आदि) (2) ब्रश (गोल ब्रश नं. 1, 2, 4, 6 एवं 8) (3) फ्रेम (विभिन्न आकार के) (4) कलर प्लेट (5) पानी की कटोरी (6) डिजाइन (7) रफ कपड़ा (ब्रश साफ करने के लिए) (8) फेब्रिक/एक्रेलिक कलर (9) कलर पतला करने के लिए मीडियम फेब्रिक व एक्रेलिक कलर रेडी टू यूज एवं धोने योग्य होते हैं। आजकल इन रंगों की कई किस्में उपलब्ध हैं; जैसे—पर्ल कलर, मेटेलिक, गिलटर्स इत्यादि। ये रंग किसी भी प्रकार के कपड़े पर काम में लिए जा सकते हैं। फेब्रिक डिजाइन के प्रकार—फूलों, ज्यामितीय, परम्परागत, मानव एवं पशु-पक्षी की आकृतियों वाले आदि। प्रश्न 5. बाटिक किस प्रकार तैयार किया जाता है ? सचित्र विवरण दीजिए। उत्तर—बाटिक—यह एक प्रकार की अवरोधक रंगाई है। बाटिक कार्य में सबसे पहले वस्त्र पर डिजाइन का नमूना ट्रेस कर लिया जाता है। डिजाइन के जिस भाग को सफेद या मूल कपड़े के रंग का रखना होता है, वहाँ पर मोम लगा दिया जाता है। इसके लिए मोम को पिघलाकर ब्रश द्वारा गर्म मोम की तह वस्त्र पर लगाते हैं और इसे सुखा लेते हैं। अब कपड़े को रंग के घोल में डुबोते हैं जिससे मोम लगे स्थान को छोड़कर शेष स्थानों पर रंग चढ़ जाता है। मोम के सूखने व वस्त्र के रंगने के दौरान मोम की तह जगह-जगह से चटक जाती है जिससे इन जगहों पर भी रंग चढ़ जाता है। अब वस्त्र को सुखाकर पहले की तरह दूसरे रंग के लिए पुनः मोम लगाकर वस्त्र को रंग लिया जाता है। वस्त्र को सदैव हल्के रंग से गहरे रंग की ओर रंगा जाता है। पूरी तरह सूखने पर वस्त्र को गर्म पानी में डुबोकर हटा लिया जाता है। इस प्रकार विभिन्न रंगों से रंगा आकर्षक वस्त्र तैयार हो जाता है। ●● 9. प्रवृत्ति समूह (द) (1) मोम, प्लास्टर ऑफ पेरिस, मिट्टी-कुट्टी से उपयोगी वस्तुएँ बनाना, जिल्दसाजी करना। (2) अनुपयोगी सामग्री से सजावट की वस्तुएँ बनाना, रंगोली बनाना। सारांश ● बाजारों में उपलब्ध मोम को पिघलाकर एवं रंग मिलाकर आकर्षक मोमबत्तियाँ, दीपक एवं विभिन्न प्रकार के खिलौने बनाए जा सकते हैं। ● मिट्टी से प्लास्टर ऑफ पेरिस के साँचों की सहायता से अनेक प्रकार की मूर्तियाँ, खिलौने एवं अन्य आकृतियाँ बनायी जाती हैं। ● पुस्तकों की जिल्द साजी करके इन्हें अधिक सुरक्षा प्रदान की जा सकती है। ● जिल्दसाजी एक ऐसा कार्य है जिसके द्वारा छोटे स्तर पर अर्थ-प्राप्ति भी हो जाती है। ● घरों से निकली अनेक व्यर्थ वस्तुओं से कुछ आकर्षक एवं उपयोगी वस्तुएँ बनायी जा सकती हैं, जैसे—पेन-स्टैण्ड बनाना, राइटिंग पैड बना आदि। ● एक विशिष्ट डिजाइन में विभिन्न रंगों का समायोजन करने को रंगोली कहते हैं। ● लिपे-पुते, अधसूखे आँगन पर गेरू एवं खड़िया से भाँति-भाँति के बनाए जाने वाले चित्र मांडणे कहलाते हैं। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. माँडणा बनाने के लिए उपयोग करते हैं— | (अ) फूलों की पत्तियाँ | (ब) गुलाल | |---|---| | (स) गेरू एवं खड़िया | (द) ऑयल कलर | 2. पुस्तकों को अधिक समय तक सुरक्षित रखने हेतु की जाने वाली क्रिया है— | (अ) पृष्ठों की सिलाई | (ब) जिल्दसाजी | |---|---| | (स) लेमिनेशन | (द) पेंट | उत्तर—1. (स), 2. (ब)। 48 | रतन पास बुक, कक्षा—9 लघूउत्तरात्मक प्रश्न प्रश्न 1. प्लास्टर ऑफ पेरिस से साँचा किस प्रकार बनाया जाता है ? उत्तर—प्लास्टर ऑफ पेरिस से साँचा बनाने के लिए इसे पहले पानी मिलाकर गीला किया जाता है। अब इस अर्धठोस घोल को किसी आकृति या खिलौने पर लपेटा जाता है। सूखने के बाद दो साइडों से काटकर सावधानी पूर्वक अन्दर की आकृति को निकाल लिया जाता है। प्लास्टर ऑफ पेरिस के खोल साँचे का कार्य करते हैं। प्रश्न 2. जिल्दसाजी की उपयोगिता का वर्णन कीजिए। उत्तर—पुस्तकों का उपयोग करते-करते कुछ ही समय में इनके ऊपरी पृष्ठ फटकर अलग हो जाते हैं। धीरे-धीरे अन्य पृष्ठ निकलने लगते हैं और पुस्तक उपयोगी नहीं रहती। पुस्तकों को लम्बे समय तक सहेज कर रखने एवं संग्रहणीय बनाए रखने के लिए जिल्दसाजी आवश्यक है। प्रश्न 3. रंगोली क्यों बनाते हैं ? उत्तर—आँगन, चबूतरा आदि को सजाने एवं आकर्षक बनाने के लिए रंगोली बनाई जाती है। कुछ अवसरों पर रंगोली बनाने का काफी महत्व है। प्रश्न 4. माँडने बनाने में कौन-कौन सी वस्तुओं का उपयोग होता है। उत्तर—माँडने बनाने में गेरू एवं खड़िया का उपयोग किया जाता है। प्रश्न 5. उचित रंग के संयोजन से एक रंगोली का डिजाइन तैयार कीजिए। उत्तर— निबन्धात्मक प्रश्न प्रश्न 1. पुस्तकों पर जिल्दसाजी क्यों आवश्यक है ? पुस्तक पर जिल्दसाजी का विस्तार से वर्णन कीजिए। उत्तर—जिल्दसाजी—पुस्तकों का उपयोग करते-करते इनके ऊपरी पृष्ठ फट-फट जाते हैं और इनके अन्य पृष्ठ भी निकलने लगते हैं। पुस्तकों की सुरक्षा के लिए जिल्दसाजी अत्यंत आवश्यक है। जिल्दसाजी निम्न प्रकार की जाती है— (1) सबसे पहले पुस्तक के सभी पृष्ठ एक समान कर लेते हैं। यदि इसके किनारे मुड़कर अस्त-व्यस्त हो गए हों तो थोड़ा-सा काटकर एक समान कर लेते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि लिखा हुआ भाग न कटे। (2) पुस्तक के आकार के दो गते लेते हैं। (3) पुस्तक के बाएँ भाग जहाँ सभी पृष्ठ जुड़े हैं लम्बाई में तीन छेद सुए अथवा कील की सहायता से बना लेते हैं। (4) गते में भी उतनी ही समान दूरी पर तीन छेद कर लेते हैं। (5) पुस्तक एवं गते के छेदों में से सुई की सहायता से मोटे व मजबूत धागे को दो-तीन बार निकालते हुए पक्का करते हैं। (6) गते के किनारों पर तिरछा मजबूत कपड़ा या कागज लगा दिया जाता है। वही कपड़ा या कागज लम्बाई में चौड़ी पट्टी के रूप में सिलाई को ढकते हुए दोनों ओर सफाई से लगाते हैं। (7) रंगीन चिकना कागज उक्त स्थान को छोड़ते हुए गते पर दोनों ओर चिपकाते हैं। (8) गते के अन्दर की ओर ब्राउन पेपर चिपका देते हैं। (9) पूरी पुस्तक के ऊपर एक समान वजन रखकर कुछ घंटे के लिए दबा देते हैं ताकि सूखने के बाद जिल्द टेढ़ी न हो। प्रश्न 2. अनुपयोगी सामग्री से सजावट की कोई वस्तु बनाने की विधि बताइए। उत्तर—अनुपयोगी वस्तु सामग्री से सजावट की वस्तु बनाना—घर में प्रयोग करते-करते कई वस्तुएँ खराब एवं अनुपयोगी हो जाती हैं। थोड़ी सी मेहनत और कलात्मक सोच से अनुपयोगी वस्तुएँ आकर्षक एवं उपयोगी बनायी जा सकती हैं। आकर्षक ट्रे तैयार करना—अनुपयोगी क्लिप बोर्ड का क्लिप हटाकर उस पर रंगीन चमकीला कागज या कपड़ा चिपका दीजिए। क्लिप बोर्ड की लम्बाई और चौड़ाई के बराबर गोल कम वजन के डंडे या पाइप के दो-दो टुकड़े काट लें। इन टुकड़ों पर उसी रंग का कागज या कपड़ा लपेटें। साटन का रंगीन रिबन की लपेट सकते हैं। इन सजाए हुए टुकड़ों को बोर्ड के किनारों पर चिपका दीजिए। अधिक मजबूती के लिए क्लिप बोर्ड उल्टा कर छोटी कील भी ठोकी जा सकती है। इस तरह अनुपयोगी सामग्री से सजावट की एवं उपयोग वस्तु तैयार हो जाती है। प्रश्न 3. अपनी कल्पना से एक कोलाज तैयार कीजिए। उत्तर— कोलाज बनाना सामग्री—गोंद, पौधों की सूखी पत्तियाँ, छोटी टहनियाँ व कुछ रंग व पेंसिल कलर या पेंसिल का कचरा। SUPW | 49 विधि—सर्वप्रथम कागज की शीट पर पौधे की सूखी टहनियों को एक पौधे के आकार में गोंद की सहायता से लगाते हैं। अब इन टहनियों के ऊपर गोंद की सहायता से पेंसिल का कचरा फूल के आकार में व पत्तियों को लगाते हैं। रंगों से इनकी आउट लाइन बना देते हैं। इस प्रकार कोलाज तैयार हो जाएगा। अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न 1. खिलौने बनाने में प्रयोग किया जा सकता है— (अ) प्लास्टर ऑफ पेरिस (ब) लाख (स) मोम (द) ये सभी 2. रंगोली बनाने में प्रयुक्त किया जा सकता है— (अ) लकड़ी का बुरादा (ब) गुलाल (स) मैदा (द) ये सभी 3. माँडणा बनाना है— (अ) एक प्रथा (ब) एक लोककला (स) एक निर्माण (द) इनमें से कोई नहीं उत्तर—1. (द), 2. (द), 3. (ब) अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. खिलौने बनाने में प्लास्टर ऑफ पेरिस का उपयोग क्यों किया जाता है ? उत्तर—प्लास्टर ऑफ पेरिस तुरंत सूख जाता है। प्रश्न 2. पुरानी चीजों का क्या उपयोग है ? उत्तर—पुरानी चीजों को सजाक सजावटी व उपयोगी वस्तुएँ बनायी जा सकती हैं। प्रश्न 3. रंगोली बनाने में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ? उत्तर—हल्के रंगों के समीप गहरे रंगों का उपयोग करना चाहिए। दो भिन्न-भिन्न गहरे रंगों का उपयोग पास- पास नहीं करना चाहिए। प्रश्न 4. रंग योजना को आकर्षक बनाने के लिए किस प्रकार के विरोधी रंग चुनने चाहिए ? उत्तर—लाल × हरा, बैंगनी × पीला, नारंगी × नीला, काला × सफेद आदि। लघूउत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. मोम से उपयोगी वस्तुएँ कैसे बनायी जाती हैं ? उत्तर—बाजार में उपलब्ध मोम को पिघलाकर एवं रंग मिलाकर आकर्षक मोमबत्तियाँ, दीपक एवं विभिन्न प्रकार के खिलौने बनाए जा सकते हैं। इसके लिए पिघले हुए गर्म मोम को आवश्यकतानुसार धातु के साँचो में डालकर ठण्डा होने दें। दीपक एवं मोमबत्ती के बीच में मोटा धागा पिरो दें। फिर हाथ से थपथपाकर साँचे से बाहर निकाल लें। प्रश्न 2. पुरानी वस्तुओं से पेन स्टैंड बनाने की विधि लिखिए। उत्तर—पेन स्टैंड बनाना—एक ही नाप के अनुपयोगी लाख या काँच के कड़े एक के ऊपर एक रखकर फेविकॉल से चिपकाइए। इससे एक बेलनाकार रचना बन जाएगी। एक सिरे पर मजबूत गत्ते को गोलाकार काट कर चिपका दीजिए। अब इसे ऑयल पेंट से रंग दीजिए या मोती, काँच, राखी के खिलौने आवश्यकतानुसार चिपका दीजिए। आकर्षक पेन स्टैण्ड तैयार है। इसका फूलदान की तरह भी उपयोग कर सकते हैं। प्रश्न 3. पुरानी वस्तुओं से राइटिंग पैड बनाने की विधि लिखिए। उत्तर—राइटिंग पैड बनाना—A-4 साइज के एक ओर लिखे कागजों को मोड़कर चार बराबर भागों में काट लेते हैं। घर में विवाह या अन्य अवसरों पर आये निमंत्रण कार्ड के मोटे कागज को उसी नाप का काटकर ऊपर नीचे लगाकर स्टेपल कर लीजिए अथवा सुई-धागे से सिल लीजिए। सिलाई पर आकर्षक रंगीन कागज या टेप लगा दीजिए। राइटिंग पैड तैयार है। इसका डायरी के रूप में भी उपयोग कर सकते हैं। प्रश्न 4. माँडणा क्या है ? समझाइए। उत्तर—माँडणा—मांडणे की लोक कला अति प्राचीन है। लिपे-पुते, अधसूखे आँगन पर गेरू एवं खड़िया से भाँति-भाँति के बनाए जाने वाले चित्र माँडणे कहलाते हैं। इनकी विशिष्ट डिजाइनें होती हैं। इन्हें बनाने के लिए गेरू एवं खड़िया को पानी में भिगोया जाता है। स्थान को साफ करके गेरू से पोत लिया जाता है। सूखने पर उस स्थान पर खड़िया से आकर्षक डिजाइन बना लेते हैं। विस्तृत उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. मिट्टी-कुट्टी से खिलौने बनाने की विधि लिखिए। उत्तर—मिट्टी-कुट्टी से खिलौने बनाना—सबसे पहले काली मिट्टी को भिगोया जाता है। दो दिन भीग जाने के पश्चात् इसको प्रयोग में लिया जाता है। एक सेब, केला 50 | रतन पास बुक, कक्षा—9 या कोई खिलौना लेकर प्लास्टर ऑफ पेरिस से खिलौने का साँचा बनाया जाता है। साँचा बनाने के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस को पानी में डालकर घोल बनाया जाता है। अब सेब, केला या खिलौने के ऊपर प्लास्टर ऑफ पेरिस का घोल लपेटा जाता है। सूखने के बाद सेब, केला या खिलौने को बाहर निकाल लिया जाता है। इस प्रकार साँचा तैयार हो जाता है। साँचे में मिट्टी को रखकर खिलौना बनाया जाता है। लाख के पानी में रंगकर उसे सेब या खिलौने का आकार दिया जाता है। अब इसे रंगों की सहायता से सजा देते हैं। प्रश्न 2. रंगोली बनाने की विधि लिखिए। उत्तर—रंगोली—एक विशिष्ट डिजाइन में विभिन्न रंगों का समायोजन करने को रंगोली कहते हैं। परंपरागत रंगोली सजाने के लिए चावल के पाउडर में पीला, नीला, लाल, हरा या अन्य रंग मिलाकर उपयोग करते हैं। आजकल गुलाल एवं रंगोली के विशिष्ट रंग, लकड़ी का बुरादा (रंगीन) आदि भी उपयोग किए जाते हैं। पोस्टर कलर एवं ऑयल पेंट से भी रंगोली बनायी जाती है। गुलाब, गेंदा, हजारा, गुलदाऊदी एवं अन्य फूलों की पत्तियाँ, हरे रंग के लिए अशोक या अन्य पत्तियाँ (बारीक काटकर) अथवा साबूत फूलों के संयोजन से भी रंगोली बनायी जा सकती है। रंगोली बनाने के लिए सबसे पहले चॉक से फर्श पर डिजाइन बना लेते हैं। किसी एक पदार्थ का चुनाव करके रंग योजना कर डिजाइन में रंग बुरकाते हैं ताकि रंग एक समान भर जाए। (ख) पाँच दिवसीय शिविर 10. शिविरायोजन-एक संदर्भ सारांश ● समाजोपयोगी उत्पादक कार्य एवं समाज सेवा विषय के अन्तर्गत कक्षा-कार्य से अधिक महत्वपूर्ण कार्य शिविर का आयोजन है। ● शिविर आयोजन का मुख्य उद्देश्य छात्रों को उनके कर्तव्यों का बोध कराना, श्रम की महत्ता को पहचानना, छात्रों में छिपी निर्माण शक्ति को उजागर करना, सांस्कृतिक रुचि का परिष्करण और नेतृत्व के गुणों का विकास करना है। ● शिविर स्थल का चुनाव पूरी सावधानी से करना चाहिए। स्थान सुरक्षित, बिजली, पानी, आवास, चिकित्सा आदि सुविधाओं से युक्त होना चाहिए। ● ऐसे शिविर आयोजनों की सूचना कम से कम पन्द्रह दिन पूर्व माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान अजमेर एवं संबंधि त जिला शिक्षा अधिकारी को आवश्यक रूप से भेज देनी चाहिए। ● शिविरार्थियों को शिविर के दिनों और सदस्यों की संख्या के आधार पर शिविर सामग्री, खाद्य वस्तुएँ, चिकित्सा सम्बन्धी सामग्री और इस तरह की अन्य अवश्यक सामग्री पहले से ही जुटा लेनी चाहिए। ● शिविर आयोजन को निश्चित लक्ष्यों की पूर्ति हेतु एक साधना के रूप में स्वीकारा गया है। इसके अन्तर्गत चार क्षेत्रों की स्थापना की गई है—(i) सामुदायिक सेवा कार्य करना, (ii) सर्वेक्षण एवं संकलन कार्य, (iii) राष्ट्रीय भावनात्मक एकता प्रायोजना कार्य तथा सांस्कृतिक एवं मनोरंजन कार्य। ● शिविर आयोजन की एक रूपरेखा पहले ही तैयार कर लेनी चाहिए। शिविर के विभिन्न कार्यक्रमों को तालिकाबद्ध करके सूचना पट पर अंकित कर देना चाहिए। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न 1. जहाँ तक सम्भव हो शिविरों का आयोजन करना चाहिए— (अ) विद्यालय परिसर में (ब) विद्यालय से दूर(स) जंगल में (द) पहाड़ों पर 2. शिविर आयोजन की सूचना देनी चाहिए— (अ) जिलाधिकारी को (ब) जिला शिक्षा अधिकारी को(स) नगर निगम अधिकारी को (द) इन सभी को 3. शिविर में सामूहिक रूप से रहना, अप्रत्यक्ष रूप से छात्रों में संप्रेषित करता है— (अ) पारिवारिक स्नेह (ब) अनुशासन(स) व्यवस्थित जीवन-यापन करने का भाव(द) ये सभी 4. शिविर आयोजन के क्षेत्रों की संख्या है— (अ) दो (ब) तीन (स) चार (द) पाँच 5. सामुदायिक सेवा क्षेत्र में शामिल है— (अ) पर्यावरण एवं प्रदूषण (ब) आलेख तैयार करना(स) महापुरुषों का जीवन-चरित्र (द) संकलन कार्य उत्तर—1. (ब), 2. (ब), 3. (द), 4. (स), 5. (अ)। अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. किस विषय के अन्तर्गत शिविर आयोजन को कक्षा कार्य से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है ? उत्तर—समाजोपयोगी उत्पादक कार्य एवं समाज सेवा विषय के अन्तर्गत शिविर आयोजन को कक्षा कार्य से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। प्रश्न 2. शिविर आयोजन की पूर्व सूचना किसे देना आवश्यक है ? SUPW | 51 उत्तर—माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान, अजमेर एवं सम्बन्धित जिला शिक्षा अधिकारी को। प्रश्न 3. सामुदायिक सेवा कार्य क्षेत्र में शिविरार्थियों के कोई दो कार्य लिखिए। उत्तर—सार्वजनिक स्थानों की सफाई एवं किसी सम्मेलन में जल-व्यवस्था करना। प्रश्न 4. सम्बन्धित राज्य की भौगोलिक स्थिति का अंकन, चित्रण एवं लेखन, शिविर आयोजन के किस क्षेत्र से सम्बन्धित है ? उत्तर—राष्ट्रीय भावनात्मक एकता प्रायोजना कार्य। प्रश्न 5. सांस्कृतिक एवं मनोरंजन कार्य के अन्तर्गत कुछ बिन्दु बताइए। उत्तर—नृत्य, एकांकी, कविता पाठ, लोकगीत, खेलकूद आदि। लघूउत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. किसी विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए शिविर आयोजन के उद्देश्य बताइए। उत्तर—छात्र को उसके कर्तव्यों का बोध कराने के साथ समाज के प्रति उसके अस्तित्व का ज्ञान कराने, उसे श्रम की महत्ता से परिचित कराते हुए उसमें छिपी असीम निर्माण-शक्ति से उसे स्वयं को अवगत कराना शिविर आयोजन का मुख्य उद्देश्य है। पारस्परिक सौहार्द, सद्भाव एवं राष्ट्रीय एकता के विचारों का अंकुरण भी शिविर-जीवन से होता है और सबसे बड़ी बात है कि शिविर आयोजन से स्वावलम्बन की भावना को बल मिलता है। ऐसे आयोजन से सांस्कृतिक रुचि का परिष्करण और नेतृत्व के गुणों का विकास होता है। प्रश्न 2. शिविर आयोजन के लिए स्थान का चयन कैसे किया जाना चाहिए ? उत्तर—शिविर आयोजन के लिए स्थान का चयन सावधानी पूर्वक करना चाहिए। पाँच दिवसीय शिविर आयोजन के लिए आवश्यक है कि स्थान सभी दृष्टि से सुरक्षित हो। वहाँ बिजली, पानी और आवास की सुविधा हो, चिकित्सा की सुविधा हो और आवासीय स्थल के निकट ही शिविर स्थल हो। आवागमन के साधनों की उपलब्धता हो यद्यपि शिविर का आयोजन अपने विद्यालय से दूर ही किया जाना चाहिए ताकि संभागियों को नयापन लगने के साथ उत्साह से शिविर कार्य करने की प्रेरणा मिल सके। कुछ स्थितियों में शिविर आयोजन विद्यालय प्रांगण, किसी धर्मशाला, पंचायत भवन, सामुदायिक केन्द्र आदि में भी आयोजित किए जा सकते हैं। प्रश्न 3. शिविर आयोजन के सामुदायिक सेवा कार्य क्षेत्र के विभिन्न बिन्दु बताइए। उत्तर—सामुदायिक सेवा कार्य के प्रमुख बिन्दु— (1) स्थानीय सन्दर्भ में सामाजिक चेतना एवं राष्ट्रीय चेतना कार्य जैसे—टीकों का ज्ञान, साक्षरता का प्रसार, अल्प बचत, स्वास्थ्य ज्ञान, पर्यावरण एवं प्रदूषण, सहकारिता और नामांकन आदि। (2) वृक्षारोपण एवं रोपित वृक्षों की सुरक्षा कार्य। (3) सार्वजनिक स्थानों की सफाई, पानी के गड्ढों में फिनाइल व कैरोसिन डालना। (4) शिविर स्थल की साफ-सफाई व सौंदर्यीकरण। (5) भोजन बनाना व परोसना। (6) वृद्धाश्रम, अनाथालय, दृश्यानुभूति व संवेदन हेतु भ्रमण व सेवा कार्य। (7) मेले, त्योहार, सम्मेलन में जल व्यवस्था आदि। प्रश्न 4. सर्वेक्षण एवं संकलन कार्य के बिन्दु लिखिए। उत्तर—सर्वेक्षण एवं संकलन कार्य के बिन्दु— (1) सर्वेक्षण एवं आलेख तैयार करना, सामाजिक कुटीर उद्योग, स्थानीय कृषि भूमि उपज, विभिन्न व्यवसाय, लोक कथा, लोकगीत, मुहावरे, लोकोक्तियाँ निरक्षरता। विद्यालय परित्याग करने वाले छात्र, टीकाकरण, खेलों में दक्ष व्यक्ति, शिक्षित बालिकाएँ, बेरोजगार व्यक्ति आदि। (2) संकलन कार्य एवं आलेख तैयार करना। (3) पर्यावरण अध्ययन (भौगोलिक, प्राकृतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक एवं प्रदूषण सम्बन्धी)। प्रश्न 5. शिविरायोजन के सांस्कृतिक एवं मनोरंजन संबंधी कार्य लिखिए। उत्तर—सांस्कृतिक एवं मनोरंजन सम्बन्धी कार्य— (1) सांस्कृतिक कार्यक्रम—नृत्य, सामूहिक गीत, एकांकी, एकाभिनय प्रदर्शन आदि। (2) साहित्यिक कार्यक्रम—कविता पाठ, वाद-विवाद, समस्यापूर्ति, लघुकथा, कथन चुटकुले आदि (3) कैम्प फायर—संवाद, लोकगीत, लोक भजन, नृत्य व अन्य कार्यक्रम। (4) योगाभ्यास, व्यायाम एवं रोचक खेल। विस्तृत उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. शिविरार्थियों के लिए व्यक्तिगत सामान की सूची बनाइए। उत्तर—शिविर के लिए आवश्यक सामग्री की सूची निम्न प्रकार है— (अ) छात्र वार खाद्य सामग्री— (1) आटा 500 ग्राम प्रतिदिन (2) दाल 50 ग्राम एक समय (3) घी प्रतिदिन 25 ग्राम (4) तेल प्रतिदिन 25 ग्राम (5) मिर्च, नमक, हल्दी, धनिया, लहसुन, प्याज, जीरा आदि मसाले आवश्यकतानुसार 52 | रतन पास बुक, कक्षा—9 (6) शक्कर 50 ग्राम प्रतिदिन व चाय पत्ती एक चम्मच प्रतिदिन (7) केरोसिन तेल - ईंधन, रोशनी आदि के लिए आवश्यकतानुसार (8) स्कूल यूनिफार्म एवं बदलने के लिए कपड़े, तौलिया, नहाने का सामान (9) मौसम के अनुसार बिस्तर (10) थाली, कटोरी, गिलास, लोटा, काँच, कंघी, तेल, सुई-धागा, बटन, नोट-बुक, पेन-पेंसिल, बैग आदि (11) माचिस, मोमबत्ती, टार्च (12) सर्वेक्षण व संकलन कार्य तथा चित्रकला हेतु आवश्यक प्रपत्र व सामग्री (ब) उप समूहवार सामग्री— (1) चकला, बेलन, तवा, परात, भगोना, चमचा, चम्मच, चीमटा, चाकू, ढक्कन। (2) दो बाल्टी, पानी छानने का कपड़ा, दो लालटेन, एक जाजम, पानी का रस्सा। (3) गैंती, फावड़ा, हँसिया, कसिया, तगारी, कुल्हाड़ी आदि सामुदायिक सेवा कार्य योजनानुसार। (4) सुतली, तम्बू आदि आवश्यक हो तो। (5) मनोरंजन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्बन्धी सामग्री। (स) शिविर के लिए सामग्री— (1) विद्यालय का ध्वज एवं 30 फीट सूत की डोरी, ध्वज स्तम्भ। (2) सीटी, पेट्रोमैक्स या बैट्री लाइट कम से कम दो या अधिक आवश्यकतानुसार, कम्पास तीन-चार। (3) केरोसीन का डिब्बा, कैंची। (4) रोलअप बोर्ड, चॉक, सफेद एवं रंगीन, स्टेशनरी, फाइलें। (5) फर्स्ट एड बॉक्स, कुछ पोस्टेज आदि, यदि आवश्यकता हो तो। (6) शिविर में आयोज्य विशेष क्रियाओं की सामग्री। (7) दो जाजम, एक रस्सा, दो बाल्टियाँ, दो लोटे। (8) कैमरा यदि हो। (9) स्टोव, भगोना, क्राकरी। (10) हारमोनियम, तबला आदि वाद्य यंत्र। (11) संदूक, चादरें, अगरबत्ती, माचिस। प्रश्न 2. राष्ट्रीय भावनात्मक एकता प्रयोजना कार्य का विवरण दीजिए। उत्तर—राष्ट्रीय भावनात्मक एकता प्रयोजना कार्य—इस क्षेत्र की प्रवृत्तियों का उद्देश्य छात्रों में राष्ट्रीय भावनात्मक एकता का विकास करना है, इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए प्रवृत्तियों की क्रियान्विति निम्नांकित दो पक्षों को आधार बनाकर की जा सकती है— (1) महापुरुषों के जीवन चरित्र से संबंधित प्रवृत्तियाँ— (i) शिविर में सम्भागी छात्रों के दल का नामांकन महापुरुषों के नाम पर करना। (ii) सम्बन्धित महापुरुषों के जीवन-चरित्र पर वार्ताएँ आयोजित करना। (iii) सम्बन्धित महापुरुषों के कथन, सूक्तियाँ, विचारों आदि का संकलन करना। (iv) सम्बन्धित महापुरुषों के जीवन वृत्त, उल्लेखनीय घटनाओं का लेखन एवं चित्रण तथा चित्र संग्रह करना। (v) संबंधित महापुरुषों के जीवनवृत्त की महत्वपूर्ण घटनाओं की झाँकी प्रस्तुत करना। (2) देश के विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक धरोहर से सम्बन्धित प्रवृत्तियाँ— (i) शिविर के संभागी छात्रों के प्रत्येक दल का स्वयं का एक राज्य विशेष से सम्बन्ध करना। (ii) सम्बन्धित राज्य की भौगोलिक स्थिति का अंकन, चित्रण एवं लेखन। (iii) संबंधित राज्य के विशिष्ट स्थानों से संबंधित आलेख तैयार करना। (iv) संबंधित राज्य के सांस्कृतिक रूपों की प्रस्तुतियाँ-वेशभूषा, अभिनय, गायन, झाँकी, नृत्य, संवाद-चित्रण, रीति-रिवाज आदि। प्रश्न 3. शिविर कार्यक्रम की रूपरेखा देते हुए प्रथम एवं द्वितीय दिवस का कार्यक्रम लिखिए। उत्तर—शिविर कार्यक्रम—शिविर को अन्तिम रूप बहुत पहले से दे देना चाहिए ताकि शिविर आरम्भ से ही व्यवस्थित एवं विधिवत रूप से संचालित हो तथा सम्पूर्ण समय का सदुपयोग हो सके। इस हेतु शिविर की वास्तविक तिथियों की घोषणा प्रार्थना सभा में करने के साथ सूचना पट्ट पर अंकित कर देनी चाहिए। पाँच दिवसीय शिविर-आयोजन सम्बन्धी सम्पूर्ण प्रक्रिया अच्छी तरह पूर्ण कर लेनी चाहिए ताकि छात्रों की पहुँच से लेकर वापस तक के उत्पाद, उपयोगी कार्य से जुड़े रहें। शिविर में आयोज्य चार परिक्षेत्रों की समस्त गतिविधियों को इस प्रकार समय विभाग चक्र में सम्मिलित किया जाना चाहिए कि संभागी समूचे समय अपने को किसी न किसी कार्य में व्यस्त पाएँ। प्रथम दिवस का दैनिक कार्यक्रम प्रातः 10.00 बजे से 12.00 बजे तक — विद्यालय परिसर में एकत्रित होना, शिविर सामग्री व्यवस्थित कर शिविर स्थल तक के जाने का दायित्व विभाजित करना। 12.00 बजे से 3.00 बजे तक — शिविर स्थल पर उप समूहवार आवास व्यवस्था। SUPW | 53 3.00 बजे से 5.00 बजे तक— प्रथम सम्मेलन, विद्यालय ध्वजारोहणएवं शिविर परिचय, आवश्यक निर्देश,सर्वेक्षण कार्य विभाजन। 5.00 बजे से 6.00 बजे तक— खेल-कूद। 6.00 बजे से 8.00 बजे तक— भोजन (साथ लाया हुआ)। रात्रि 8.00 बजे से 10.00 बजे तक— सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कार्य कीतैयारी। रात्रि 10.00 बजे— शयन द्वितीय दिवस का दैनिक कार्यक्रम प्रात: 4.30 बजे— जागरण। प्रात: 4.30 बजे से 6.00 बजे तक— नित्यकर्म। प्रात: 6.00 बजे से 6.30 बजे तक— प्रभातफेरी (ईश्वर भजन के साथ)। प्रात: 6.30 बजे से 7.30 बजे तक— सामूहिक व्यायाम (सूर्य नमस्कारआदि) प्राणायाम व योगा कार्यक्रम। प्रात: 7.30 बजे से 8.15 बजे तक— आवासस्थल की सफाई एवं सजावटतथा अल्पाहार। प्रात: 8.15 बजे से 8.45 बजे तक— शिविर निरीक्षण व मूल्यांकन। प्रात: 8.45 बजे से 9.30 बजे तक— प्रार्थना, ध्वजारोहण, आज का विचार,कार्यक्रम निर्देशन। प्रात: 9.30 बजे से 11.30 बजे तक— सर्वेक्षण कार्य संकलन (देशभक्तों कीजीवनी) सम्पर्क कार्य परिवेश एवंपर्यावरण अध्ययन (प्रभारी सुविधाजनककार्य विभाजन करें।) दोपहर 11.30 बजे से 1.30 बजे तक— भोजन व स्नान। 1.30 बजे से 2.15 बजे तक— विश्राम व संकलन (देशभक्तों कीजीवनी) सर्वेक्षण कार्य को लिखित रूपदेना एवं प्रभारी द्वारा मूल्यांकन। 3.00 बजे से 4.00 बजे तक— कौशल सम्बन्धी एवं ज्ञानात्मक कार्य। 4.00 बजे से 4.30 बजे तक— अल्पाहार। 4.30 बजे से 5.30 बजे तक— कौशल सम्बन्धी अभ्यास कार्य। 5.30 बजे से 6.30 बजे तक— खेलकूद। 6.30 बजे से 7.30 बजे तक— भोजन। 7.30 बजे से 8.00 बजे तक— सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी। 8.00 बजे से 10.00 बजे तक— सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रदर्शन। रात्रि 10.00 बजे— शयन नोट—आवास स्थल की स्वच्छता, जल व्यवस्था, भोजनबनाने का कार्य, अल्पाहार तैयार करना व उसका विस्तारकार्य उप समूहवार होगा जिसमें क्रमशः प्रत्येक छात्र संभागीबनेगा। प्रश्न 4. शिविर आयोजन के तृतीय, चतुर्थ एवं पंचमदिवस का दैनिक कार्यक्रम लिखिए। उत्तर—तृतीय एवं चतुर्थ दिवस का दैनिक कार्यक्रम—तृतीय और चतुर्थ दिन के लिये शिविर कार्यक्रम अवधि,द्वितीय दिन की भाँति प्रात: 4.00 बजे से रात्रि 10.00 बजेतक यथावत रहेगी। प्रतिदिन के आवश्यक कार्य यथावतसमयानुसार होंगे। प्रात: 9.30 बजे से 11.30 बजे तकदोपहर 2.00 बजे से 4.00 बजे तकतथा 4.30 बजे से 5.30 बजे तककी अवधि में प्रतिदिन कार्य में परिवर्तन होगा। इसमेंसामुदायिक सेवा कार्य तथा रास्तों व नालियों का सुधार,सड़क निर्माण कार्य, वृक्षारोपण, नवरोपित वृक्षों की सुरक्षाकार्य, सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन हेतु पोस्टर आदिका कार्य होगा। पंचम दिवस का दैनिक कार्यक्रम प्रात: 5.00 बजे— जागरण। प्रात: 5.00 बजे से 6.00 बजे तक— नित्यकर्म निवृत्ति। प्रात: 6.00 बजे से 6.30 बजे तक— देशभक्ति गीत व ईश्वर भक्ति भजन। प्रात: 6.30 बजे से 7.30 बजे तक— सूर्य नमस्कार (व्यायाम), प्राणायाम,योग-कार्यक्रम। प्रात: 7.30 बजे से 8.15 बजे तक— अल्पाहार, आवास स्थल की सफाई। 54 | रतन पास बुक, कक्षा—9 प्रात: 8.15 बजे से 8.45 बजे तक — शिविर निरीक्षण व मूल्यांकन। प्रात: 8.45 बजे से 9.30 बजे तक — प्रार्थना, ध्वजारोहण, निर्देश आदि। प्रात: 9.30 बजे से 10.30 बजे तक — कौशल सम्बन्धी कार्य। प्रात: 10.30 बजे 12.30 बजे तक — भोजन, डायरी लेखन। दोपहर 12.30 बजे से 1.30 बजे तक — समापन समारोह की तैयारी एवं प्रदर्शनी लगाना। 1.30 बजे से 3.00 बजे तक — समापन समारोह। 3.00 बजे से 4.00 बजे तक — प्रस्थान की तैयारी। सायं 4.00 बजे — प्रस्थान प्रश्न 5. शिविर आयोजन के कार्य विभाजन को समझाइए। उत्तर—(अ) छात्रवार कार्य विभाजन—शिविरार्थियों के प्रत्येक उपसमूह में कार्य विभाजन निम्नानुसार किया जाना चाहिए, जिसमें कि बारी-बारी से सभी सहभागी, सभी प्रकार के कार्य करने के अवसर प्राप्त कर सकें। इसके लिए उपसमूहों में छात्रों की संख्या के अनुसार क्रमांक निश्चित कर लेना चाहिए, ताकि समय विभाजन चक्र में नाम के स्थान पर क्रमांक अंकित किया जा सके। कार्य विभाजन, समय विभाग चक्र (10 छात्रों के उप समूह का) | दिन/कार्य | दोपहर का भोजन | सायं का भोजन | रसोई के बर्तनों की सफाई व्यवस्था दोपहर | जल सेवा जल कार्य सायं | सेवा | सफाई | |---|---|---|---|---|---|---| | पहला दिन | — | — | — | 9, 10 | 9, 10 | सभी | | दूसरा दिन | 1, 2 | 3, 4 | 3, 4 | 1, 2 | 5, 6 | 7, 8 | सभी | | तीसरा दिन | 5, 6 | 7, 8 | 7, 8 | 5, 6 | 1, 2 | 3, 4 | सभी | | चौथा दिन | 9, 10 | 1, 2 | 1, 2 | 9, 10 | 3, 4 | 5, 6 | सभी | | पाँचवा दिन | 3, 4 | — | 3, 4 | — | 7, 8 | 1, 2 | सभी | हस्ताक्षर समूह अधिकारी हस्ताक्षर उपसमूह नायक (ब) उपसमूह बार कार्य विभाजन—शिविर के कुछ सेवा कार्य जैसे फर्स्ट एड, डाक सेवा, विद्यालय के ध्वज को आरोहण के लिए तैयार करना, सूर्यास्त से पहले उसे उतारना, प्रार्थना स्थल की सफाई, मनोरंजनात्मक कार्यक्रम की व्यवस्था उप समूहवार करनी चाहिए। उप समूहवार कार्य विभाजन की सूचना प्रार्थना स्थल के सूचना पट्ट पर लगा देनी चाहिए। इसके लिए उप समूहों को संकेताक्षर आवंटित कर कार्य विभाजन करते हुए समय विभाग चक्र में अंकित कर देना चाहिए। कार्य वितरण का समय, विभाग चक्र निम्नानुसार हो सकता है— सेवा कार्यों का उप समूहवार विभाजन चक्र (छ: उप समूह का) | दिन/कार्य | डाक सेवा | फर्स्ट एड | ध्वज सेवा | प्रार्थना स्थल की सफाई | मनोरंजन कार्यक्रम व्यवस्था | जल सेवा | |---|---|---|---|---|---|---| | प्रथम सत्र | द्वितीय सत्र | | पहला दिन | A | B | C | D | E | — | F | | दूसरा दिन | F | A | B | C | D | E | E | | तीसरा दिन | E | F | A | B | C | D | D | | चौथा दिन | D | E | F | A | B+F | C | C | | पाँचवा दिन | B+C | C+D | D+E | F | A+E | A | B | हस्ताक्षर समूह अधिकारी हस्ताक्षर उपसमूह नायक 11. (ग) योगाभ्यास सारांश ● शिविरार्थियों को शिविर के कार्यक्रमानुसार योग के सम्बन्ध में जानकारी, जैसे—योग के नियम, विधि तथा उससे मिलने वाले शारीरिक एवं मानसिक लाभ से अवगत कराया जाना चाहिए।● योग एक गूढ़, अत्यंत उपयोगी एवं व्यवहारिक विषय है। यह रूपान्तरण का विज्ञान है। योग मात्र ऋषि- मुनियों और विचारशील-विवेकवान लोगों के लिए ही नहीं बल्कि प्रत्येक व्यक्ति, किसान, मजदूर, व्यापारी, नौकरीपेशा, गृहस्थ एवं सन्यासी से लेकर विद्यार्थी आदि सभी के लिए ऋषियों की उत्कृष्ट देन है।● आधुनिक काल के योग आचार्य के रूप में स्वामी दयानन्द का नाम सर्वप्रथम उल्लेखनीय है जिन्होंने अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदिभाय भूमिका, आर्याभिविनय व संस्कार विधि आदि के माध्यम से योग के सिद्धान्त व साधना से सम्बद्ध भ्रान्त धारणाओं का खण्डन करते हुए योग के वास्तविक पुरातन आर्ष स्वरूप का निर्देशन कराया।● आसनोपयोगी कुछ नियम भी हैं; जैसे—आसनों के लिए नित्य कर्मों से निवृत्त होकर प्रातः काल का समय सर्वोत्तम है, आसनों का पूर्ण अभ्यास क्रम 45 मिनट का है; सभी शुद्धि क्रियाएँ प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ही करना प्रशस्त हैं, आदि।● स्वच्छ खुला हुआ एवं एकान्त स्थान आसनों के लिए अच्छा रहता है।● आसन करते समय शरीर पर कम से कम वस्त्र होने चाहिए।● शरीर को स्वस्थ रखने तथा सुचारु क्रियाविधियों के लिए सात्विक भोजन करना अनिवार्य है।● शीत ऋतु में स्नान के पश्चात् आसन करने प्रशस्त हैं। वैसे सभी ऋतुओं में स्नान के पश्चात् आसन किए जा सकते हैं।● दुर्बल व्यक्ति एवं 6-10 वर्ष की आयु के बच्चों को संक्षिप्त अभ्यास क्रम को आसन प्राणायाम उचित है।● स्त्रियों के लिए ऋतुकाल एवं गर्भावस्था में आसन वर्जित है।● रुग्णवस्था में लाभप्रद मुद्रा एवं क्रियाएँ विशेषज्ञ की उपस्थिति में करनी चाहिए।● शीर्षासन से मस्तिष्क का विकास होता है, रक्त संचार व पाचन तंत्र ठीक रहता है।● सर्वांगासन से रक्त की शुद्धि होती है, नेत्रों की ज्योति बढ़ती है तथा वात रोग दूर होते हैं। ● मत्स्यासन से श्वास संबंधी तथा पाचन संबंधी रोग दूर होते हैं।● प्राणायाम दो शब्दों से मिलकर बना है—प्राण और आयाम। इसका शाब्दिक अर्थ है श्वास-प्रश्वास की क्रिया पर नियंत्रण करना। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. योग एक विज्ञान है— (अ) अवतरण का (ब) रूपान्तरण का(स) चमत्कार का (द) अध्यात्म का 2. किसके अनुसार समत्व ही योग है— (अ) योगेश्वर श्रीकृष्ण (ब) स्वामी विवेकानन्द(स) दयानन्द सरस्वती (द) नागार्जुन 3. सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ की रचना की गई— (अ) स्वामी विवेकानन्द द्वारा(ब) स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा(स) योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा(द) इनमें से कोई नहीं 4. साहित्य में योग के स्थान पर किन शब्दों का प्रयोग मिलता है ? (अ) मनन एवं चिंतन (ब) रोग एवं निरोग(स) ध्यान और समाधि (द) आसन और त्याग 5. बौद्ध योग में योग का अर्थ है— (अ) ध्यान (ब) अर्थ (स) मन (द) समाधि 6. शरीर का आधार भूत उपस्तम्भ है— (अ) आहार (ब) निद्रा (स) ब्रह्मचर्य (द) ये सभी 7. प्राणायाम का अर्थ है— (अ) प्राणों की सुरक्षा (ब) जीवनी-शक्ति का नियमन(स) प्राण भरना (द) प्राण प्राप्ति 8. प्राणायाम का आवश्यक अंग है— (अ) निद्रा (ब) शरीर की सुन्दरता(स) मन की एकाग्रता (द) ये सभी उत्तर—1. (ब), 2. (अ), 3. (ब), 4. (स), 5. (द), 6. (द), 7. (ब), 8. (स) अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. योग किसे कहते हैं ? उत्तर—अशान्त व अव्यवस्थित मन जब सुव्यवस्थित होकर शान्त, एकरस, सन्तुलित व समस्थिति को प्राप्त होता है, तो इस स्थिति को योग कहते हैं। प्रश्न 2. बौद्ध योग परम्परा में ध्यान की प्रक्रिया को क्या कहा जाता है ? उत्तर—बौद्ध योग परम्परा में ध्यान की प्रक्रिया को समाधि कहा जाता है। 56 | रतन पास बुक, कक्षा 9 प्रश्न 3. दिन चढ़ने के साथ योगाभ्यास क्यों नहीं करना चाहिए ? उत्तर—दिन चढ़ने के साथ-साथ आमाशय में अम्लता बढ़ जाती है जिसके कारण वमन दण्ड वस्त्रधौति करने से मुख में खट्टापन, जी मिचलाना इत्यादि उपद्रव हो सकते हैं। प्रश्न 4. आसन के लिए कैसा स्थान अच्छा रहता है ? उत्तर—स्वच्छ, खुला हुआ एवं एकान्त स्थान आसनों के लिए अच्छा रहता है। प्रश्न 5. शीर्षासन के दो लाभ लिखिए। उत्तर—(i) रक्त संचार ठीक से होता है। (ii) हृदय मजबूत होता है। प्रश्न 6. सर्वांगासन के दो लाभ लिखिए। उत्तर—(i) नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। (ii) वात रोग दूर होते हैं। प्रश्न 7. धनुरासन का क्या अर्थ है ? उत्तर—धनुरासन करने का अर्थ है, आसन करते हुए शरीर को धनुष की तरह बना लेना या कमान की तरह तान लेना। प्रश्न 8. कपालभाति में केवल किस पर पूरा ध्यान दिया जाता है ? उत्तर—कपालभाति में मात्र श्वास छोड़ने (रेचक) पर ही पूरा ध्यान दिया जाता है। लघूत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. आसन के लिए स्थान कैसा होना चाहिए ? विवेचना कीजिए। उत्तर—स्वच्छ खुला हुआ एवं एकान्त स्थान आसनों के लिए अच्छा होता है। नदी, तालाब का किनारा या बाग बगीचे का स्थान भी उपयुक्त रहता है। उसके आस-पास सुगन्धित फूलों के पौधे लगाने चाहिए। यदि मकान या कोठरी में ही अभ्यास करना पड़े तो ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ हवा का संचार अच्छा हो। आसन या साधन करने से पूर्व धूप/अगर बत्ती से उसे सुगन्धित करना चाहिए। प्रश्न 2. आसन करने के लिए किस प्रकार के वस्त्र धारण करने चाहिए ? उत्तर—आसन करते समय शरीर पर कम से कम वस्त्र धारण करने चाहिए। ग्रीष्म-ऋतु में लँगोट या जाँघिया ही पर्याप्त है। शीत ऋतु में लँगोट के ऊपर हाफ कच्छ, पैंट और बनियान उपयोगी रहेगा। स्त्रियों के लिए जाँघिया, सलवार, ब्लाउज, स्लैक्स उपयुक्त हैं। देशकाल के अनुसार वेषभूषा में परिवर्तन भी किया जा सकता है। प्रश्न 3. आसन में स्नान का महत्व समझाइए। उत्तर—(i) शीत ऋतु में स्नान के पश्चात् आसन करना प्रशस्त है। यद्यपि सभी ऋतुओं में स्नान के पश्चात् आसन किए जा सकते हैं। स्नान से रक्त संचार के कारण मांस पेशियाँ सक्रिय एवं मन शान्त हो जाता है। (ii) अभ्यास के पश्चात् श्वास-प्रश्वास सामान्य तथा पसीना सूख जाने पर ही स्नान करना चाहिए। आसनों के पश्चात् और स्नान से पूर्व पेशाब करने से अनावश्यक गर्मी निकल जाती है। सभी ऋतुओं में ताजा जल ठीक रहता है। गर्म जल से स्नान करते समय सिर को बचाना चाहिए। प्रश्न 4. विभिन्न आयु वर्गों में आसन किस प्रकार के होने चाहिए ? उत्तर—(i) दुर्बल व्यक्ति एवं 6-10 वर्ष की आयु के बच्चों को संक्षिप्त अभ्यास क्रम में कहे आसन-प्राणायाम उचित हैं। 13-14 वर्ष के बच्चे पूर्ण अभ्यास क्रम को कर सकते हैं। यद्यपि मुद्रा एवं बन्धों का कठिन अभ्यास वर्जित है। लड़कियाँ भी इसी प्रकार सभी आसनों का अभ्यास कर सकती हैं। (ii) स्त्रियों के लिए ऋतुकाल एवं गर्भावस्था में आसन वर्जित है। गर्भावस्था में 2-3 मास तक सरल आसन किए जा सकते हैं। (iii) वृद्ध व्यक्ति भी पहले सरल अभ्यास क्रम में दक्षता प्राप्त करके पुनः जटिल आसनों का क्रम से अभ्यास प्रारम्भ करें। प्रश्न 5. विभिन्न प्रकार के आसनों के लिए पूर्ण अभ्यास क्रम का समय बताइए। उत्तर—अभ्यास क्रम - पूर्ण अभ्यास क्रम | आसन | समय | |---|---| | शीर्षासन | — | | श्वासन | — | | सर्वांगासन | — | | मत्स्यासन | — | | हलासन | — | | भुजंगासन | — | | शलभासन | — | | धनुरासन | — | अर्थ मत्स्येन्द्रासन (दोनों ओर से) | | — | 2 मिनट | |---|---|---| | सुप्तवज्रासन | — | 2 मिनट | | मयूरासन | — | 1 मिनट | | चक्रासन | — | 2 मिनट | | योगमुद्रासन | — | 2 मिनट | | श्वासन | — | 2 मिनट | प्रश्न 6. विभिन्न प्राणायामों के लिए पूर्ण अभ्यास क्रम का समय लिखिए। उत्तर— प्राणायाम भस्त्रिका प्राणायाम समय 5 मिनट SUPW | 57 | कपालभाति प्राणायाम | — | 15 मिनट | |---|---|---| | बाह्य प्राणायाम | — | 2 मिनट | | उज्जायी प्राणायाम | — | 2 मिनट | | अनुलोम-विलोम प्राणायाम | — | 10 मिनट | | भ्रामरी प्राणायाम | — | 2 मिनट | | उद्वीथ प्राणायाम | — | 5 मिनट | | प्रणव प्राणायाम | — | 1 मिनट | प्रश्न 7. प्राणायाम से आप क्या समझते हैं ? समझाइए। उत्तर—प्राणायाम दो शब्दों से मिलकर बना है—प्राण और आयाम। प्राण से तात्पर्य शरीर में संचरित होने वाली वायु (जीवनी-शक्ति) से तथा आयाम से तात्पर्य नियमन से है। अतः प्राणायाम का अर्थ श्वास-प्रश्वास की क्रिया पर नियंत्रण करना है। इसका अभ्यास करने से सम्पूर्ण शरीर स्वस्थ रहता है। प्राण—हमारे शरीर में जो भी गति या चेष्टा होती है वह प्राण द्वारा संचालित होती है। यह प्राण सम्पूर्ण शरीर में फैला हुआ है। इसकी तुलना विद्युत शक्ति (energy) से की जा सकती है। यह शक्ति हमें वायु द्वारा प्राप्त होती है। परन्तु ऑक्सीजन को ही प्राण नहीं कह सकते। यह भोजन एवं पेय पदार्थों में है किन्तु विटामिन, प्रोटीन या अन्य तत्वों का नाम प्राण नहीं है। सूर्य के प्रकाश द्वारा प्राप्त जीवन शक्ति को भी प्राण मानना असंगत है। वायु, भोजन, पेय व सूर्य का प्रकाश माध्यम है जिनके द्वारा हमें प्राणशक्ति प्राप्त होती है। यहाँ प्राणायाम से अभिप्राय श्वासन कार्य में प्रयुक्त प्राण का नियंत्रण करना है। प्रश्न 8. उज्जायी प्राणायाम की विधि लिखिए। उत्तर—उज्जायी प्राणायाम—ध्यान आसन में बैठकर दोनों नासापुटों से साँस लेते हुए गले को सिकोड़ते हैं और जब गले को सिकोड़कर श्वास अन्दर भरते हैं, तब जैसे खरीटे लेते समय गले से आवाज होती हैं, वैसे ही सांस लेते हुए कंण्ठ से ध्वनि होती है। हवा का घर्षण नाक में नहीं होना चाहिए। इस प्राणायाम में सदैव दायीं नासापुट को बंद करके बायीं नासापुट से ही रेचक करना चाहिए। प्रारम्भ में कुम्भक (श्वास को रोकना) का प्रयोग न करके केवल पूरक रेचक का ही अभ्यास करना चाहिए। धीरे-धीरे कुम्भक का समय पूरक जितना तथा कुछ दिनों के अभ्यास के बाद कुम्भक का समय पूरक से दो गुना कर दीजिए। कुम्भक 10 सेकण्ड से ज्यादा करना हो तो जालन्धर बन्ध और मूलबन्ध भी लगाएँ। नोट—प्राणायाम से सम्बद्ध सामान्य सावधानियों का अवश्य ध्यान रखें। प्रश्न 9. उज्जायी प्राणायाम के लाभ लिखिए। उत्तर—उज्जायी प्राणायाम के लाभ— (1) थायरॉइड स्नोरिंग (सोते समय खरीटे की आवाज) में लाभ होता है। (2) टॉन्सिल ठीक होते हैं। (3) स्लीप एजिया से राहत मिलती है। (4) फुफ्फुस एवं कण्ठ विकार दूर होते हैं। (5) अजीर्णता दूर होती है। (6) आमवात में लाभ होता है। (7) जलोदर आदि रोगों में बड़ा कारगर है। (8) आवाज को मधुर बनाता है। (9) बच्चों का हकलाना, तुतलाना भी ठीक होता है। प्रश्न 10. उद्वीथ प्राणायाम की विधि व लाभ लिखिए। उत्तर—उद्वीथ प्राणायाम— विधि—3 से 5 सेकण्ड में श्वास को एक लय के साथ अन्दर भरना एवं पवित्र 'ओउम' शब्द का विधिवत उच्चारण करते हुए लगभग 15 – 20 सेकण्ड में श्वास को बाहर छोड़ना, एक बार उच्चारण पूरा होने पर पुनः इसी प्रकार से अभ्यास करना चाहिए। 3 मिनट की आवृत्ति में लगभग 7 बार इस प्राणायाम का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। लाभ—उद्वीथ प्राणायाम के अभ्यास से नाड़ियों की स्पंदन गति (Pulse rate), श्वास-प्रश्वास गति (Breath rate), अम्लजन की खपत तथा निरन्तर उत्पन्न हुए पसीने में कमी आती है। इससे समस्त असाध्य रोगों में निरन्तर अभ्यास से लाभ होता है। प्रश्न 11. प्रणव-प्राणायाम या ध्यान योग की विधि एवं लाभ लिखिए। उत्तर—प्रणव-प्राणायाम या ध्यान योग— विधि—पूर्व निर्दिष्ट सभी प्राणायामों को करने के पश्चात् श्वास-प्रश्वास पर अपने मन को एकाग्र करके प्राण के साथ उद्वीथ 'ओउम' का ध्यान करें। लाभ—सोते समय भी इस प्रकार ध्यान करते हुए सोना चाहिए, ऐसा करने से निद्रा योगमयी हो जाती है, दुःस्वपन से भी छुटकारा मिलेगा तथा निद्रा शीघ्र आयेगी एवं प्रगाढ़ होगी। विस्तृत उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. योग से आप क्या समझते हैं ? समझाइए। उत्तर—योग (YOGA)—योग विश्व के मानवों के लिए भारत की महानतम उद्भावना और उद्घोषणा है। सफल व्यक्ति और सभ्य समाज को 'योग' से विशिष्ट कोई अन्य संकल्पना अद्यावधि तो अप्राप्त ही है। परिवार, जाति, समुदाय, क्षेत्र, देश, भाषा, धर्म आदि में सम्पूर्णता खोज रहे व्यक्ति की प्रवृत्तियाँ अन्ततः दूसरों के लिए अराजकता ही उत्पन्न करती हैं। योग एक गूढ़, अत्यंत उपयोगी एवं व्यवहारिक विषय है। यह रूपान्तरण का विज्ञान है। योग मात्र ऋषि-मुनियों और विचारशील-विवेकवान लोगों के लिए ही नहीं बल्कि प्रत्येक व्यक्ति-किसान, मजदूर, नौकरी पेशा, व्यापारी, गृहस्थ, 58 | रतन पास बुक, कक्षा 9 संन्यासी, विद्यार्थी आदि सभी के लिए ऋषियों की उत्कृष्ट देन है। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार समत्व ही योग है। अशान्त एवं अनवस्थित मन जब सुव्यवस्थित होकर एकरस, संतुलित व समस्थिति को प्राप्त होता है, तो उसे योग कहते हैं। आधुनिक काल के योग के आचार्य के रूप में स्वामी दयानन्द सरस्वती (सन् 1824-1883) का नाम सर्वप्रथम उल्लेखनीय है। इन्होंने अपने ग्रन्थों, सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदिभास्य भूमिका, आर्याभिविनय व संस्कार विधि आदि के माध्यम से योग के सिद्धान्त व साधना से सम्बद्ध भ्रान्त धारणाओं का खण्डन करते हुए योग के वास्तविक पुरातन आर्ष स्वरूप का निर्देशन कराया। साहित्य में योग के स्थान पर ध्यान और समाधि शब्दों के प्रयोग मिलते हैं; बौद्ध योग परम्परा में ध्यान की प्रक्रिया को समाधि कहा जाता है। अतः योग में योग का अर्थ समाधि है। प्रश्न 2. योगासन नियमों के अनुसार आहार ग्रहण किस प्रकार का होना चाहिए ? उत्तर—योगासन नियम के अनुसार आहार ग्रहण— (i) शरीर के आधारभूत उपस्तम्भों (आहार, निन्द्रा, ब्रह्मचर्य) में प्रथम स्थान आहार का है। हम जो भी खाते-पीते हैं। उससे ही शरीर, मन, बुद्धि का निर्माण होता है। शरीर की प्रवृत्ति के अनुकूल ऋतु के अनुसार तथा परमिति भोजन करने वाला व्यक्ति ही स्वस्थ रह सकता है। गीता में भोजन के तीन भेद सात्विक, राजसिक और तामसिद कहे गए हैं। हठ प्रदीयिका में योगाभ्यासी के लिए पुष्टिकारक, मधुरगुण युक्त, स्निग्ध, घृतदुग्ध, गोधातुपोषक और रुचिकारक भोजन करने का विधान किया गया है। (ii) भोजन आसनों के 3-4 घंटे पूर्व एवं आधा-पौन घंटे के पश्चात् करना उचित है। 1 कप पेय लेने के पश्चात् भी आधा घंटा पश्चात् आसन प्रारम्भ करने चाहिए। (iii) योगसाधक को अधिक प्रोटीन युक्त भोजन, अधिक दाल, अण्डा, इत्यादि अपथ्य है। इनसे यूरिक अम्ल की उत्पत्ति होती है। प्रश्न 3. रुग्णकाल में आसन नियम समझाइए। उत्तर—रुग्णकाल में आसन नियम— (1) विविध रोगों में लाभप्रद मुद्रा एवं क्रियाएँ विशेषज्ञ की उपस्थिति में करनी चाहिए। किसी रोग में वर्णित आसनों को सामान्य से अधिक समय देना चाहिए। (2) जिन व्यक्तियों का रक्त चाप 150 MM से अधिक और 100 MM से अल्प रहता है, उन्हें आसन बिना मार्गदर्शन के नहीं करने चाहिए। उच्च रक्त चाप रोगी केवल शवासन और अल्प रक्त-चाप के रोगी कपालभाति, भस्त्रिका आदि कर अभ्यास करें। (3) जिनके कान बहते हो, नेत्रों में लाली या उनके स्नायु दुर्बल हो तथा दुर्बल हृदय वाले व्यक्तियों को शीर्षासन नहीं करना चाहिए। अधिक तिल्ली बढ़ी हो तो भुजंगासन, शलभासन और धनुरासन निषिद्ध है। हृदय दौर्बल्य में उड्डीयान और मौली करके केवल पूरक और रेचक करना ही प्रशस्त है। (4) यौगिक अभ्यास के पश्चात् थकावट न आकर स्फूर्ति, उत्साह, अंगलाघव होना चाहिए। यदि श्रान्ति हो तो मध्य-मध्य में शवासन या मकरासन में विश्राम लेना उचित है। प्रश्न 4. शीर्षासन की विधि व लाभ लिखिए। उत्तर—शीर्षासन (Shirshasan)— विधि—(1) किसी कम्बल की मोती तह करके जमीन पर रखिए या कपड़े की गोलाकार गद्दी बनाकर दोनों हाथों की उंगलियाँ परस्पर क्रास करके कुहनियाँ 60° के अन्तर पर रखिए। घुटने जमीन पर टिके हुए रहें। धीरे-धीरे घुटनों को छाती की ओर लाइए तथा शरीर को संतुलित रखते हुए धीरे-धीरे पाँवों को ऊपर उठाते जायें। (2) दूसरी स्थिति में घुटनों को सीधा करने का अभ्यास करना चाहिए। दीवार के सहारे शरीर को टिकाते हुए इस आसन का अभ्यास करने से शरीर संतुलित रहता है। (3) तीसरी स्थिति में अपनी पाँवों बिल्कुल सीधा रखा जाता है। आपका शरीर बिल्कुल सीधा रहना चाहिए ताकि टांगों पर किसी प्रकार का तनाव न रहे। कुछ मिनट इसी स्थिति में रहने का अभ्यास करना चाहिए। इसके पश्चात् प्रथम, द्वितीय व तृतीय चरणों का ध्यान में रखते हुए शरीर को नीचे लाना चाहिए। झटके के साथ कभी-कभी शरीर को नीचे लाना चाहिए। शरीर को पुनः पीछे के बल लिटाकर कुछ क्षण शवासन करिए। लाभ—शीर्षासन के द्वारा शरीर के सभी अंग प्रभावित होते हैं। (1) मस्तिष्क का विकास होता है। (2) रक्त संचार ठीक रहता है। (3) शीघ्र बुढ़ापा नहीं आता है। (4) हृदय मजबूत होता है। SUPW | 59 (5) उत्सर्जन प्रक्रिया स्वस्थ बनती है।(6) बवासीर रोग दूर होता है।(7) पाचन संस्थान दुरुस्त होता है। प्रश्न 5. सर्वांगासन की विधि तथा लाभ लिखिए। उत्तर— सर्वांगासन (Sarvangasan) विधि—इस आसन को करने के लिए पहले शवासन की स्थिति में पीठ के बल लेटा जाता है। तत्पश्चात् हाथों को कमर से टिकाते हुए धड़ और नीचे के हिस्से को सिर के मुकावले 90° के कोण पर उठाया जाता है। कोहनी को जमीन से टिकाते हुए हाथों से (शरीर के संतुलन के लिए) शरीर को सहारा दिया जाता है। ऐसी स्थिति में कंधे से लेकर पाँवों की अंगुलियों तक सारा शरीर एक सीध में रखा जाता है। इस आसन को करते समय ध्यान रखना चाहिए कि न तो टांगों को झटके से साथ ऊपर ले जाएँ और ना ही झटके के साथ नीचे लाएँ। सबसे अच्छा तो यह रहता है कि पहले पीठ को जमीन से लिटाते हुए टांगों को ऊपर की ओर समकोण बनाते हुए उठाएँ। इसके बाद ही हाथों को कमर पर लगाकर धीरे-धीरे कमर को टांगों की सीध में लाने का प्रयास करें। टांगों को धीरे-धीरे नीचे लाने का प्रयास करना चाहिए। लाभ— (1) रक्त की शुद्धि होती है।(2) मस्तिष्क की शक्तियाँ विकसित होती हैं।(3) पाचन तंत्र में सुधार होता है।(4) टॉसिल तथा गले के रोग दूर होते हैं।(5) सिर का दर्द दूर होता है।(6) वात रोग दूर होते हैं।(7) नेत्रों की ज्योति बढ़ती है।(8) रक्त का प्रवाह मस्तिष्क की ओर होता है, जिससे शिराएँ मजबूत होती हैं। प्रश्न 6. मत्स्यासन की विधि एवं लाभ लिखिए। उत्तर— मत्स्यासन (Matsayasan) विधि : 1. सर्वप्रथम दोनों पैर लंबे करके बैठिए। दोनों हाथों को कमर के साथ भूमि पर टिकाकर रखिए। इसे लम्बी स्थिति या दण्डासन कहते हैं। 2. दाहिने पैर को बायीं जांघ पर और बाएं पैर को दाहिनी जांघ पर रखिए। यह यह पद्यासन जैसी स्थिति बन जाएगी।3. दोनों हाथों से सहारा लेते हुए पीछे की ओर लेट जाइए। ग्रीवा को जितना पीछे मोड़ सकें, मोड़िए। पीठ व छाती ऊपर को उठकर कमान (Arch) जैसी आकृति बन जाएगी। घुटने भूमि पर टिके रहेंगे। 4. हाथों से पैरों के अंगूठे पकड़कर कुहनियाँ भूमि पर टिकाइए। 5. आसन छोड़ने के लिए ग्रीवा, कमर भूमि पर टिकाते हुए पैरों को सीधा करें तथा शवासन की स्थिति में आइए। लाभ— (1) शवास संबंधी रोग दूर होते हैं।(2) गर्दन, चेहरा, फेफड़े तथा हृदय की कमजोरी दूर होती है।(3) नाभि टलना दूर होता है।(4) उदर, कमर की पेशियों की जकड़न ठीक होती है।(5) पाचन संबंधी रोग दूर होते हैं।(6) रीढ़ की हड्डी का दर्द दूर होता है। प्रश्न 7. हलासन की विधि एवं लाभ लिखिए। उत्तर— हलासन (Halasan) विधि—(1) पीठ के बल लेटकर सर्वांगासन की भांति टांगों को क्रमशः 30° – 60° – 90° तक उठाइए। इसे अर्द्ध हलासन कहा जाता है। (2) हाथों से भूमि पर दबाव देते हुए और पीठ को भूमि पर टिकाते हुए पैरों को सिर की ओर पीछे ले जाइए। जहाँ तक कि ये पैरों के पंजे पीछे भूमि पर टिक जाएँ और घुटने सीधे रहकर सिर के ऊपर रहे। केवल पृष्ठ का पिछला भाग (lumbo-sacral region) ही मुड़ा हुआ रहेगा। इसका अभ्यास प्रारम्भ में कठिन होता है। (3) दूसरी स्थिति में कुछ समय रुककर धीरे-धीरे पैरों के अंगूठे पीछे की ओर बढ़ाए, इस अवस्था में पीठ क्रमशः मुड़ती जाएगी। दबाव केन्द्र मेरुदण्ड के ऊपरी भाग के निचले क्षेत्र में रहेगा। (4) अब पैरों को जितना हो सके पीछे कीजिए। दबाव केन्द्र कंधों के पास (Upper Dorsal Region) में रहेगा। (5) दोनों हाथों को बाँधकर सिर के पीछे रखें और पैरों के 60 | रतन पास बुक, कक्षा 9 अंगूठों को पीछे धकेलिए। हाथ पृष्ठ के पीछे या सिर की ओर सीधे भी किये जा सकते हैं। ठुड़ी छाती से लगी हुई और पीठ समकोण तक ऊपर उठी हुई रहेगी। दबाव केन्द्र मेरुदण्ड के ग्रीवा प्रदेश पर रहेगा। (6) जैसे आये थे वैसे ही पहले हाथों को पीछे टिकाकर भूमि पर दबाव बनाइए और पहले पीठ को भूमि पर क्रमशः टिकाकर पैरों को समकोण की स्थिति में ले आइए। कुछ समय विश्राम करके 60-30 अंश पर पैर लाते हुए शवासन की स्थिति में आ जाइए। लाभ—(1) हलासन से मेरुदण्ड लचीला बनता है। (2) इससे पाचन संस्थान से भी अवयवों का व्यायाम होता है। अतः इससे पाचन प्रक्रिया दुरुस्त होती है। (3) इससे थॉइराइड में लाभ मिलता है। (4) तंत्रिका तंत्र दुरुस्त रहता है। (5) पेट व कमर की चर्बी कम होती है। (6) शरीर संतुलन की स्थिति में आता है। (7) भूख बढ़ती है। (8) रक्त संचार तेज होता है। प्रश्न 8. भुजंगासन की विधि एवं लाभ लिखिए। उत्तर— भुजंगासन (Bhujangasan) विधि : (1) पेट के बल आसन पर लेट जाइए। सिर का अलग भाग भूमि पर टिका हुआ रहेगा। पैरों के पंजे लम्बे होकर भूमि में टिकने चाहिए। एड़ियाँ और घुटने भी मिले हुए रहने चाहिए। दोनों हाथों की कुहनियाँ मुड़ी हुई ऊपर की ओर तथा उँगलियाँ कंधों के नीचे रखकर दोनों भुजाएँ कमर से लगी हुई रहनी चाहिए। (2) हड़ी को धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाते हुए गर्दन को जितना हो सके पीछे की ओर मोड़िए। इसी प्रकार छाती और पेट को इस प्रकार उठाइए कि मेरुदण्ड का प्रत्येक कशेरु क्रमशः मुड़ता जाय। पेट नाभि तक ऊपर उठेगा और नाभि से निचला भाग भूमि पर टिका हुआ रहेगा। अभ्यास हो जाने पर हाथों को भी ऊपर उठाइए या नाममात्र का सहारा लीजिए। (3) 10-15 सेकण्ड पश्चात् जैसे आए थे, वैसे ही, पेट, छाती, गर्दन सीधी करते हुए ठुड़ी को भूमि पर टिकाकर मकरासन में विश्राम कीजिए। यह अभ्यास 3-4 बार किया जा सकता है। प्रारम्भ में जैसे शवास चलता है चलने दीजिए। अभ्यास हो जाने पर सांस को रोककर करना उत्तम है। लाभ—(1) भुजंगासन से गुर्दों में विशेष रूप से लाभ होता है। (2) गर्दन तथा कंधे की हड़ियाँ मजबूत होती हैं। (3) गर्दन में लचक पैदा होती है। (4) मेरुदण्ड की अस्थियाँ मजबूत होती हैं। (5) यह आसन हृदय रोगों में बहुत लाभकारी है। (6) टीसिल तथा (थाइरॉइड) को बल मिलता है। (7) सर्वाइकल रोगों के लिए यह आसन एक रामबाण उपचार है। (8) इससे एड़िनल ग्रन्थि प्रभावित होती है। प्रश्न 9. अर्द्धमत्स्येन्द्रासन की विधि तथा लाभ लिखिए। उत्तर—अर्द्धमत्स्येन्द्रासन (Ardhmatsyendrason) विधि—(1) बैठी हुई लम्बी स्थिति बनाइए। (2) दायाँ पैर मोड़कर उसकी एड़ी सीवनी (मल- मूत्रेन्द्रिय) के मध्य का स्थान पर लगाइए। पैर का तलवा बाँयी जाँघ से लगाकर घुटना भूमि पर टिका हुआ रहेगा। (3) बायें पैर को मोड़कर दायें घुटने के बाहर की ओर रखिए। बाँया घुटना ऊपर की ओर उठा रहना चाहिए। (4) दायें हाथ का कंधा पैर के बाहर से लाकर बायें पैर का अंगूठा पकड़िए। (5) बायें हाथ को कटि प्रदेश के पीछे ले जाकर दाहिने जंघामूल में स्थिर कीजिए। कटि सीधी रखकर उसे बायीं ओर मोड़िए। इसी प्रकार ग्रीवा को भी बायीं ओर मोड़िए। SUPW | 61 इसी प्रकार ग्रीवा को भी बाँई ओर मोड़िए, यहाँ तक कि ग्रीवा बायें कंधे की सीध में आ जाए। (6) एक मिनट तक इस स्थिति में रहने के पश्चात् क्रमशः ग्रीवा, दायाँ हाथ, दायाँ पैर, बायाँ हाथ वापस लाकर लम्बी बैठी स्थिति में आ जाइये। इसी तरह बायाँ पैर मोड़कर दूसरी तरफ से अभ्यास कीजिए। सावधानी—(i) पैरे की एड़ी, सीवान प्रदेश में ही लगी रहे। उसे नितंबो के नीचे लाना अनुचित है। लाभ—(i) मेरुदण्ड की हड्डी धुरी पर मुड़ने से स्नायु मण्डल प्रभावित होता है। (ii) मधुमेह रोग में लाभ मिलता है। (iii) हृदय शक्तिवान बनता है। (iv) पाचन संस्थान दुरुस्त होता है। (v) मूत्रदाह या पेशाब भी जलन की बीमारी ठीक होती है। (vi) कमर का दर्द दूर होता है। (vii) फेफड़ों को बल मिलता है। प्रश्न 10. शलभासन की विधि तथा लाभ लिखिए। उत्तर— शलभासन (Shalbhasan) विधि—सर्वप्रथम आसन पर पेट के बल लेट जाइए। ऐड़ियों को आपस में मिला लीजिए। चेहरे को जमीन की ओर करके ठोड़ी को धरती पर टिका लीजिए। दोनों हाथों को मिलाकर जंघाओं के नीचे रखिए, हथेलियों को ऊपर रखिए। कुहनियाँ पैर से मिली हुई तथा पेट के नीचे होनी चाहिए। इसके बाद टांगों को सीधी तानते हुए ऊपर की ओर उठाइए। ऐसा करते समय आपकी टांगें मुड़नी नहीं चाहिए और ना ही मुख ऊपर उठना चाहिए। कुछ पल शलभासन में रहने के बाद शरीर को पुनः सामान्य अवस्था में ले आएँ। दायाँ कान जमीन पर रखकर पेट के बल लेट जाइए अथवा शिथिलासन में शरीर को ढीला छोड़ दें। लाभ—(i) इस आसन को करने से शरीर के मुट्ठे मजबूत होते हैं। (ii) मोटापा कम होता है। (iii) हृदय रोग ठीक होते हैं। (iv) पेट के अंगों को शक्ति मिलती है। (v) कंधे, फेफड़े व हृदय मजबूत होते हैं। (vi) मेरुदण्ड एवं नस नाड़ियाँ दुरुस्त होती हैं। प्रश्न 11. धनुरासन की विधि एवं इस आसन के करने के लाभ लिखिए। उत्तर—धनुरासन (Dhanurasan)—धनुरासन का तात्पर्य है, आसन करते हुए शरीर को धनुष की तरह मोड़ लेना या कमान की तरह तान लेना। विधि—(1) सबसे पहले पेट के बल सीधे लेट जाइए। अब दोनों टांगों को घुटनों से मोड़कर ऊपर की ओर उठाइए। दोनों हाथों को पीछे ले जाकर हथेलियों से टांगों के टखनों को पकड़ लीजिए। ध्यान रहे कि टखनों को पकड़ते समय आपकी पाँचों अंगुलियाँ एक ओर ही रहें। (2) श्वास भरकर धीरे-धीरे पैरों को पीछे की ओर तानकर घुटने और जंघाएँ ऊपर उठाने का प्रयास कीजिए, परन्तु हाथ सीधे खिंचे रहने चाहिए। (3) पिछले भाग को यथेष्ट ऊपर उठाने के पश्चात् ऊपर का भाग पेट, छाती, गर्दन ऊपर उठाइए। इस समय केवल नाभि तथा पेड़ के आस-पास का भाग ही भूमि से लगना चाहिए। शरीर का समस्त भार इसी भाग पर रहेगा। इस समय शरीर की आकृति डोरी चढ़े धनुष के समान होगी। (4) श्वास को छोड़ते हुए पहली स्थिति में आ जाइए। श्वास-प्रश्वास सामान्य होने पर पुनः दूसरा चक्र आरम्भ कीजिए। यदि अधिक समय करना है। एक बार श्वास भरकर प्रारम्भ करें और फिर सामान्य श्वास-चलता रहेगा। लाभ—इस आसन को करने से— (i) रीढ़ में लचक पैदा होती है। (ii) गुर्दे स्वस्थ रहते हैं। (iii) पेट के कई रोग दूर होते हैं। (iv) गले, पसलियों तथा फेफड़ों का व्यायाम हो जाता है। (v) मोटापा दूर होता है। (vi) गर्भाशय की बीमारियाँ ठीक होती हैं। (vii) एक इसका पान संस्थान पर प्रभाव पड़ता है। अतः पाचन क्रिया दुरुस्त होती है। (viii) स्त्रियों मासिक धर्म सम्बन्धी विकार इस आसन से दूर होते हैं। 62 | रतन पास बुक, कक्षा 9 प्रश्न 12. सुप्तवज्रासन की विधि, सावधानी व लाभ लिखिए। उत्तर— सुप्तवज्रासन विधि : (1) व्रजासन की स्थिति में बैठिए और दोनों हाथों को पार्श्व में रखकर उनकी सहायता से शरीर को धीरे-धीरे पीछे मोड़ते हुए सिर को जमीन से टिका दीजिए। कुहनियाँ जमीन पर टिकी हुई तथा कमर और छाती ऊपर उठी रहेगी। दोनों घुटने मिले हुए रहने चाहिए। (2) अब धीरे-धीरे सिर, गर्दन, कन्धे, पीठ सभी जमीन पर टिकाने का प्रयत्न कीजिए। (3) दोनों हाथ बाँधकर सिर के पीछे स्थिर कीजिए अथवा दोनों हाथों को पीछे सीधे करके जमीन पर टिकाइए। प्रारम्भ में यदि घुटने जमीन पर टिकाने में या मिलाने में कुछ कठिनाई हो तो हाथों से टखनों को सहारा दिया जा सकता है। (4) आसन छोड़ने के लिए कुहनियों और हाथों का सहारा लेकर धीरे उठकर व्रजासन की स्थिति में बैठ जाइए। सावधानी—यह आसन 2-3 मिनट तक करना पर्याप्त है, शीघ्रता से करने पर घुटनों के जोड़ उखड़ने का डर है। लाभ—इस आसन को करने से— पेट के नले खिचते हैं और नाभि टलना दूर होता है। बड़ी आँत सक्रिय होकर कोष्ठ बद्धता (कब्ज) दूर होती है। जिन व्यक्तियों को दिन भर आगे झुककर काम करना पड़ता है, उनकी कमर में होने वाली पीड़ा दूर होती है। पेड़ भाग पर इसका अच्छा प्रभाव होता है। प्रश्न 13. मयूरासन की विधि तथा लाभ लिखिए। उत्तर— मयूरासन विधि—(1) भूमि पर घुटने टिकाइए। हाथों के पंजे उल्टे करके कुहनियाँ नाभि के पास या कुछ नीचे रखिए। (2) शरीर का सम्पूर्ण भार कुहनियों पर टिकाते हुए पहले बायाँ और फिर दायाँ पैर पीछे सीधा कीजिए। इस समय केवल नाभि के आस-पास का भाग उठा हुआ रहेगा। पैर पीछे भूमि पर टिके हुए रहने चाहिए। (3) शरीर का संतुलन बनाने के लिए थोड़ा आगे की ओर झुकिए। पूर्ण संतुलन बनाने के पश्चात् पैरों को ऊपर उठाइए। अब सिर को भी ऊपर उठाइए। अन्तिम स्थिति में सिर और पैर भूमि के समानान्तर हो जाएँगे। (4) यथाशक्ति आसन में रहने के पश्चात् इसे छोड़िए। पहले घुटने भूमि पर टिकाकर फिर कुहनियाँ टिकाइए। लाभ—इस आसन को करने से— शुद्ध रक्त को नीचे के अंगों में ले जाने वाली धमनी जहाँ दो भागों में विभक्त होती है, वहाँ दबाव पड़ने से आंशिक रूप में बंध लग जाता है, इसके फलस्वरूप पाचन तंत्र को अधिक मात्रा में रक्त मिलता है। उदर में आन्तरिक दबाव (Intra Abdominal Pressure) अधिक बढ़ जाने से समस्त पाचन तंत्र, तिल्ली, यकृत, गुर्दे, अग्न्याशय और आमाशय लाभान्वित होते हैं। यह आसन अग्निवर्धक और मधुमेह में हितकर है। प्रश्न 14. चक्रासन की विधि एवं इसके लाभ लिखिए। उत्तर— चक्रासन विधि—(1) सबसे पहले पीठ के बल लेट जाइए। (2) दोनों घुटनों को इस प्रकार मोड़िए कि एड़ियाँ नितम्बों से लगी रहें। (3) दोनों हाथों को उल्टा करके दोनों कंधों के पास स्थिर कीजिए। प्रारम्भ में हाथ एवं पैरों में अन्तर रखना आवश्यक है। इससे शरीर का संतुलन बना रहेगा। (4) श्वास भरकर छाती एवं कमर को ऊपर उठाइए। सम्पूर्ण शरीर का भार हाथ एवं पैरों पर रहेगा। (5) धीरे-धीरे कमर को और अधिक ऊपर उठाते हुए हाथ एवं पैरों को पास लाने का प्रयत्न कीजिए। यहाँ तक कि शरीर की चक्राकार आकृति बन जाए। (6) अब शरीर को धीरे-धीरे ढीला छोड़ते हुए वापस भूमि पर आ जाइए। कुछ समय विश्राम करके पुनः इसका अभ्यास कीजिए। SUPW | 63 नोट—जिनकी कमर लचीली नहीं है। वे चार संख्या तक ही अर्ध चक्रासन का अभ्यास करें और धीरे-धीरे अभ्यास को बढ़ाएँ। लाभ—इस आसन को करने से— (i) रीढ़ की हड़डी की लचक वृद्धावस्था में भी बनी रहती है। (ii) शरीर में स्फूर्ति आती है। प्रश्न 15. योग मुद्रासन की विधि एवं लाभ लिखिए। उत्तर— योगमुद्रासन विधि—(1) पद्मासन की भाँति दायें पैर को बायीं जाँघ पर रखिए। ध्यान रहे कि ऐड़ी पेट से लगनी चाहिए। इसी प्रकार बायें पैर को दायीं जाँघ पर रखिए। दायीं एड़ी से मलाशय और बायीं एड़ी से अन्धान्त्र को दबाएँ। (2) दोनों हाथों को पीछे ले जाकर बाएँ हाथ में दाहिना हाथ पकड़िए। दाहिने हाथ की मुट्ठी बंद रहेगी। (3) कटि त्रिक प्रदेश से सीधा सामने झुकते हुए मुख को या सिरे के अगले भाग को धीरे-धीरे भूमि पर टिका दीजिए। जितना सीधा होकर जमीन को स्पर्श किया जाए उतना ही अच्छा है। (4) इस स्थिति में 10-15 सेकण्ड रहने के पश्चात् धीरे-धीरे ऊपर उठते हुए सीधे बैठ जाइए। कुछ समय विश्राम करने के पश्चात् पुनः द्वितीय चक्र प्रारम्भ कीजिए। इस प्रकार 3-7 चक्र किए जा सकते हैं। पूर्ण अभ्यास होने पर 2-3 मिनट तक यह आसन किया जा सकता है। आध्यात्मिक लाभ के लिए इसे अधिक समय तक करना चाहिए। उदरस्थ आशयों की नीचे लटकने की प्रायः प्रवृत्ति है। उन्हें पुनः स्थान पर व्यवस्थित करने के लिए इसमें कुछ परिवर्तन किया जाता है। अपने दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बन्द करके उन्हें एड़ियों पर इस प्रकार रखिए कि हथेलियाँ नीचे की ओर रहकर एड़ियों पर गेंद जैसी बन जाएँ। पहले के समान ही आगे झुकिए। 4-5 सेकण्ड आगे रहने के बाद ऊपर उठिए, ऐसे 5-7 बार अभ्यास कीजिए। अन्य विधि—जो व्यक्ति पद्मासन न लगा सकें वे वज्रासन में बैठकर हाथों की मुट्ठियाँ बन्द करके उन्हें जंघाओं पर इस प्रकार रखें कि दाहिनी मुट्ठी अन्धान्त्र और बायीं मलाशय को दबाए। अब आगे झुकते हुए सिर भूमि पर टिकाइए। कुहनियाँ बाहर की ओर निकली रहेंगी। नितम्ब एड़ियों पर ही टिके रहने चाहिए। इस स्थिति में 1 मिनट रहकर वज्रासन में आ जाइए और ऐसे ही 2-3 चक्र कीजिए। लाभ—योगमुद्रासन से उदर की मांसपेशियाँ मजबूत बनती हैं। आँते यदि अपने स्थान पर न हों तो वे व्यवस्थित हो जाती हैं। कटि त्रिक प्रदेश की नाड़ियाँ विशेष रूप से लाभान्वित होती हैं। उनकी तान सुधर जाती हैं। आध्यात्मिक लाभ के लिए मूलबन्ध लगाकर इसका अभ्यास करने से कुण्डलिनी जागरण में सहायक है। अन्धान्त्र और मलाशय का मोड़ ये दो स्थान ऐसे हैं जहाँ मल रुक कर मल बद्धता का रूप ले लेता है। इस मुद्रा में दाहिनी एड़ी मलाशय के मोड़ और बायीं एड़ी अन्धान्त्र को भली-भाँति दबाती है। इस दबाव से ये अवयव सक्रिय होकर मल को आगे धकेलते हैं। जिससे कब्ज का निवारण होता है। यह आसन शुक्र दौर्बल्य के निवारण में भी कारगर है। प्रश्न 16. शवासन की विधि एवं लाभ लिखिए। उत्तर— शवासन विधि—शवासन में शरीर का प्रत्येक अंग ढीला होना चाहिए। पैरों के पंजों को हिलाकर रखा जाता है। कंधों को हिलाकर रखा जाता है जिससे धड़ धीला होगा। गर्दन हिलाने से मस्तिष्क की नसे ढीली होंगी। शवास क्रिया सामान्य रूप से करें। आँखें बंद करके अपने सम्पूर्ण शरीर का अवलोकन करें। इस प्रकार के अभ्यास से शरीर व मन विश्रामावस्था में आ जाता है। कहा जाता है कि प्रत्येक आसन के पश्चात् शवासन अवश्य करना चाहिए। जब कभी आप कार्य करते थक जाएँ अथवा आपका मन किसी कारण से अशांत हो तो कम से कम 5 मिनट शवासन अवश्य करना चाहिए। यदि रात को गहरी नींद न आने की समस्या हो तो रात को सोने से पहले शवासन अवश्य करना चाहिए। इससे अच्छी नींद आती है। लाभ—शवासन करने से— (i) रक्त चाप अच्छा रहता है। (ii) हृदय रोग दूर होते हैं। (iii) नाड़ी दौर्बल्य दूर होता है। (iv) मस्तिष्क संबंधी रोग दूर होते हैं। (v) शवास गति नियमित होती है। 64 | रतन पास बुक, कक्षा 9 प्रश्न 17. प्राणायाम के सामान्य नियम लिखिए। उत्तर— प्राणायाम के सामान्य नियम (1) प्राणायाम करने का स्थान स्वच्छ एवं हवादार होना चाहिए। खुला स्थान, नदी या तालाब का किनारा प्राणायाम के उत्तम स्थान हैं। नगरों में जहाँ प्रदूषण का अधिक प्रभाव हो, वहाँ प्राणायाम करने से पहले घी का दीपक, अगरबत्ती या धूपबत्ती जलाकर उस स्थान को सुगन्धित कर लेना चाहिए। (2) प्राणायाम करने के लिए आसन के रूप में कम्बल, दरी, चादर, रबर मैट या चटाई का प्रयोग करना चाहिए। यदि बैठने का आसन सुखदायी नहीं होगा तो मन भी एकाग्र नहीं रहेगा। (3) प्राणायाम के लिए सिद्धासन/सुखासन या पद्मामासन में मेरुदण्ड को सीधा रखकर बैठें। जो व्यक्ति जमीन पर नहीं बैठ सकते वे कुर्सी पर बैठकर प्राणायाम कर सकते हैं। (4) प्राणायाम करते समय अपनी ग्रीवा, रीढ़, छाती एवं कमर को सीधा रखिए। (5) श्वास सदैव नासिका से ही लेनी चाहिए, इससे वायु फिल्टर होकर अन्दर जाती है। मुख से श्वास नहीं लेनी चाहिए। सामान्य अवस्था में भी नासिका से श्वास लेनी चाहिए। (6) प्राणायाम करने वाले व्यक्ति को अपने आहार, विहार, आचार, विचार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सदैव सात्विक और चिकनाई युक्त आहार ही ग्रहण करें। जैसे—फल एवं उनका रस, हरी सब्जियाँ, दूध, घी आदि। सामान्य प्राणायाम के लिए विशेष भोजन अनिवार्य नहीं है। प्राणायाम के पश्चात् ऊष्णता दही या छाछ का प्रयोग करने से बात विकार उत्पन्न हो जाते हैं। (7) मन की एकाग्रता प्राणायाम का आवश्यक अंग है। ओहम का जप या ईष्ट का स्मरण करने से मन एकाग्र होता है। प्रश्न 18. भस्त्रिका प्राणायाम की विधि व लाभ लिखिए। उत्तर— भस्त्रिका प्राणायाम विधि—किसी ध्यानात्मक आसन में सुविधाजनक कमर व गर्दन सीधी करके बैठकर दोनों नासापुटों से श्वास को पूरा अन्दर डायाफ्राम (महाप्रचीरा पेशी) तक भरना तथा धीरे-धीरे सहजता के साथ जोड़ना भस्त्रिका प्राणायाम कहलाता है। प्रारम्भ में 2½ सेकण्ड में श्वास अन्दर लेना एवं उतने ही समय में श्वास को एक लय के साथ बाहर छोड़ना चाहिए, जिससे कि बिना रुके एक मिनट में 12 बार के औसत से पाँच मिनट की एक आवृत्ति में 60 बार अभ्यास करें। कफ की अधिकता या साइनस आदि रोगों के कारण जिनके दोनों नासा छिद्र ठीक से खुले हुए नहीं होते, उन लोगों को पहले दाएँ नासापुट को बन्द करके बायें से रेचक व पूरक (श्वास लेना व छोड़ना) करना चाहिए। फिर बाएँ नासापुट को बन्द करके दाएँ से यथाशक्ति मन्द, मध्यम या तीव्रगति से रेचक व पूरक करना चाहिए। सावधानी—जिन व्यक्तियों को उच्च-रक्त-चाप, दमा या हृदय रोग हों, उन्हें तीव्र गति से भस्त्रिका प्राणायाम नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम को करते समय जब श्वास को अन्दर भरें, तब उदर नहीं फुलाना चाहिए। श्वास डायाफ्राम तक भरें, इससे उदर नहीं फूलेगा, पसलियों तक ही छाती फूलेगी। इससे गर्मी आती है। अतः ग्रीष्म ऋतु में धीमी गति से करना चाहिए। लाभ—(i) भस्त्रिका प्राणायाम करने से प्रतिक्रिया समय अर्थात् किसी भी उद्दीपक के प्रति प्रतिक्रिया में लिए गए समय में कमी आती है। (ii) सर्दी, जुकाम, एलर्जी, श्वासरोग, दमा, पुराना नजला, साइनस आदि समस्त कफ रोग दूर होते हैं। फेफड़े दुरुस्त होते हैं तथा हृदय एवं मस्तिष्क को शुद्ध प्राणवायु मिलने से उनको अरोग्य लाभ होता है। (iii) रक्त शुद्ध होता है। प्रश्न 19. कपालभाति प्राणायाम की विधि, सावधानी एवं लाभ बताइए। उत्तर— कपालभाति विधि—कपालभाति में मात्र श्वास छोड़ने (रेचक) पर ही पूरा ध्यान दिया जाता है। श्वास लेने (पूरक) के लिए प्रयत्न नहीं करते, अर्थात् सहजता से जितना श्वास अंदर जाता है, जाने देते हैं, पूरी एकाग्रता श्वास को बाहर छोड़ने में ही होती है। ऐसा करते हुए स्वाभाविक रूप से उदर में भी आंकुचन और प्रसारण की क्रिया होती है। एक सेकण्ड में एक बार श्वास लय के साथ छोड़ना एवं सहज रूप से धारण करना चाहिए। इस प्रकार बिना रुके एक मिनट में 60 बार तथा 5 मिनट में 300 बार कपालभाति प्राणायाम होता है। कपालभाति प्राणायाम की एक आवृत्ति 5 मिनट की अवश्य होनी चाहिए। स्वस्थ एवं सामान्य रोगों से ग्रस्त व्यक्ति को कपालभाति 15 मिनट तक करना चाहिए। असाध्य रोगों में प्रातः एवं सायं दोनों समय कपालभाति आधा-आधा घंटे करने से शीघ्र लाभ होता है। सावधानी—(1) पेट की शल्यक्रिया के लगभग 6 माह बाद की अभ्यास प्रारम्भ करना चाहिए। (2) गर्भावस्था, अल्सर, आन्तरिक रक्त-स्राव एवं मासिक धर्म की अवस्था में इस प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए। लाभ—(i) मोटापा, मधुमेह, गैस, कब्ज, अल्पपित्त, गुर्दे तथा प्रोस्टेट संबंधी सभी रोग निश्चित रूप से दूर होते हैं। SUPW | 65 (ii) हृदय की धमनियों में आये अवरोध खुल जाते हैं। (iii) डिप्रेशन, भावनात्मक, असंतुलन, नकारात्मक, घबराहट आदि समस्त मनोरोगों से छुटकारा मिलता है। (iv) आमाशय, अग्न्याशय, लिवर, प्लीहा व आंतों का आरोग्य विशेष रूप से बढ़ता है। (v) कपाल भाँति छात्रों के लिए (विशेष तौर पर धीमे सीखने वाले) तथा कम से कम से कम 45 मिनट तक एकाग्रता न रख पाने वालों के लिए उपयोगी है। (vi) इससे एकाग्रता बढ़ती है। (vii) मोटे व्यक्तियों में जिन्हें उच्च रक्त चाप या मधुमेह है, वे कपालभाति के अभ्यास से लाभ प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु उन्हें अपनी रुधिर शर्करा की मात्रा व रक्त चाप की जाँच नियमित करानी चाहिए। प्रश्न 20. बाद्य प्राणायाम की विधि, सावधानी व लाभ लिखिए। उत्तर— बाह्य प्राणायाम विधि—सिद्धासन या पद्मासन में विधिपूर्वक बैठकर श्वास को एक ही बार में यथाशक्ति पूर्णतः बाहर निकाल दीजिए। श्वास बाहर निकाल कर त्रिबन्ध अर्थात् मूलबन्ध, उड्डीपन बन्ध एवं जालन्धर बन्ध लगाकर श्वास को यथाशक्ति बाहर ही रोककर रखिए। जब श्वास खींचने की इच्छा बलबती हो, तब बन्धों को हटाते हुए धीरे-धीरे श्वास लीजिए। श्वास अन्दर लेकर उसे बिना रोके ही पूर्ववत श्वासन क्रिया कीजिए। 3 से 5 सेकण्ड में श्वास को सहजता से पूरा अन्दर भरना एवं 3 से 5 सेकण्ड में ही श्वास को बाहर छोड़कर बाहर 10 से 15 सेकण्ड रखना तथा पुनः इसी क्रिया को बिना रुके लगातार करना उत्तम है। इस प्रकार 2 मिनट में सामान्यतः 3 से 5 बार बाहय प्राणायाम आराम से हो जाता है और 5 बार बाह्य प्राणायाम करना पर्याप्त है। सावधानी—(i) उच्च व निम्न रक्तचाप से पीड़ित व्यक्तियों को यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए। (ii) सिर दर्द, माइग्रेसन से ग्रस्त व्यक्ति भी इसका अभ्यास न करें। लाभ—(1) पाइल्स (बवासीर), फिस्टुला (भगन्दर), फिशर, गुदाभ्रंश, योनिभ्रंश आदि रोगों में लाभप्रद है। (2) बुद्धि सूक्ष्म और तीव्र होती है। ब्रह्मचर्य की रक्षा एवं कुण्डलिनी जागरण में सहायक है। प्रश्न 21. अनुलोम-विलोम प्राणायाम की विधि व लाभ लिखिए। उत्तर— अनुलोम-विलोम प्राणायाम विधि—किसी भी ध्यान आसन में बैठकर, कमर व गर्दन को सीधा रखते हुए बायें हाथ को ज्ञान मुद्रा में बायें घुटने पर रखकर, दाहिने हाथ से प्राणायाम मुद्रा बनाकर, अंगूठे से दायें नासापुट को बन्दर करके, बायें नासापुट से धीरे-धीरे लम्बी, गहरी श्वास खींचिए। पूर्ण श्वास भरने के पश्चात् मध्यमा व अनामिका उँगलियों से बायें नासापुट को बंद करके अंगूठा हटाकर दायें नासापुट से श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़िए। अब दाएँ नासापुट से ही धीरे-धीरे पूरक कीजिए और बाएं नासापुट से धीरे-धीरे रेचक कीजिए। यह एक आवृत्ति हुई। बायें नासापुट से लगभग ढाई सेकण्ड में श्वास लय के साथ भरना एवं बिना रोके दायें नासापुट से लगभग ढाई सेकण्ड में श्वास को बाहर छोड़ देना तथा दायें से छोड़ने के तुरन्त बाद दायें से ही सहज रूप से ढाई सेकण्ड में श्वास को लेना एवं बिना श्वास को रोके बायें नासापुट से लगभग ढाई सेकण्ड में ही श्वास को एक लय के साथ बाहर छोड़ना चाहिए। यह एक चक्र या आवृत्ति पूर्ण हुई। इसी तरह कम से कम 5 मिनट तक इस प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। स्वस्थ एवं सामान्य रोग से ग्रस्त व्यक्ति को अनुलोम-विलोम का अभ्यास 15 मिनट तक करना चाहिए। असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति को इस प्राणायाम का अभ्यास सुबह-शाम 30-30 मिनट तक करना चाहिए। लाभ—(i) संधिवात, आमवात, गठिया, स्नायु दुर्बलता, अवसाद, ओ.सी.डी., सीजोफ्रेतिया, डाइमेंशिया आदि समस्त वात रोग नष्ट होते हैं। (ii) एकाग्रता के अभाव से उत्पन्न असाधारण/ उत्तेजनात्मक क्रियाशीलता जन्य विकास का प्रबन्ध कर एकाग्रता तथा स्मरण शक्ति बढ़ाने में सहायक हो सकता है। (iii) कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड, धमनियों में आये हुए अवरोध आदि हृदय सम्बन्धी रोग दूर होते हैं। प्रश्न 22. भ्रामरी प्राणायाम की विधि, सावधानी व लाभ लिखिए। उत्तर— भ्रामरी प्राणायाम विधि—किसी भी ध्यान मुद्रा में बैठकर श्वास को पूरा अन्दर भरिए। मध्यमा उँगली से नासिका के मूल में आँख के पास दोनों ओर से थोड़ा दबाएँ, मन को केन्द्रित रखें, अंगूठों के द्वारा दोनों कानों को पूर्ण बन्द कर लीजिए। अब भ्रामरी की भाँति गुंजन करते हुए नाद रूप में 'ओहम्' का उच्चारण करते हुए श्वास को बाहर छोड़िए। पुनः इसी प्रकार आवृत्ति कीजिए। 3 से 5 सेकण्ड में श्वास को अन्दर भरना एवं विधि पूर्वक कान, आँख बन्द करके 15-20 सेकण्ड में नाद रूप में श्वास बाहर छोड़ें। प्रत्येक व्यक्ति को लगातार कम से कम 5 से 7 बार यह प्राणायाम अवश्य करना चाहिए। सावधानी—नाद भौंरे की गुंजन की भाँति मधुर और सहज रखना चाहिए। कर्कश और कठोर गुंजन का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए। आँखों के ऊपर उँगलियों से अधिक दबाब नहीं देना चाहिए। लाभ—(i) यह मानसिक रोगों में काफी लाभदायक है। (ii) ध्यान के लिए अत्यन्त उपयोगी है। 66 | रतन पास बुक, कक्षा 9 12. राज्यों से संबंधित प्रवृत्तियाँ सारांश ● शिविरार्थियों को भारत के विभिन्न राज्यों के संबंध में शिविर के कार्यक्रमानुसार विभिन्न प्रकार की जानकारी उपलब्ध करायी जा सकती है। विद्यार्थियों को अन्य राज्यों तथा प्रसिद्ध नगरों एवं उनके इतिहास, संस्कृति एवं धरोहरों पर संक्षिप्त लेख लिखने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। ● उत्तर प्रदेश भारत का जनसंख्या के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ है। उत्तर प्रदेश अनेक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक धरोहरों का राजा है। उत्तर प्रदेश अनेक विद्वानों, क्रान्तिकारियों, वैज्ञानिकों, बीरांगनाओं एवं राजनयिकों की जन्म एवं कर्मस्थली भी है। यहाँ अनेक कवि भी पैदा हुए हैं। उत्तर प्रदेश में कई पवित्र नदियाँ, दर्शनीय स्थल, शैक्षणिक संस्थान, औद्योगिक संस्थान आदि भी स्थित हैं। ● पश्चिमी बंगाल को शस्यश्यामला पंग भूमि के नाम से भी जाना जाता है। इसके उत्तर में हिमालय की चाँदी सी चमचमाती चोटियाँ दक्षिण में दिन रात प्रक्षालन करता गंगासागर पूर्व में बाँग्लादेश, पश्चिम में झारखण्ड और दक्षिण पश्चिम में उड़ीसा राज्य है। कोलकाता पश्चिमी बंगाल की राजधानी है। यह नगर हुगली नदी के किनारे बसा है। भारत में भूमिगत रेल सर्वप्रथम इसी नगर में चलाई गई थी। कपिल तीर्थ, काली घाट, दक्षिणेश्वर बेलूरमठ पश्चिमी बंगाल के प्रमुख तीर्थस्थल हैं। चैतन्य महाप्रभु, श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, बंकिम चन्द्र, रविन्द्रनाथ ठाकुर, सुभाष चन्द्र बोस, जगदीश चन्द्र बसु, प्रफुल्लचन्द्र राय आदि पश्चिमी बंगाल की महान विभूतियाँ हैं। ● हिमालय की गोद में स्थित सिक्किम अप्रैल 1975 में भारत का 22 वाँ राज्य बना। विश्व का तीसरा सबसे ऊँचा शिखर कंचनजंघा (8579 मीटर) इसी राज्य की सीमा पर स्थित है। तिस्ता यहाँ की पवित्र नदी है। यहाँ विविध प्रकार की वनस्पति उगती हैं यहाँ के विस्तृत भू-भाग में चाय के बागान हैं। बड़ी इलायची की पैदावार के लिए यह भारत भर में प्रसिद्ध है। ● आसाम भारत के उत्तर पूर्व में स्थित एक राज्य है। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में इसे प्राज्ञ ज्योतिष, कामरूप के नाम से जाना जाता था। ब्रह्मपुत्र इस राज्य की प्रमुख नदी है। इसकी आध्यात्मिकता, संस्कृति, कला अपने आप में अनूठी है। ● भारत के पूर्वी तट पर स्थित राज्य उड़ीसा जिसे ओडिसा भी कहते हैं, की राजधानी भुवनेश्वर है। यहाँ की मुख्य भाषा उड़िया है। उड़ीसा की पहचान सूर्य मंदिर कोणार्क से मुख्यतः जोड़ी जाती है। यहाँ अनेक मंदिर, मठ, इमारतें, गुफाएँ, नदी, उपवन, झीलें स्थित हैं। यहाँ की संस्कृति अपने आप में विशेष महत्व रखती है। ● भारत का दक्षिणी राज्य तमिलनाडु अपने द्रविण शैली के विशाल मन्दिरों और विशाल समुद्री तटों के लिए प्रसिद्ध है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई है जहाँ की प्रमुख भाषा तमिल है। तमिलनाडु अनेक वैज्ञानिकों, की जन्म स्थली है। मीनाक्षी मंदिर मदुरई यहाँ का प्रसिद्ध मंदिर है। ● गुजरात की भारत, पश्चिमी सीमा पर स्थित है। इसकी राजधानी गांधीनगर है। सोमनाथ यहाँ का प्रसिद्ध मंदिर है। गुजरात का पोरबन्दर महात्मा गाँधी की जन्म स्थली है। यह गरबे के लिए विश्व प्रसिद्ध राज्य है। ● वर्ष 2000 में अस्तित्व में आए राज्य उत्तराखण्ड को देव भूमि भी कहा जाता है। यहाँ की राजधानी देहरादून है। हमारे देश का प्रसिद्ध तीर्थस्थान केदार नाथ इसी राज्य में स्थित है। यहाँ अनेक प्रकार की वनस्पतियाँ तथा दुर्लभ जड़ी बूटियाँ मिलती हैं। यहाँ अनेक पर्यटन एवं तीर्थ स्थल हैं। ● भारत का क्षेत्रफल के हिसाब से बसे छोटा राज्य गोवा है। 1961 में पुर्तगालियों से यह भारतीय प्रशासन में आया। यहाँ की राजधानी पणजी है। यह अपनी सुन्दरता के लिए सभी का मन लुभाता है। ● भारत का मुकुट जम्मू कश्मीर भौगोलिक रूप से उत्तर में स्थित है। डल झील के लिए प्रसिद्ध श्रीनगर इस राज्य की राजधानी है। हिन्दुओं की प्रसिद्ध देवी, वैष्णोदेवी इसी राज्य में है। ● झारखण्ड सन 2000 में राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। इसकी राजधानी रांची है। यह खनिजों से परिपूर्ण राज्य है। यह आदिवासी जनजाति बहुल इलाका है। ● भारत की दक्षिणी पश्चिमी सीमा पर अरब सागर और सयाद्री पर्वत श्रंखलाओं के मध्य स्थित राज्य केरल है। इसकी राजधानी तिरू अनन्त पुरम है। यहाँ मलयालम भाषा बोली जाती है। केरल का इतिहास संगमकाल के रूप में जाना जाता है। ● हिन्दू पादशाही की पदवी लेने वाले हिन्दू सम्राट शिवाजी की जन्म और कर्मस्थली महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई है। महाराष्ट्र कृषि, उद्योग, धार्मिक, शैक्षणिक, शोध आदि क्षेत्रों से परिपूर्ण राज्य है। ● निमाण, मालवा (बुन्देलखण्ड, ग्वालियर, बहोलखण्ड जैसे पाँच लोक संस्कृतियों का समावेश मध्यप्रदेश में है। भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी हैं नर्मदा नदी को यहाँ गंगा के समान पवित्र नदी माना जाता है। खुजराहो के मंदिर यहाँ के प्रसिद्ध मंदिर हैं। SUPW | 67 ● अरणाचल को उगते हुए सूर्य का प्रदेश कहा जाता है। इसकी राजधानी ईटानगर है। ● महाअमात्य आचार्य विष्णुगुप्त (चाणक्य) की कर्मभूमि बिहार की राजधानी पटना है। बिहार का ऐतिहासिक नाम मगध है तथा इसकी राजधानी पटना का इतिहासिक नाम पाटिलपुत्र भी है। यहाँ मौर्यवंश और गुप्तवंश का काल स्वर्णिमकाल रहा। ● राष्ट्रभक्त और स्वाभिमान से ओत-प्रोत महाराणा प्रताप की जन्मस्थली राजस्थान शुरू से ही वीरों और राष्ट्रभक्तों की जन्मस्थली है। राजस्थान की राजधानी जयपुर है। ● भारत के उत्तर पश्चिम में स्थित राज्य हिमाचल प्रदेश को देवभूमि भी कहा जाता है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला है। यह हिमालय पर्वत की शिवालय श्रेणी का हिस्सा है। ● प्राचीन काल में दिल्ली को इन्द्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था जिसकी स्थापना पाण्डवों ने की थी। 1911 में कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली भारत की राजधानी बना। ● आन्ध्र प्रदेश, भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है। हैदराबाद इस राज्य की राजधानी है। ● दक्षिण भारत का एक प्रमुख राज्य कर्नाटक भारत में एक विशिष्ट स्थान रखता है। इसकी राजधानी बैंगलूरू है जो कि भारत की आई.टी.सिटी कहलाता है। यहाँ की मुख्य भाषा कन्नड़ है। ● हिन्दू पादशाही की पदवी लेने वाले हिन्दू सम्राट शिवाजी की जन्म और ● भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को मिशाइल मैन के नाम से जाना जाता है। ● चन्द्रशेखर वैंकट रमन भौतिकी के उत्कृष्ट वैज्ञानिक रहे हैं। 1930 में इन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ● होमी जहाँगीर भाभा भारत में परमाणु शक्ति के संस्थापक माने जाते हैं। ● विक्रम अंबालाल साराभाई भारत के प्रमुख वैज्ञानिकों में सुमार हैं। इन्होंने अंतरिक्ष कार्यक्रम में भारत की एक विशिष्ट पहचान बनायी है। ● डॉ हरगोबिन्द खुराना नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय वैज्ञानिक रहे हैं। ● आर्यभट भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ व खगोलशास्त्री थें। ● महात्मा बुद्ध, स्वामीदयानन्द सरस्वती, सरदारबल्लभ भाई पटेल, स्वामी रामकृष्ण परम हंस, गुरुनानक देव, लालालाजपत राय छत्रपति शिवाजी आदि भारत की गौरवशाली प्रतिभाएँ हैं जो सदैव हमारे दिल में वसी रहेंगी। पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर वस्तुनिष्ठ प्रश्न 1. भारत का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है— (अ) उत्तर प्रदेश (ब) मध्य प्रदेश(स) राजस्थान (द) बिहार। 2. गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश कहाँ दिया। (अ) सारनाथ (ब) कुशीनगर(स) श्रावस्ती (द) काशी। 3. कौन सी नदी पश्चिमी बंगाल में आकर पद्मा एवं भागीरथी में बंट जाती है— (अ) हुगली, (ब) शारदा(स) गंगा (द) गण्डक। 4. हमारे देश का राष्ट्रगान किसने लिखा? (अ) बंकिमचन्द्र ने (ब) रविन्द्रनाथ ठाकुर ने(स) इकबाल ने (द) मैथिलीशरण ने। 5. भारत में प्रथम भूमिगत रेल चलाई गई थी— (अ) हैदराबाद में (ब) बम्बई में(स) कोलकाता में (द) बैंगलूरू में। 6. कंचनजंघा पर्वत शिखर अवस्थित है? (अ) मेघालय में (ब) उत्तराखण्ड में(स) जम्मूकश्मीर में (द) सिक्किम में। 7. आसाम की राजधानी है— (अ) गंगटोक (ब) गोहाटी(स) ईटानगर (द) भुवनेश्वर। 8. हीराकुण्ड बाँध स्थित है— (अ) बिहार में (ब) उत्तराखण्ड में(स) उड़ीसा में (द) उत्तर प्रदेश में। 9. सोमनाथ का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है— (अ) तमिलनाडु में (ब) उड़ीसा में(स) कर्नाटक में (द) गुजरात में। 10. गंगा एवं यमुना नदियों का उद्गम स्थल स्थित है— (अ) सिक्किम में (ब) उत्तराखण्ड में(स) मेघालय में (द) अरुणा चल प्रदेश में। 11. 1961 में गोवा किन शासकों के हाथों से भारतीय प्रशासन का हिस्सा बना? (अ) यमन शासक (ब) पुर्तगाली(स) अंग्रेज शासक (द) मुगल शासक। 12. मध्य प्रदेश का प्रमुख लोक नृत्य है— (अ) तेराकाली (ब) चरकुला(स) मटकी नृत्य (द) ये सभी। 13. भारत का प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय इस राज्य में स्थित है— (अ) बिहार (ब) मध्य प्रदेश(स) राजस्थान (द) झारखण्ड। 14. राजस्थान का वह कौन सा स्थान है जहाँ सर्वप्रथम परमाणु परीक्षण किया गया? (अ) कच्छ (ब) पोखरण(स) ढूँढाड़ (द) मारवाड़। 68 | रतन पास बुक, कक्षा 9 15. दिल्ली को भारत की राजधानी कब बनाया गया। (अ) 1881 में (ब) 1911 में (स) 1931 में (द) 1951 में। 16. "विग्स आफ फायर" पुस्तक किसने लिखी? (अ) चन्द्रशेखर बैंकेटरमन ने (ब) ए. बी. जे. अब्दुल कलाम ने (स) महात्मा गांधी ने (द) विक्रम साराभाई ने। 17. किस भारतीय गणितज्ञ ने पाई का मान बताया। (अ) हरगोबिन्द खुराना ने (ब) चन्द्रशेखर बैंकेटरमन ने (स) आर्य भट्ट ने (द) चन्द्रगुप्त मौर्य ने। 18. यह किसने कहा "स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है"। (अ) सुभाष चन्द्र बोस (ब) लाल बहादुर शास्त्री (स) सरदार भगत सिंह (द) बाल गंगाधर तिलक। उत्तर—1. (अ) 2. (अ) 3. (स) 4. (ब) 5. (स) 6. (द) 7. (ब) 8. (स) 9. (द) 10. (ब) 11. (ब) 12. (द) 13. (अ) 14. (ब) 15. (ब) 16. (ब) 17. (स) 18. (द)। अतिलघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. ऐतिहासिक रूप से वैदिक सभ्यता का उदय किस राज्य में हुआ? उत्तर—ऐतिहासिक रूप से वैदिक सभ्यता का उदय उत्तर प्रदेश में हुआ। प्रश्न 2. उत्तर प्रदेश के किन्ही दो क्रान्तिकारियों के नाम लिखिए। उत्तर—रामप्रसाद विस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद। प्रश्न 3. उत्तर प्रदेश में विधान सभा तथा लोक सभा सीटों की संख्या कितनी है? उत्तर—403 विद्यान सभा सीट तथा 80 लोक सभा सीट। प्रश्न 4. एशिया का सबसे बड़े वानस्पतिक उद्यान का नाम बताइए तथा यह कहाँ स्थित है? उत्तर—भारतीय बोटेनिकल गार्डन, कोलकाता एशिया का सबसे बड़ा वानस्पतिक उद्यान है। प्रश्न 5. चैतन्य महाप्रभु क्यों प्रसिद्ध हैं? उत्तर—चैतन्य महाप्रभु चैतन्य देव ने राधाकृष्ण की भक्ति के माध्यम से प्रेम का प्रसार भारत भर में किया। आज उनका संदेश विश्वभर में फैल चुका है। प्रश्न 6. बीहू कहाँ का लोकनृत्य है तथा कब किया जाता है? उत्तर—बीहू आसाम का लोक नृत्य है जो कि बीहू पर्व पर किया जाता है। प्रश्न 7. उड़ीसा के कुछ प्रमुख पर्यटन स्थलों के नाम लिखिए। उत्तर—नंदन कानन, चिल्का झील, हीराकुंड बोध। प्रश्न 8. तमिलनाडु का प्रसिद्ध व्यंजन क्या है। उत्तर—डोसा, इडली, और उत्पम। प्रश्न 9. प्रसिद्ध गिरि अभयारण्य कहाँ स्थित हैं उत्तर—गिरि वन, गुजरात। प्रश्न 10. उत्तराखण्ड के प्रमुख पर्वतों के नाम लिखिए। उत्तर—केदारनाथ, नंदा देवी, गौरी पर्वत। प्रश्न 11. दून विश्व विद्यालय कहाँ स्थित है? उत्तर—देहरादून, उत्तराखण्ड। प्रश्न 12. महाभारत में गोवा का उल्लेख किस रूप में किया गया है? उत्तर—महाभारत में गोवा का उल्लेख गोपराष्ट्र के रूप में किया गया है। प्रश्न 13. महाराष्ट्र की मुख्य भाषा क्या है? उत्तर—महाराष्ट्र की मुख्य भाषा मराठी है। प्रश्न 14. मध्यप्रदेश में कौन-कौन से ज्योतिर्लिंग हैं? उत्तर—महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर। प्रश्न 15. चम्पारन विद्रोह किस राज्य में सम्बन्धित था? उत्तर—चम्पारन विद्रोह बिहार से सम्बन्धित था। प्रश्न 16. राजस्थान के दो प्रसिद्ध नृत्यों के नाम लिखिए। उत्तर—धूमर नृत्य एवं तेराताली नृत्य। प्रश्न 17. कुचिपुड़ी कहाँ का शास्त्रीय नृत्य हैं? उत्तर—आन्ध्र प्रदेश का प्रश्न 18. गौतम कौन थे? उत्तर—गौतम शाक्य वंशीय राजा शुद्धोधन के पुत्र थे। प्रश्न 19. किसे पंजाब केसरी के नाम से जाना जाता है। उत्तर—लाला लाजपत राय को। प्रश्न 20. शिवाजी किसके शिष्य थे? उत्तर—समर्थ गुरु रामदास के शिष्य थे। लघु उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. उत्तर प्रदेश के प्रमुख तीर्थस्थानों का विवरण दीजिए। उत्तर—इलाहाबाद में गंगा, जमुना का संगम स्थल है। यहाँ प्रत्येक बारहवें वर्ष में कुंभ का मेला आयोजित किया जाता है। कार्तिक के अवसर पर गंगानदी में डुबकी लगाने के लिए कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, गढ़मुक्तेश्वर, इत्यादि स्थानों पर बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। भारत के प्राचीन तीर्थस्थान, वाराणसी, अयोध्या, विन्ध्याचल, प्रयाग, मथुरा कांपिल, कौशाम्बी, प्रमुख स्थल उत्तर प्रदेश में हैं। इसके अतिरिक्त सारनाथ, श्रावस्ती, कुशीनगर आदि स्थल भी हैं। गोंडा जिले के मत्स्येन्ठनाथ नामक स्थान पर प्रसिद्ध देवी पीढ़ है। प्रश्न 2. पश्चिमी बंगाल के बारे में संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। SUPW | 69 उत्तर—पश्चिमी बंगाल को बंग भूमि भी कहा जाता है। इस के उत्तर में हिमालय की चोटियाँ दक्षिण में गंगासागर, पूर्व में बांग्लादेश, पश्चिम में झारखण्ड और दक्षिण में उड़ीसा है। बंगाल कृषि प्रधान राज्य है। जनसंख्या का तीन चौथाई भाग गाँवों में बसा है। 80% लोग कृषि पर निर्भर है। गंगा बंगाल की सर्वप्रमुख नदी है। जो बंगाल में आकर पद्मा और भागीरथी दो नदियों में बँट जाती है। भागीरथी कोलकाता होकर गंगासागर में मिलती है और हुगली कहलाती है। हुगली के एक किनारे कोलकाता और दूसरे किनारे हावड़ा नगर बसा है। पद्मा बंगलादेश में बहते हुए सागर में मिलती है। प्रश्न 3. कोलकाता के बारे में संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर—लगभग 92 वर्ग किलोमीटर में फैले कोलकाता की जनसंख्या एक करोड़ से अधिक है। यहाँ घुड़दौड़ मैदान, चिड़िया घर, विड़ला प्लेनीटोरियम, इण्डियन वोटेनिकल गार्डन बेलूरमठ आदि दर्शनीय स्थल हैं। वोटेनिकल गार्डन एशिया का सबसे बड़ा वानस्पतिक उद्यान है। यहाँ के जड़ी-बूटी संग्रहालय में पच्चीस लाख सूखे लता पत्तों के नमूने सुरक्षित हैं। इसी नगर में भारत की प्रथम मेट्रोरेल चलाई गई। प्रश्न 4. पश्चिमी बंगाल के प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों का विवरण दीजिए। उत्तर—पश्चिमी बंगाल के प्रसिद्ध तीर्थ स्थान— 1. कपिल तीर्थ—यहाँ सुन्दरवन के डेल्टा पर बसा सांख्य दर्शन के रचयिता कपिल मुनि का आश्रम है, जहाँ सागर पुत्रों को गंगा धारा द्वारा मुक्त किया गया था। 2. कालीघाट—कोलकाता का कालीघाट एक महापीठ है। कहा जाता है, यहाँ सती के दायें परै की चार अंगुलिया गिरी थी। यहाँ की देवी का नाम कलिका है। 3. दक्षिणेश्वर—दक्षिणेश्वर की कालीवाड़ी कोलकाता के निकट गंगा के किनारे पर स्थित है। यह मंदिर रामकृष्ण परम हंस का साधना स्थल रहा है, जिनसे प्रेरणा तथा आशीर्वाद लेकर स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय धर्म, संस्कृतिको तथा दर्शन को विश्व में पुनः प्रतिष्ठित किया। 4. बेलूर मठ—यह दक्षिणे स्वर मंदिर के सामने गंगा के उस पार स्थित है। यहाँ रामकृष्ण परमहंस का स्मारक है। इस मंदिर के साथ भारत के विश्व प्रसिद्ध सपूत स्वामी विवेकानन्द की स्मृति जुड़ी हुई है। प्रश्न 5. पश्चिमी बंगाल की किन्ही दो महान विभूतियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। उत्तर—1. स्वामी विवेकानन्द—इन्होंने विश्व में बेदान्त का शंखनाद किया। शिकागो की विश्वधर्म सभा में इन्होंने अपने भाषण से संसार के विद्वानों को न केवल प्रभावित ही किया बल्कि भारतीय दर्शन की विजय पताका विश्वभर में फहरायी। हिन्दू धर्म के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ी। उन्होंने देश-प्रेम और नव-जागरण के मंत्र से देश को दीक्षित किया। इनकी ओज पूर्ण वाणी और उदात्त विचार से देश जगा। 2. रवीन्द्रनाथ ठाकुर—रवीन्द्रनाथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने गीत, नाटक कहानी, उपन्यास निबन्ध और गतिनाट्य लिखे। उन्हें गीतान्जलि पर संसार का सबसे बड़ा साहित्यक नोबेल पुरस्कार मिला। वे मूर्धन्य शिक्षाविद थे और शान्ति निकेतन के संस्थापक थे। उन्होंने ही राष्ट्रगान की रचना की। प्रश्न 6. सिक्किम राज्य का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर—सिक्किम 1975 में भारत का 22 वाँ राज्य बना। हिमालय पर्वत के कई शिखर इसी राज्य में हैं। कचन जघा पर्वत शिखर इसी राज्य की सीमा पर है। कई मवोरम घाटियाँ हिमानियाँ पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। त्रिसोटा (तिस्टा) यहाँ की पवित्र नदी है। यहाँ पर विभिन्न प्रकार की वनस्पति उगती हैं जिनमें आर्किड की सैकड़ों जातियाँ हैं। इसे वनस्पतिशास्त्रियों का स्वर्ग भी कहा जाता है। इस राज्य की राजधानी गंगटोक है। यहाँ 500 एकड़ भूमि में चाय के बागान हैं। चाय का निर्यात यहाँ से रूस व जर्मनी को होता है। अधिकांश जनता कृषि पर निर्भर है। बड़ी इलायची के लिए यह भारतभर में प्रसिद्ध है। यहाँ कई बौद्धमठ हैं जो अपनी अलग ही पहचान रखते हैं। प्रश्न 7. आसाम राज्य के बारे में संक्षिप्त लेख लिखिए। उत्तर—आसाम भारत के उत्तरपूर्व में स्थित राज्य है। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में इसे प्राज्ञ ज्योतिष, कामरूप के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मपुत्र इस राज्य की प्रमुख नदी है। असम की पहचान वहाँ के लगभग 700 चाय बागानों से ही है। इसकी राजधानी गोहाटी है। गोहाटी में भारत सरकार ने एक नई आई.आई.टी स्थापित की है। गोहाटी डिबरूगढ़, सिलचर यहाँ के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं। डिग्बोई में तेल शोधक संयंत्र है। असम में केन, बाँस, शिल्प, घंटी धातु, मुखौटा बनाना, लोहे से नाव और पारंपरिक बंदूके बनाना इत्यादि शिल्प परंपराएँ रही हैं। बीहू प्रसिद्ध लोक नृत्य है। पहाड़ीक पर कामाक्षा देवी का मंदिर स्थित है। यहाँ अनेक पीठ स्थित हैं। प्रश्न 8. उड़ीसा राज्य की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए। उत्तर—भारत के पूर्वी तट पर स्थित राज्य उड़ीसा को ओड़िशा भी कहते हैं। इसकी राजधानी भुवनेश्वर है। यहाँ की मुख्य भाषा उड़िया है। ग्रन्थों में इस राज्य का उल्लेख कलिंग, त्रिकलिंग, उत्कल, इत्यादि के रूप में आता है। उड़ीसा की पहचान कोणार्क के सूर्य मंदिर से जोड़ी जाती है। भगवान जगन्नाथ का मंदिर भारत के चारधाम में से एक 70 | रतन पास बुक, कक्षा 9 पुरी में स्थित है। भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर प्राचीन स्थापत्य कला से परिपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ पर धौली बौद्ध मंदिर, उदयगिरि-खण्डगिरि, की प्राचीन गुफाएँ रत्नगिरि, ललितगिरि के बौद्ध भित्ति चित्र प्रसिद्ध स्थल है। नंदन कानन, चिल्का झील, हीराकुंड बांध प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। पारादीप प्रमुख बंदर गाह है। यहाँ का मुख्य नृत्य ओडिसी है। यह राज्य सम्राट अशोक के साथ हुए कलिंग युद्ध का साक्षी है। महानदी यहाँ की प्रमुख नदी है। प्रश्न 9. गोवाराज्य का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर—गोवा क्षेत्रफल के हिसाब से भारत का सबसे छोटा राज्य है। 1961 में पुर्तगालियों से यह भारतीय प्रशासन में आया। महाभारत में गोवा का उल्लेख गोपराष्ट्र के रूप में हैं। भगवान परशुराम ने इसे गुमानचल के रूप में अपने वाणों की वर्षा से स्थापित किया। गोवा का प्रमुख उद्योग पर्यटन है। इसकी राजधानी पणजी है। गोवा को कोंण वांशी के नाम से भी जानते हैं। गोवा के मनभावन बीच जैसे कलंगघूट, मीरांमार, दोनापाउला, कोलवा प्रसिद्ध हैं। माण्डवी नदी के तट पर पणजी शहर बसा है। गोवा में मंगेशी मंदिर, शांता दुर्गा मंदिर, भूतनाथ मंदिर प्रसिद्ध हैं। कोंकण रेलवे की शुरूआत से गोवा भारत के किसी भी बड़े रेलवे से जुड़ गया। प्रश्न 10. जम्मू-कश्मीर की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। उत्तर—भारत का मुकुट जम्मू-कश्मीर भौगोलिक रूप से उत्तर में स्थित है। इसके तीन मुख्य अंचल जम्मू, कश्मीर व लद्दाख हैं। सिन्धु झेलम और चिनाव प्रमुख नदियाँ हैं। श्रीनगर राजधानी है जो डल झील के लिए प्रसिद्ध है। संस्कृत व्याकरण के रचयिता पाणिनि की जन्मस्थली यही राज्य है। हिन्दुओं की प्रसिद्ध वैष्णा देवी का धाम इसी राज्य में है। यहाँ का रधुनाथ मंदिर बहुत प्रसिद्ध है यहाँ का प्रमुख लोकनृत्य कुड़ और धूमल है। प्रश्न 11. झारखण्ड राज्य की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। उत्तर—सन् 2000 में झारखण्ड भारत का राज्य बना। इसकी राजधानी राँची है। यह राज्य एक वन प्रदेश है तथा यहाँ प्रचुर मात्रा में खनिज उपलब्ध है। धनवाद, बोकारो और जमशेदपुर यहाँ के प्रमुख औद्योगिक शहर हैं। स्वर्णरेखा यहाँ की प्रमुख नदी है। भारतीय स्वतंत्रता के प्रमुख क्रांतिकारी बिरसा मुण्डा के नेतृत्व में मुण्डा विद्रोह इसी राज्य में हुआ। यह आदिवासी जनजाति बाहुल्य राज्य है। यहाँ पर लोहा, कोयला, माइका, बॉक्साइट, चूना पत्थर, इत्यादि प्रमुख खनिज मिलते हैं। यहाँ बैतला राष्ट्रीय उद्यान स्थित है वनवासियों का बड़ा त्यौहार सरहुल है जो मुख्यतः बसन्तोत्सव है। यहाँ के लोकनृत्य नटुवा, अगनी, चौकारा है। राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला जमशेदपुर तथा राष्ट्रीय खनन शोध संस्थान धनवाद में स्थित हैं। प्रश्न 12. अरुणाचक्र प्रदेश का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर—अरुणाचल प्रदेश भारत का उत्तरी पूर्वी राज्य है जो कि उगते हुए सूरज का प्रदेश कहलाता है। इसकी राजधानी ईटा नगर है। इसकी सीमाएँ दक्षिण में असम से, दक्षिण पूर्व में नागालैण्ड से, पूर्व में वर्मा से, पश्चिम में भूटान से, और उत्तर में तिब्बत से मिलती हैं। इस राज्य का अधिकांश भाग हिमालय से ढका है। यहाँ भी अर्थव्यवस्था झूम की खेती पर आधारित है। प्रश्न 13. कर्नाटक राज्य की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। उत्तर—कर्नाटक दक्षिण भारत का एक राज्य है। इसकी राजधानी बैंगलुरु है जो कि आई. टी. सिटी कहलाता है। यहाँ कि मुख्य भाषा कन्नड़ है। भारत रत्न डॉ. मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया की जन्म इसी स्थली राज्य में है जो कि भारत के प्रसिद्ध अभियन्ता, राजनीतिज्ञ थे। मैसूर में कृष्णा नदी पर बाँध इन्होंने ही बनवाया। यहाँ की मुख्य नदियाँ कावेरी, तुंगभद्रा, कृष्णा, मलयप्रभा हैं। पुरंदरदास को कर्नाटक संगीत का पितामह कहा जाता है। भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, मल्लिकार्जुन मंसूर यहाँ के प्रमुख कलाकार हैं। उगादि यहाँ का प्रमुख त्यौहार है। भारतीय विज्ञान संस्थान की स्थापना बैंगलूरु में की गयी है। उडुपी में कृष्ण मंदिर, सिरसी का मरिकंबा मंदिर, श्रंगेरी में शारदंबा मंदिर प्रमुख हैं। प्रश्न 14. डॉ. एपी. जे. अब्दुल कलाम का संक्षिप्त परिचय दीजिए। उत्तर—डॉ. एपी. जे. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को धनुषकोड़ी गाँव रामेश्वरम तमिलनाडु में हुआ। इन्होंने परियोजना निदेशक के रूप में भारत के प्रथम स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण पान एस एल वी 3 के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिससे जुलाई 1980 में रोहिणी उपग्रह सफलता पूर्वक अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया। इन्हीं की देखरेख में भारत ने 1998 में पोखरण में अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया जिससे भारत परमाणु शक्ति से सम्पन्न राष्ट्रों की सूची में शामिल हो गया। डॉ. कलाम ने साहित्यिक रूप से भी अपने शोध को चार उत्कृष्ट पुस्तकों में समाहित किया ये हैं—विंग्स ऑफ फायर, इंडिया 2020 ए. विजन फॉर द न्यू मिलेनियम” माई जर्नी तथा ‘इनाइटेड माइंड अनशीलिंग द पावर विदिन इंडिया। प्रश्न 15. चन्द्रशेखर बैंकट रमन का संक्षिप्त परिचय दीजिए। उत्तर—चन्द्रशेखर वंकट रमन का जन्म 7 नवंबर 1888 को तमिलनाडु राज्य में हुआ। ये भौतिक शास्त्री रहे जिन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। 28 फरवरी, 1928 में इन्होंने रमन प्रभाव की खोज की थी यह दिन भारत में विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। प्रश्न 16. हिमाचल प्रदेश राज्य का संक्षिप्त विवरण दीजिए। SUPW | 71 उत्तर—भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित राज्य हिमाचल प्रदेश को देव भूमि भी कहा जाता है और ऋग्वेद काल से इसका पुराना संबंध है। शिमला हिमाचल प्रदेश की राजधानी है। यह हिमालय पर्वत के शिवलय श्रेणी का हिस्सा है। घग्घर, सतुलुज और व्यास यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं। हिमाचल में हिमालय की धौलादार पहाड़ियाँ हैं। ऋग्वेद में वर्णित चार नदियाँ ऐसी है जो हिमाचल प्रदेश से हैं। ये इरावती (रावी) विणशा (व्यास) शतदुई (सतुलुज) तथा अरिकरी (चिनाब) हैं। कुल्लू, मनाली कसौनी यहाँ के प्रमुख पर्वतीय क्षेत्र है। दीर्घउत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. उत्तर प्रदेश राज्य की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। उत्तर—उत्तर प्रदेश जनसंख्या में भारत का सबसे बड़ा राज्य है, जिसकी राजधानी लखनऊ है। ऐतिहासिक रूप से वैदिक सभ्यता का उदय इसी राज्य में हुआ। यह भारत के उत्तर में स्थित है। भारत के प्राचीनतम शहरों में से एक वाराणसी, भारतीय संस्कृति में लोकप्रिय कुंभ स्थली प्रयाग, गोरखा नाथ की स्थली गोरखपुर यहीं पर हैं। प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदों में से सात जनपद वर्तमान उत्तर प्रदेश में ही हैं। गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश बनारस के निकट सारनाथ में दिया और कुशीनगर में परिनिर्वाण प्राप्त किया। इसी राज्य में वाराणसी में भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर है। आधुनिक भारत में इस प्रदेश ने पंडित मदनमोहन मालवीय और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी राजनेता दिए। इसी राज्य में कई क्रान्तिकारी जैसे पंडित रामप्रसाद विस्मिल चन्द्रशेखर आजाद, झाँसी की रानी इत्यादि हुए हैं। भौगोलिक दृष्टि से उत्तर प्रदेश को तीन मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है उत्तर में हिमालय क्षेत्र, मध्य में गंगा का मैदानी भाग और दक्षिण में विंध्याचल का क्षेत्र है। यहाँ की प्रमुख नदियाँ, पवित्र गंगा, यमुना, चम्बल और सोन हैं। यहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है। बनारसी साड़ियाँ, फिरोजाबाद की काँच की चूड़ियाँ, सहारनपुर का नम्काशीदार लकड़ी का काम, मेरठ की कैंची, राम पुर का पैंचवर्क, मुरादाबाद के पीतल के बर्तन पूरे भारत में अपनी अलग पहचान रखते हैं। मथुरा में यहाँ तेल शोधक संयंत्र है। हिन्दी उत्तरप्रदेश की मुख्यभाषा है गोस्वामी तुलसी दास, कबीर, सूरदास, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मुंशी प्रेम चन्द्र सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, हरिवंशराय बच्चन आदि प्राख्यात कवि और लेखक उत्तर प्रदेश से ही संबंधित है। इलाहाबाद में उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय है। कानपुर में भारत का प्रतिष्ठित आई.आई.टी. संस्थान स्थित है प्रश्न 2. निम्न राज्यों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (अ) तमिल नाडु (ब) गुजरात उत्तर—(अ) तमिलनाडु—भारत का दक्षिणी राज्य तमिलनाडु अपनी द्रविड़शैली के विशाल मंदिरों और विशाल समुद्री तट के लिए प्रसिद्ध है। इसकी राजधानी चेन्नई है और यहाँ की प्रमुख भाषा तमिल है। आधुनिक भारत के कई वैज्ञानिक तमिलनाडु से संबंधित है जैसे सी-वेंकटरमन, एम. के. विमान बापू आदि। तमिलनाडु, चेर, चोल, और पाण्ड्या राजवंशों की कर्म भूमि रही है। इसकी प्रमुख नदी कावेरी है। भारत का प्रमुख तकनीकी शिक्षा संस्थान आई. टी.यहाँ स्थित है। यहाँ पर थंजावर में वृहदेश्वर मंदिर, तथा मदुरई में मीनाक्षी मंदिर प्रसिद्ध है। चोल साम्राज्य के प्रमुख राजाओं में से एक राजेन्द्र चोल का साम्राज्य एशिया के प्रमुख साम्राज्यों में गिना जाता है। इसकी सीमा के भीतर पूर्वी और पश्चिमी घाट पड़ते हैं। दक्षिण में हिन्द महासागर और पूर्व में बंगाल की खाड़ी है। भरतनाट्यम यहाँ का शास्त्रीय नृत्य है। वर्तमान में यहाँ एक सदनात्मक लोक तंत्र है जिसमें विधान सभा के 34 सदस्य हैं। तमिलनाडु में चावल का उत्पादन होता है। (ब) गुजरात—यह भारत की पश्चिमी सीमा पर स्थित राज्य है। इसकी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पाकिस्तान से लगती है। इसकी राजधानी गांधीनगर है। अरब सागर इसकी दक्षिणी पश्चिमी सीमा बनाता है। भगवान कृष्ण मथुरा छोड़कर सौराष्ट्र के पश्चिमी तट पर बसे थे और उन्होंने द्वारका बनाई। सोमनाथ यहाँ का एक प्रसिद्ध मंदिर है जो कि द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक है इसी तरह अम्बाजी में देवि का प्रसिद्ध मंदिर है। गुजरात गरबा के लिए पूरी दनिया में प्रसिद्ध है। भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई का संबंध इसी राज्य से है। गुजरात में प्रसिद्ध लोक नाट्य भवई अस्तित्व में है। स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म गुजरात के तंकारा में ही हुआ। लोहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल उन्होंने देश के एकीकरण का कार्य किया, इसी राज्य से संबंधित हैं। राज्य का सबसे बड़ा वार्षिक मेला द्वारका में भगवान श्री कृष्ण के जन्म दिवस जनमाष्टमी पर हर्षोल्लास से मनाया जाता है। प्रश्न 1. उत्तराखण्ड की स्थिति, संस्कृति, उद्योग एवं गौरव का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर—उत्तराखण्ड सन् 2000 में भारत का नया राज्य बना। इसे देवभूमि भी कहा जाता है। यहाँ की राजधानी देहरादून है। हमारे देश का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान केदारनाथ इसी राज्य में स्थित है। टिहरी, गढ़वाल, कुमायूँ यहाँ के प्रमुख क्षेत्र हैं। इस राज्य का अधिकांश उत्तरी भाग वृहदतर हिमालय की चोटियों और हिम नदियों से ढका हुआ है। यह भारत में दुर्लभ जड़ी बूटियों का घर भी है। भारत की प्रमुख दो नदियों गंगा और यमुना का उद्गम स्थल भी इसी राज्य में 72 | रतन पास बुक, कक्षा 9 है। जिमकार्बेट नेशनल पार्क, नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान इसी राज्य में स्थित हैं। यहाँ के प्रसिद्ध हिम शिखरों में केदारनाथ, नंदादेवी, गौरी पर्वत प्रसिद्ध हैं। यह राज्य दो मण्डलों में विभाजित हैं—कुमारी मंडल और गढ़वाल मंडल। अलमोड़ा नैनीताल, पिथारौगढ़ कुमायूँ मंडल के प्रमुख जिले हैं तथा उत्तर काशी रुद्रप्रयाग, हरिद्वार, देहरादून, गढ़वाल मंडल के जिले हैं। यहाँ की दो प्रमुख बोलियाँ कुमाउँनी और गढ़वाली हैं। टिहरी पनबिजली योजना देश की प्रमुख पनबिजली में से एक है। हरिद्वार में प्रति बारह वर्षों में कुंभ के मेले का आयोजन होता है। पंतनगर में गोबिन्द बल्लभ पंत कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पूरे भारत में अपना अलग स्थान रखता है। रुड़की में आई. आई. टी. स्थित है। पौराणिक काल में अनेक देवी देवाताओं ने यहाँ अवतार लिए हैं। वर्तमान में यहाँ विधानसभा की 70 सीटें और लोक सभा की 5 सीटें हैं। प्रश्न 4. निम्नराज्यों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (अ) केरल (ब) महाराष्ट्र उत्तर—(अ) केरल—केरल भारत की दक्षिणी-पश्चिमी सीमा पर अरब सागर और सयाद्री पर्वत श्रंखलाओं के मध्य स्थित है। इस की राजधानी तिरूअनन्तपुरम है। यहाँ मलयालम भाषा बोली जाती है। आदि शंकराचार्य की जन्मस्थली कालड़ी इसी राज्य में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम ने अपना परशु समुद्र में फेंका जिससे उस आकार की भूमि समुद्र से बाहर निकली और केरल अस्तित्व में आया। केरल का इतिहास संगमकाल के रूप में जाना जाता है। यह भू-भाग चेर राजाओं के अधीन था। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में अति विकसित गणित की प्रसिद्ध शाखा केरल शाखा के रूप में जानी जाती है। इस शाखा में प्रसिद्ध गणितज्ञ, माधवन, शंकरनारायण, वररूचि प्रथम व द्वितीय नीलकंठ सोमायजी, शंकर वारियार प्रसिद्ध हैं। केरल की आयुर्वेद चिकित्सा परम्परा हजारों सदियों से चली आ रही है। केरल आयुर्वेद का सर्वाधिक प्रमाणिक ग्रन्थ वाग्भट्ट का आस्टांगहृदयम् तथा अस्टांग संग्राहम है। भारत में विज्ञान की आधुनिक पताका फहराने वाले एन, रामचन्द्रन, यू.एस.नायर, एम.एस. स्वीमनाथन, जी. माधवन नायर जैसे बैज्ञानिकों की जन्म स्थली केरल ही है। ओणम केरल का प्रसिद्ध त्यौहार है। केरल के प्रमुख नृत्य मोहिनी अटट्म, थिपराअटटम हैं। कथफली यहाँ का शास्त्रीय नृत्य है। (ब) महाराष्ट्र—हिन्दू पादशाही की पदवी लेने वाले हिन्दू संम्राट शिवाजी की जन्म और कर्मस्थली मुम्बई हैं। महाराष्ट्र में बालगंगाधर तिलक ने स्वतंत्रता से पूर्व सार्वजनिक तौर पर गणेशोत्सव मनाना प्रारम्भ किया था जो आज भी मनाया जाता है। यहाँ की प्रमुख बोली मराठी है। भारत के बाहर ज्योतिर्लिंगों में से एक ऋग्वेदकेशव नासिक में हैं जहाँ प्रति बारह वर्ष बाद कुंभ का आयोजन होता है। इसके अलावा महाराष्ट्र में कई धार्मिक स्थल हैं। पुणे, नागपुर, कोल्हापुर, नासिक और औरंगाबाद यहाँ के प्रमुख नगर हैं। प्रसिद्ध संत ज्ञानेश्वर तुकाराम, नामदेव इसी राज्य से हैं। हिन्दुओं को संगठित करने एवं उनमें आत्मविश्वास जगाने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संगठन के संसथापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का संबंध की इसी राज्य से है। लावणी यहा का प्रमुख नृत्य है, गोदावरी प्रमुख नदी है। प्रश्न 5. निम्नलिखित राज्यों का संक्षिप्त परिचय दीजिए—(अ) मध्य प्रदेश (ब) बिहार उत्तर—(अ) मध्यप्रदेश—निमाड़, मालवा, बुन्देलखण्ड, ग्वालियर और बघेलखण्ड पाँच लोक संस्कृतियों का समावेश मध्यप्रदेश में है। भोपाल इसकी राजधानी है। नर्मदा शिप्रा यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में से उज्जैन में महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर इस राज्य में हैं। महाकवि कालीदास की धरती मालवा रही है। विन्ध्याचल के पठार पर प्रसरित मालवा की भूमि उर्बर तो है ही साथ ही पश्चिमी भारत की सबसे अधिक स्वर्णमयी और गौरवशाली भूमि रही है। विन्ध्यवासिनी मंदिर के लिए प्रसिद्ध बुद्देल खण्ड है। महाभारत काल में विराट नगर बघेलखण्ड की भूमि पर स्थित है। 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने ग्वालियर की भूमि पर ही लड़ानर्मदा, चम्बल, ताप्ती, माही नदियों का उद्गम स्थल इस राज्य में है। यहाँ के प्रमुख लोक नृत्य तेराकाली, जावरा, मटकी नृत्य फूल-पत्ती नृत्य, गिरदा नृत्य प्रमुख हैं। यहाँ के प्रमुख मंदिरों में खुजराहो के मंदिर प्रसिद्ध हैं। जिसमें चौसठ योगिनियों का मंदिर, कंकड़िया महादेव का मंदिर तथा लक्ष्मण मंदिर प्रमुख हैं। (ब) बिहार—महाअमात्य आचार्य विष्णुगुप्त (चाणक्य) की कर्म भूमि बिहार की राजधानी पटना है। बिहार का एतिहासिक नाम मगध भी है तथा इसकी राजधानी पटना का ऐतिहासिक नाम पाटलपुत्र है। छठी और पाँचवी सदी ईसापूर्व यहाँ पर बौद्ध व जैन धर्मों का उदय हुआ। यहाँ मौर्यवंश और गुप्तवंश का काल स्वर्णिम काल रहा। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में यहाँ के बाबू कुँवर सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई चंपारन विद्रोह स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख घटना थी। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इसी राज्य से सम्बन्धित हैं। गंगा, सोन, कोशी, बूढ़ी, गंडक यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं। यहाँ मगधी, मैथिली, भोजपुरी प्रमुख भाषाएँ हैं। विक्रम शिला विश्वविद्यालय इसी राज्य में है। पावापुरी में भगवान महावीर का परिनिर्वाण स्थल है। सीता मढ़ी में जानकी मंदिर प्रसिद्ध है। प्रश्न 6. राजस्थान की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। उत्तर—राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान से ओत-प्रोत महाराणा प्रताप की जन्मस्थली राजस्थान शुरू से ही वीरों और SUPW | 73 राष्ट्रभक्तों की जन्मस्थली रही है। चित्तौड़ का जौहर एक ऐसी घटना है जो कि मातृशक्ति की वीरता की परावाष्ट्य को प्रदर्शित करती है। मीरा की जन्मस्थली कुड़की नागौर में स्थित है। राजस्थान की राजधानी जयपुर में हैं। ढूंढाड़, हाड़ौती, मारवाड़, मेवाड़ अजमेर, मेरवाड़ा आदि यहाँ के प्रमुख क्षेत्र हैं। यहाँ राजस्थानी बोली बोक्तियाँ जाती हैं। चम्बल, गंभीरी, बेड़च, वाणगंगा, माही, सोम, जाखम यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं। सोम, माही, जाखम के संगम पर वनवासियों का प्रसिद्ध वेणेश्वर धाम स्थित है। यहाँ का मेला वनवासियों का कुंभ कहलाता है। पुष्कर, सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान किलों का राज्य भी है। जैसलमेर का सोनार किला, जोधपुर का मेहरानगढ़ चन्द्रमहल (सिटी पैलेस) जयपुर, आमेर ने महल, लोहागढ़ किला भरतपुर आदि प्रसिद्ध किले हैं। हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पूर्वजों द्वारा बसाया अजयमेरू इस राज्य की हृदय स्थली है। वर्तमान में जोधपुर में आई आई टी, एम्स तथा उदयपुर में आई आई एम स्थित है। राजस्थान में घूमर नृत्य और तेराताली नृत्य प्रसिद्ध हैं। पोकरण के पास रूणीचा में बाबा रामदेव की समाधि समाजिक समरसता का अद्वितीय उदाहरण है। हड़बूजी, पाबूजी, गोगाजी, भोमिया जी प्रमुख लोक देवता हैं। राजस्थान के पोकरण में ही सर्व प्रथम 1975 में भारत ने परमाणु परीक्षण किया। प्रश्न 7. निम्नलिखित राज्यों की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। (अ) दिल्ली (ब) आन्ध्रप्रदेश। उत्तर—(अ) दिल्ली—प्राचीन काल में दिल्ली को इन्द्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था, जिसकी स्थापना पाण्डवों ने की थी। वर्तमान दिल्ली नगर की स्थापना तौमर वंश के एक राजा ने ग्यारहवीं शताब्दी में भी थी। 1911 में कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली भारत की राजधानी बनी। दिल्ली में महरौली में भारत की उज्ज्वल वैज्ञानिक परंपरा को प्रदर्शित करता हुआ एक लौह स्तम्भ है जो कि सैकड़ों वर्षों से धूप, वर्षा, आँधी में यह स्तम्भ जंग रहित खड़ा है। कैसे होंगे वे भारतीय कारीगर या वैज्ञानिक जिन्होंने इसे बनाया। यह 735.5 सेमी ऊँचा है, 50 सेमी जमीन से नीचे हैं इसका घेरा 41.6 सेमी तो नीचे है तथा 30.4 सेमी ऊपर है। स्तम्भ का कुल वजन 6096 किग्रा है। 1961 में इसके रासायनिक परीक्षण से पता चला कि यह स्तम्भ अत्यंत शुद्ध इस्पात से बना है। आज के इस्पात की तुलना में इसमें कार्बन की मात्रा काफी कम है। रसायनशास्त्री डॉ. बी. लाल का निष्कर्ष है कि स्तम्भ का निर्माण 30 किग्रा के बीस टुकड़ों को जोड़ने से हुआ है, किन्तु कहीं जोड़ नहीं है, कैसे ये टुकड़े जोड़कर एकाकार हुए होंगे। (ब) आन्ध्र प्रदेश—आंध्र प्रदेश भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित राज्य है। इसकी राजधानी हैदराबाद है। अब से दस वर्ष बाद हैदराबाद के स्थान पर अमरावती आन्ध्रप्रदेश की नई राजधानी होगी। कृष्णा और गोदावरी इस राज्य की प्रमुख नदियाँ हैं। हरिहर एवं बुक्का ने आन्ध्रप्रदेश में विजय-नगर राज्य की स्थापना की। आन्ध्र प्रदेश उत्तर में महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा से, पूर्व में बंगाल की खाड़ी से, दक्षिण में तमिलनाडु से तथा पश्चिम में कर्नाटक से घिरा हुआ है। कुचिपुड़ी यहाँ का शास्त्रीय नृत्य है। तिरूपति मंदिर भगवान वेंकटेश्वर को समर्पित है। राष्ट्रीय महत्व का एक और स्थान सिंहा चलम है। श्री शैलम भगवान शिव का मंदिर है। आन्ध्रप्रदेश में अन्य अनेक हिन्दू मंदिर भी हैं। प्रश्न 8. निम्नलिखित वैज्ञानिकों का संक्षिप्त परिचय दीजिए— (अ) होमी जहाँगीर भाभा (ब) विक्रय अम्बालाल साराभाई (स) हरगोबिन्द खुराना (द) आर्षभट्ट उत्तर—(अ) होमी जहाँगीर भाभा (1909-1966) होमी जहाँगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुम्बई में हुआ। वे भारत के एक प्रमुख वैज्ञानिक थे जिन्होंने भारत में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की कल्पना की थी। उन्होंने कुछ ही वैज्ञानिकों की सहायता से नाभिकीय ऊर्जा पर अनुसंधान कार्य प्रारम्भ लिया उन्हें “आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन एटॉमिक एनर्जी प्रोग्राम” भी कहा जाता है। भारत को शक्तियुक्त बनाने में प्रथम पग के तौर पर उन्होंने 1945 में मूलभूत विज्ञान में उत्कृष्टता के केन्द्र टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना की। ये 1947 में भारत सरकार द्वारा ‘गति परमाणु ऊर्जा आयोग’ के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। (ब) विक्रम अम्बालाल साराभाई (1919-1971) विक्रय साराभाई का जन्म अहमदाबाद में 12 अगस्त 1919 को हुआ। ये भारत के प्रमुख वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं। इन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारत को अन्तर्राष्ट्रीय मानचित्र पर स्थान दिलाया। इसी के साथ उन्होंने अन्य क्षेत्रों में वस्त्र, आणविक ऊर्जा इलैक्ट्रॉनिक्स और अन्य अनेक क्षेत्रों में भी अनुसंधान कर विज्ञान के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया। इन्होंने भारतीय प्रबंधन संस्थान (आई.आई.एम.) अहमदाबाद, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र तिरूअनंतपुरम, स्पेश एप्लीकेशन्स सेन्टर अहमदाबाद, फास्टर बीडर टेस्ट रिएक्टर (एफ.बी.टी.आर) कलपक्कम आदि की स्थापना कराई। (स) हरगोबिन्द खुराना (1922-2011) ये नोबल पुरुष्कार बिजेता भारतीय वैज्ञानिक थे। इनके अध्ययन का विषय न्यूक्लिआर्ट्रिड नामक उपसमुच्चयों की अत्यंत जटिल मूल संरचनाएँ हैं। वे इन समुच्चयों का योग 74 | रतन पास बुक, कक्षा 9 कर महत्व के दो वर्गों के न्यूक्लिआसिड एन्जाहम नामक यौगिकों को बनाने में सफल हुए। नाभिकीय अम्ल सहस्त्रों एकल न्यूक्लिआडिटं से बने होते हैं। जैव कोशिकाओं के आनुवंशिकीय गुण इन्हीं जटिल बहु न्यूक्लिआडिटो की संरचना पर निर्भर हैं। (द) आर्यभट—आर्यभट भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ व खगोल शास्त्री थे। इनकी पुस्तक 'आर्यभट्टीय' है। ये पहले संत वैज्ञानिक थे जिन्होंने यह कहा कि पृथ्वी गोल है और यह अपनी धुरी पर घूमती है। सूर्य एवं चन्द्रग्रहण के बारे में इनका विचार था कि ये ग्रहण राहू द्वारा सूर्य या चन्द्रमा को खा जाने से नहीं होते हैं बल्कि पृथ्वी एवं चन्द्रमा की छायाओं के कारण होते हैं इन्होंने पाई का मान 3.1416 बताया। थे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने ज्यासारणी दी। इन्होंने बीजगणित में अनिर्धारित समीकरण दी। बड़ी-बड़ी संख्याओं को सरल रूप से कविता की भाषा में व्यक्त किया। प्रश्न 9. निम्नलिखित का संक्षिप्त परिचय दीजिए (अ) महात्मा बुद्ध (ब) स्वामी दयानन्द सरस्वती उत्तर—(अ) गौतम बुद्ध या महात्मा बुद्ध—गौतम बुद्ध शाक्य वंशीय राजा शुद्धोधन के पुत्र थे। सात दिन की उम्र में ही उनकी माता महामाया का देहावसान हो गया। उनका लालन पालन सेवक और दासियों द्वारा किया गया था। इनके पिता ने इनकी गंभीर मनोवृत्ति को देखकर शीघ्र ही इनका विवाह यशोधरा नामक राजकुमारी से कर दिया। लेकिन महात्मा बुद्ध को संसार की वास्तविक अवस्था का ज्ञान होता गया। उनको उस राजसी जीवन से विरक्ति होती गई। देश भर में भ्रमण करके जनता को सत्य व धर्म का उपदेश दिया और अनेक कुरीतियों एवं अंध विश्वासों से हटकर कल्याणकारी मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। बुद्ध के उपदेश इतने उच्च और सरल थे कि विद्धान और अशिक्षित दोनों को उसमें अपने योग्य तथा तथ्य की बातें मिल जाती थीं। (ब) स्वामी दयानन्द सरस्वती—दयानन्द सरस्वती का जन्म मोरवी, काठिया वाड़ में हुआ। इनके पिता का नाम मूलशंकर था। दयानन्द के साथ कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं जिनसे उनके हृदय में ईश्वर और आध्यात्म की वास्तविकता जानने की जिज्ञासा हुई। उसी की प्रेरणा से वे साधुओं और योगियों की खोज में बिना किसी को बताए घर से निकल पड़े और कई वर्षों तक जंगलों और पर्वतों की खान छानकर मथुरा में स्वामी विरजानन्द जी के शिष्य बन गए। उनके पास दो-तीन वर्ष अध्ययन करके और गुरुदक्षिणा के रूप में वैदिक सिद्धान्तों के प्रसार की प्रतिज्ञा करके वे देश-भ्रमण को निकल पड़े। स्वामी दयानन्द के जीवन का सवोपरि उद्देश्य जाति में प्रचलित हानिकारक विश्वासों, कुरीतियों, रूढ़ियों को मिटाकर उनके स्थान पर समयगच्चत लाभकारा प्रथाओं का प्रचार करना था। इसके लिये उन्होंने सबसे पहले भूर्तिपूजा को ही अपना लक्ष्य बनाया, क्योंकि उस समय इस संबंध में बड़ा अन्ध विश्वास उत्पन्न हो गया था, जिससे भारतीय संस्कृति को हानि हो रही थी। उनके द्वारा किए गए प्रमुख कार्य थे— स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना स्त्रियों को धार्मिक व सामाजिक अधिकार दिलाना अंध परंपराओं का निराकरण। प्रश्न 10. निम्नलिखित संक्षिप्त परिचय दीजिए— (अ) सरदार बल्लभ भाई पटेल (ब) स्वामी रामकृष्ण परमहंस (स) गुरुनानक देव उत्तर—(अ) सरदार बल्लभ भाई पटेल—बल्लभ भाई पटेल का जन्म साधारण किसान परिवार में गुजरात में हुआ था। इनके पिता का नाम झवेर भाई था। उनके पिता झवेरभाई जब बीस वर्ष के थे तो भारत से विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए संतावनी गदर' फूट पड़ा। बल्लभ भाई छोटी आयु से ही काफी निडर और सहिष्णु थे। घर की आर्थिक अवस्था को देखकर बल्लभ भाई ने कॉलेज की पढ़ाई के विचार को स्थागित कर दिया और मुख्यालय की परीक्षा देकर अदालत में मुकदमों की पैख करने लगे। सरदार बल्लभ भाई पटेल ने अपने प्रयासों से बैरिस्टरी की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने कई आन्दोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया और स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री बने तथा विभिन्न रियासतों को मिलाकर भारत गणराज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। (ब) स्वामी रामकृष्ण परमहंस—स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जन्म 1836 में कामारपुकुर गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम खुदीराम चटटोपाध्याय था। इनका पड़ौसियों द्वारा रखा गया नाम गदाधर या गदाई था। इनका विवाह शारदामणि देवी से हुआ। रामकृष्ण ऐसे ईश्वर भक्त और सेवाभावी थे कि स्वयं भूखे रहकर भी दीन दुःखी और अतिथियों की सेवा करने को सदैव तत्पर रहते थे। ये बाल्यावस्था से ही बड़े आकर्षक थे जिससे परिचित अपरिचित सभी इनसे प्रेम करते थे। इस प्रकार आन्तरिक भक्ति और वैराग्य द्वारा वे आध्यात्मिक मार्ग में निरंतर उन्नति करते गए। जब वे ध्यान करने बैठते तो उनकी शीघ्र ही समाधि सी लग जाती थी और वे बड़ी देर तक पत्थर की मूर्ति की तरह बैठे रहते थे। जो कोई उनको देखता वह भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। उन्होंने साधना द्वारा रूपये-पैसों से ऐसी घृणा पैदा कर ली थी कि सोना-चाँदी छूने से उनको जलन-सी होने लगती थी। (स) गुरु नानक देव—गुरुनानक का जन्म लाहौर के पास तलवंडी गाँव में सन 1469 में हुआ था। इनके पिता का SUPW | 75 नाम मेहता कालूराम था। बाल्यावस्था से ही इनमें सत्य अहिंसा संयम आदि सदगुण प्रचुरता में आ गए थे। और सांसारिक प्रपंचों से बहुत दूर रहते थे। इनकी एक बड़ी विशेषता यह थी कि अन्य "साधु महात्माओं" की तरह न तो इन्होंने संसार को छोड़ा और न उनकी निंदा की। नानक जी की एक विशेषता यह थी कि वे बड़े लोगों के बजाय, दीन-दुःखी निर्बल, पीड़ितों के संपर्क में अधिक रहते थे और उनको उद्धार का मार्ग दिखलाते थे। नानक जी लगभग तीस वर्ष की आयु में सांसारिक बंधन से मुक्त होकर भटकती हुई मानवता को सत्य मार्ग का उपदेश देने निकल पड़े। गुरुनानक के प्रचार का प्रभाव समाज पर पड़ा परन्तु उसका प्रत्यक्ष परिणाम पंजाब में अधिक देखने को मिला। ज्ञात-पात के तानों, खान-पान, चौका-चूल्हे के नियमों और छुआ छूत की बीमारी को सबसे अधिक पंजाब में ही त्यागा गया। प्रश्न 11. लाला लाजपत रायका संक्षिप्त परिचय दीजिए। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में उनका योगदान क्या रहा? समझाइए। उत्तर—लाला लाजपत राय को पंजाब केसरी नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म अत्यंत निर्धन परिवार में 28 जनवरी 1865 में पंजाब के फिरोजपुर जिले की मोगा तहसील के अन्तर्गत ढोड़िग्राम में हुआ। इनके पिता का नाम श्री राधाकृष्ण तथा माँ नाम गुलाब देवी था। राय के पिता एक साधारण अध्यापक थे, मात्र 25 रूपए वेतन पाते थे जो बाद में 35 रूपया हो गया। लाजपत जी ने अपने परिश्रम से वकालत की उच्च परीक्षा पास कर एक सफल वकील बने। भारतीय स्वाधीनता को मूर्तिमान करने में जिन शिल्पियों का योगदान रहा है, उनमें राय का स्थान महत्वपूर्ण है। लगन, पुरुषार्थ, साहस, धैर्य इन्हीं गुणों के बल पर उन्होंने देश को स्वाधीन कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वकील बनने की उनकी आकांक्षा केवल आकांक्षा ही नहीं थी वरन् एक आवश्यकता थी। उन दिनों वकालत ही एक ऐसा क्षेत्र था जिसमें प्रवेश करके आर्थिक सामाजिक तथा राजनैतिक समस्याओं का सम्मान पूर्वक हल करने का अवसर रहता था। उन्होंने वकालत को अपना आधारलक्ष्य बनाया और उसे प्राप्त करने के लिए अथक प्रयास किया। राय जी ने बहुत समय तक म्यूसिपेलिटी में मंत्री पद पर कार्य किया और इस अवधि में नगर में अनेक सुधार करवाए। उन्होंने अवसर होने पर भी अपने पद और प्रभाव के आधार पर सस्ती जमीन जायदाद का लाभ नहीं डाला। उन्होंने अनेक बेघरों को चुंगी की जमीन पर घर बनाने की अनुमति दिलाई अपनी सेवा भावना के कारण लाजपत राय जी सभी के चेहते होते गए। प्रश्न 12. छत्रपति शिवाजी का परिचय देते हुए उनके प्रमुख साहसिक जीवन का वर्णन कीजिए। उत्तर—शिवाजी का जन्म चुनार के शिवनेरी दुपुर्ग में 10 अप्रैल सन 1627 ई. को हुआ। इनकी माता का नाम जीजाबाई था। शिवाजी समर्थ गुरु रामदास स्वामी के एकनिष्ठ भक्त थे। गुरु जी भी सभी शिष्यों से अधिक शिवाजी को प्यार करते थे। शिष्य मानते थे कि शिवाजी के राजा होने के कारण गुरुजी उनसे अधिक प्रेम रखते हैं। गुरु जी ने इस सन्देह को तुरंत दूर किया। समर्थ गुरु शिष्य मंडली के साथ जंगल में गए। सभी रास्ता भूल गए और समर्थ गुरु गुफा में जाकर पेट दर्द का बहाना करके लेट गए। इधर शिवाजी समर्थगुरु के दर्शनार्थ निकले जब उन्हें पता चल कि वे जंगल में ही नहीं हैं। खोजते-खोजते एक गुफा में पीड़ा से व्याकुल शब्द सुनाई पड़ा। भीतर जाकर देखा तो साक्षात गुरुदेव ही थे। शिवाजी ने हाथ जोड़कर उनकी वेदना का कारण पूछा। समर्थ ने कहा शिवा, भीषण पेटदर्द से व्याकुल हूँ। महाराज! इसकी दवा। शिवाजी ने पूछा। समर्थ ने कहा-शिवा! इसकी कोई दवा नहीं है, रोग असाध्य है। हाँ एक दवा काम कर सकती है, पर जाने दो शिवाजी बोले-नहीं गुरु देव! बिना संकोच बताएँ। मैं गुरु को स्वस्थ किए बिना चैन नहीं ले सकता। समर्थ बोले-सिंहनी का दूध और वह भी ताजा निकाला हुआ। पर शिवा! मिलना असंभव है। पास में पड़ा तुंबा उठाया और गुरु को प्रणाम कर शिवाजी तत्काल सिंहनी की खोज में निकल पड़े। कुछ दूर जाने पर एक जगह उन्हें सिंह के दो बच्चे दिखाई पड़े। शिवाजी ने सोचा निश्चय ही यहाँ इनकी माँ आएगी। संयोग से सिंहनी आ गई। अपने बच्चों के पास मनुष्य को देख कर वह शिवाजी पर टूट पड़ी और जबड़ों में उनकी गर्दन पकड़ ली। शिवाजी कितने ही बड़े शूर वीर हो पर यहाँ तो उन्हें सिंहनी का दूध निकालना था। उन्होंने धीरज धारण किया और वे हाथ जोड़कर सिंहनी से विनय करने लगे और कहा-हे माँ मैं यहाँ तुम्हें या तुम्हारे बच्चों को उठाकर ले जाने नहीं आया। मेरे गुरुदेव को स्वस्थ करने के लिए मुझे तुम्हारा दूध चाहिए उसे निकाल लेने दो। यह दूध गुरुदेव को दे आऊ, फिर भले ही तुम मुझे खा जाना। शिवाजी ने ममता भरे हाथ से उसकी पीठ सहलाई। न बोलने वाले प्राणी भी ममता से दूसरे के अधीन हो जाते हैं। सिंहनी का क्रोध शांत हो गया। उसने शिवाजी का गला छोड़ दिया और उन्हें चाटने लगी। मौका पाकर शिवाजी ने उसका दूध निकाल कर वापस चल पड़े। इधर सभी शिष्य की गुरु से आ मिले, गुरू उन्हें साथ लेकर एक आश्चर्य दिखाने के लिए पीछे के मार्ग से जंगल में बढ़े। शिवाजी आगे बढ़ रहे थे कि गुरु समर्थ शिष्यों सहित उनके पीछे पहुँच गए। उन्होंने आवाज लगाई, शिवाजी ने पीछे मुड़कर गुरू देव 76 | रतन पास बुक, कक्षा 9 को देखा और पूछा पेट का दर्द कैसा हं? आखिर तुम सिंहनी का दूध ले ही आए! धन्य हो शिवाजी तुम्हारे जैसे गुरु भक्त रहते किसी गुरु को कोई दर्द कैसे रह सकता है। परिशिष्ट महापुरुषों के कथन एवं सूक्तियां विद्यार्थियों को विभिन्न महापुरुषों द्वारा कहे गये प्रसिद्ध कथनों एवं सूक्तियों के संकलन हेतु प्रेरित किया जाना चाहिये। कुछ कथन एवं सूक्तियाँ उदाहरणार्थ दी गई हैं। कथन 1. स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है—बाल गंगाधर तिलक 2. तुम मुझे खून दो, में तुम्हें आजादी दूंगा—सुभाष चन्द्र बोस 3. दीन-दुःखियों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है—स्वामी विवेकानन्द 4. सच्चा प्रेम पवित्रता है और सच्ची पवित्रता प्रेम—स्वामी रामतीर्थ 5. सत्य और अहिंसा मेरे परमात्मा हैं—महात्मा गाँधी 6. मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी की चोट ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की एक-एक कील सिद्ध होगी—लाला लाजपत राय 7. वंदे मातरम्—बंकिम चन्द्र चटर्जी 8. दिल्ली चलो—नेताजी सुभाष चन्द्र बोस 9. जय जवान, जय किसान—लाल बहादुर शास्त्री 10. जय हिन्द—नेताजी सुभाष चन्द्र बोस 11. अंग्रेजों भारत छोड़ो—महात्मा गाँधी 12. इंकलाब जिन्दाबाद—सरदार भगत सिंह 13. आराम हराम है—जवाहर लाल नेहरू 14. करो या मरो—महात्मा गाँधी 15. सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा—इकबाल 16. विजयी विश्व तिरंगा प्यारा—श्यामलाल गुप्ता 17. सवा लाख से एक लड़ाऊँ—गुरू गोविन्द सिंह। 18. रघुपति राघव राजा राम—महात्मा गाँधी 19. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप—कबीर 20. किसी भी सिद्धि को प्राप्त करने के लिये मुझे केवल तीन दिन चाहिए—रामकृष्ण परमहंस सूक्तियाँ 1. तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।मेरा मन कल्याणकारी संकल्पों वाला हो। 2. महाजनों येन गतः स पन्थाः।महापुरुष जिस मार्ग पर चले, श्रेष्ठ मार्ग है। “बड़ों की राह भली” 3. कष्टः खलु पराश्रयःपराधीन होना अतीव कष्टदायी होता है। 4. गुणाः पूजस्थानं गुणिषु न च लिंग न च वयः।गुणों का सम्मान होता हैं उनके लिंग व आयु का नहीं। 5. सिद्धिर्भवति कर्मजा।कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती है। 6. गतः कालो न चायाति।गया हुआ समय लौटकर नहीं आता है। 7. जीवन में दुख और सुख तो आते ही रहते हैं परन्तु जो अपना धैर्य खो बैठता है, वह अपना सर्वस्व खो बैठता है—राजवंशी मिश्र 8. निरन्तर कार्य करने वाले को सफलता अवश्य मिलती है—व्यास 9. काम, क्रोध व लोभ आत्मा का पतन कर मनुष्य का सर्वनाश कर देते हैं—श्रीमदभगवद्गीता 10. दुर्जनों का सामना सहनशीलता से करो—महात्मा गाँधी 11. अत्याचार करने वाला उतना दोषी नहीं जितना उसे सहन करने वाला—बालगंगाधर तिलक 12. हम जितना अधिक अध्ययन करेंगे उतना ही हमें अपने अज्ञान का बोध होता जायेगा—स्वामी विवेकानन्द 13. विद्यार्थियों का चरित्र निर्माण नैतिकशिक्षा से ही सम्भव है—सी. राजगोपालाचारी 14. धूर्त व्यक्ति कभी स्पष्ट व कटु नहीं बोलता और स्पष्ट व कटु बोलने वाला वक्ता कभी धूर्त नहीं होता—चाणक्य 15. बहुत बोलने के बजाय, बहुत सुनना अधिक अच्छा है—तुलसीदास 16. किसी भी महान् कार्य के लिये सर्वप्रथम आवश्यकता है आत्मविश्वास की—छत्रपति शिवाजी